नागपुर: नागपुर जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने डिजिटल अरेस्ट साइबर ठगी के एक मामले में ICICI बैंक को बड़ी राहत देने से इनकार करते हुए पीड़िता को ₹5,18,437 लौटाने का आदेश दिया है। आयोग ने कहा कि बैंक केवल इस आधार पर अपनी जिम्मेदारी से मुक्त नहीं हो सकता कि ग्राहक ने ओटीपी के माध्यम से लेनदेन की पुष्टि की थी। आयोग ने माना कि संदिग्ध बैंक खातों और असामान्य वित्तीय लेनदेन की सतत निगरानी करना बैंक की वैधानिक और नियामकीय जिम्मेदारी है। ऐसा न करना सेवा में कमी, लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार की श्रेणी में आता है।
मामले के अनुसार, शिकायतकर्ता प्राची दिगंबर धोके का ICICI बैंक में बचत खाता था। 8 जनवरी 2023 को उन्हें एक व्यक्ति का फोन आया, जिसने खुद को फेडएक्स कस्टमर सर्विस का प्रतिनिधि बताया। कॉल करने वाले ने दावा किया कि उनके नाम से भेजे गए एक अंतरराष्ट्रीय पार्सल में दो पासपोर्ट, पांच एटीएम कार्ड, 300 ग्राम प्रतिबंधित मादक पदार्थ और एक लैपटॉप मिला है। इसके बाद उन्हें कथित तौर पर मुंबई पुलिस अधिकारी बनकर बात करने वाले लोगों से जोड़ा गया, जिन्होंने आपराधिक कार्रवाई का डर दिखाते हुए जांच और प्रोसेसिंग शुल्क के नाम पर धनराशि ट्रांसफर करने के लिए दबाव बनाया।
शिकायत के अनुसार, डर और दबाव के माहौल में पीड़िता ने चार अलग-अलग लेनदेन के माध्यम से कुल ₹6,93,437.50 एक अन्य ICICI बैंक खाते में स्थानांतरित कर दिए। बाद में उन्हें एहसास हुआ कि वह साइबर ठगी का शिकार हो चुकी हैं। इसके तुरंत बाद उन्होंने बैंक को सूचना दी, राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई और संबंधित पुलिस थाने में प्राथमिकी भी दर्ज कराई।
रिकॉर्ड के अनुसार, ICICI बैंक ने प्रारंभ में पीड़िता के खाते में अस्थायी (शैडो) क्रेडिट दिया था, लेकिन बाद में यह कहते हुए राशि वापस ले ली कि सभी लेनदेन ओटीपी के माध्यम से प्रमाणित किए गए थे। इसके बाद मामला बैंकिंग लोकपाल के समक्ष पहुंचा, जहां विवादित राशि का लगभग 25 प्रतिशत पीड़िता के पक्ष में जमा कराने का निर्देश दिया गया। शेष ₹5,18,437 की वसूली के लिए शिकायतकर्ता ने उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया।
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सुनवाई के दौरान ICICI बैंक ने दलील दी कि मामला साइबर अपराध से जुड़ा होने के कारण इसकी जांच आपराधिक प्रकृति की है और उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता। बैंक ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ता ने स्वयं ओटीपी का उपयोग कर लेनदेन अधिकृत किए थे, इसलिए बैंक की ओर से सेवा में कोई कमी नहीं मानी जा सकती। बैंक ने यह भी तर्क दिया कि बैंकिंग लोकपाल पहले ही इस मामले पर निर्णय दे चुका है।
हालांकि, आयोग ने बैंक की सभी प्रमुख दलीलों को खारिज कर दिया। आयोग ने कहा कि साइबर ठगी का आपराधिक पहलू अलग है, जबकि बैंक द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के केवाईसी और संदिग्ध लेनदेन की निगरानी संबंधी दिशा-निर्देशों का पालन किया गया या नहीं, यह उपभोक्ता आयोग के अधिकार क्षेत्र का विषय है। आयोग ने कहा कि बैंक खाते खोलने तक ही सीमित नहीं रह सकते, बल्कि उन्हें ग्राहकों के लेनदेन पर लगातार निगरानी रखनी होती है ताकि असामान्य गतिविधियों की समय रहते पहचान की जा सके।
आयोग ने पाया कि जिस लाभार्थी खाते में राशि भेजी गई थी, उसमें दो दिनों के भीतर लगभग ₹2.84 करोड़ का लेनदेन हुआ, जबकि खाता पहले काफी हद तक निष्क्रिय था। आयोग के अनुसार, इतनी असामान्य गतिविधि अपने आप में आरबीआई के दिशा-निर्देशों के तहत अतिरिक्त निगरानी और सत्यापन की मांग करती थी, लेकिन बैंक यह साबित नहीं कर सका कि उसने कोई प्रभावी निगरानी या निवारक कार्रवाई की थी। आयोग ने यह भी कहा कि शिकायत मिलने के बाद बैंक ने तत्काल राशि फ्रीज कराने के लिए अपेक्षित कदम नहीं उठाए।
इन तथ्यों के आधार पर आयोग ने ICICI बैंक को सेवा में कमी, लापरवाही और अनुचित व्यापार व्यवहार का दोषी ठहराते हुए शिकायत आंशिक रूप से स्वीकार कर ली। आयोग ने बैंक को शिकायतकर्ता को ₹5,18,437 पर शिकायत दायर करने की तारीख से भुगतान तक 9 प्रतिशत वार्षिक ब्याज देने का निर्देश दिया। इसके अलावा मानसिक पीड़ा के लिए ₹25,000 और मुकदमेबाजी खर्च के रूप में ₹10,000 देने का आदेश भी पारित किया गया। बैंक को आदेश का पालन 45 दिनों के भीतर करने के निर्देश दिए गए हैं।
