नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक कार्यवाही के वीडियो क्लिप को सोशल मीडिया और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म पर बिना अनुमति साझा किए जाने पर सख्त रुख अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण अंतरिम आदेश जारी किया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि अब सुप्रीम कोर्ट या संबंधित हाईकोर्ट की पूर्व अनुमति के बिना किसी भी न्यायिक कार्यवाही के वीडियो क्लिप को अपलोड, पोस्ट या साझा नहीं किया जा सकेगा। अदालत ने कहा कि हाल के समय में सुनवाई के वीडियो को संदर्भ से काटकर और संपादित रूप में प्रसारित किए जाने की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे न्यायपालिका की छवि और न्यायिक प्रक्रिया की निष्पक्षता प्रभावित होने का खतरा पैदा हो रहा है।
सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि न्यायालय की कार्यवाही को मनोरंजन सामग्री की तरह प्रस्तुत करना स्वीकार्य नहीं है। अदालत ने कहा कि लाइव-स्ट्रीमिंग का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता बढ़ाना है, न कि चुनिंदा अंशों को वायरल कर भ्रामक या सनसनीखेज सामग्री तैयार करना। न्यायालय ने कहा कि अदालत कोई मनोरंजन चैनल नहीं है और न्यायिक कार्यवाही को उसके वास्तविक संदर्भ से अलग करके प्रसारित करना उचित नहीं माना जा सकता।
यह अंतरिम आदेश एक पत्रकार द्वारा दायर जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान पारित किया गया। याचिका में मांग की गई थी कि अदालतों की लाइव-स्ट्रीमिंग से प्राप्त वीडियो को संपादित कर सोशल मीडिया पर साझा करने, उससे व्यावसायिक लाभ कमाने और भ्रामक तरीके से प्रस्तुत करने पर स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। याचिकाकर्ता का तर्क था कि अधूरी या संपादित वीडियो क्लिप आम लोगों के बीच न्यायिक प्रक्रिया को लेकर भ्रम पैदा कर सकती हैं और न्यायपालिका की विश्वसनीयता को नुकसान पहुंचा सकती हैं।
याचिका में यह भी कहा गया कि कई मामलों में अदालत की लंबी सुनवाई के केवल कुछ सेकंड या कुछ मिनट के अंशों को अलग करके सोशल मीडिया पर प्रसारित किया जाता है। ऐसे वीडियो वास्तविक संदर्भ से हटकर प्रस्तुत किए जाते हैं, जिससे न्यायाधीशों की टिप्पणियों या अदालत की कार्यवाही को लेकर गलत धारणा बन सकती है। अदालत ने इस चिंता को गंभीर मानते हुए कहा कि न्यायिक कार्यवाही की आंशिक प्रस्तुति जनमानस को गुमराह कर सकती है।
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हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि इस अंतरिम रोक का प्रभाव पत्रकारों और समाचार संस्थानों की नियमित एवं निष्पक्ष न्यायिक रिपोर्टिंग पर नहीं पड़ेगा। अदालत ने कहा कि मीडिया पहले की तरह न्यायालय की कार्यवाही की तथ्यात्मक और जिम्मेदार रिपोर्टिंग कर सकता है। यह आदेश केवल अदालत की वीडियो रिकॉर्डिंग के अनधिकृत उपयोग, संपादन और डिजिटल प्रसार तक सीमित है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि डिजिटल माध्यमों पर न्यायिक कार्यवाही के बढ़ते प्रसार के बीच यह आदेश न्यायपालिका की गरिमा और न्यायिक प्रक्रिया की शुचिता बनाए रखने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। उनका कहना है कि अदालतों में होने वाली बहस अक्सर लंबी और विस्तृत होती है, लेकिन उसके छोटे-छोटे हिस्सों को अलग कर प्रस्तुत करने से वास्तविक संदर्भ बदल सकता है और इससे जनता के बीच भ्रम की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि इस विषय पर विस्तृत दिशा-निर्देश तैयार किए जाने की आवश्यकता है ताकि न्यायालयों की लाइव-स्ट्रीमिंग व्यवस्था का दुरुपयोग रोका जा सके। अदालत भविष्य में इस मुद्दे पर सभी संबंधित पक्षों के सुझावों पर विचार कर व्यापक व्यवस्था विकसित कर सकती है, जिससे पारदर्शिता और न्यायपालिका की गरिमा के बीच संतुलन बनाए रखा जा सके।
फिलहाल अंतरिम आदेश प्रभावी रहेगा और बिना न्यायालय की अनुमति किसी भी अदालत की कार्यवाही के वीडियो क्लिप को सोशल मीडिया, वीडियो प्लेटफॉर्म या अन्य डिजिटल माध्यमों पर साझा, अपलोड या प्रसारित नहीं किया जा सकेगा। मामले की अगली सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट इस विषय पर स्थायी दिशानिर्देशों और नियामक व्यवस्था की आवश्यकता पर आगे विचार करेगा।
