नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित निगरानी समिति ने दिल्ली में रिहायशी क्षेत्रों और असुरक्षित इमारतों से संचालित हो रही गैर-अनुरूप व्यावसायिक गतिविधियों पर सख्त रुख अपनाते हुए शीर्ष अदालत से व्यापक कार्रवाई के निर्देश देने की मांग की है। समिति ने अपनी हालिया रिपोर्ट में कहा है कि किसी भवन को जिस उपयोग के लिए मंजूरी दी गई है, उसके बाद भूमि उपयोग में बदलाव करना पूरी तरह अनुचित है और यह “सिस्टम के साथ धोखा” है।
समिति ने सुप्रीम कोर्ट को सौंपे गए अपने सुझावों में दिल्ली विकास प्राधिकरण (DDA) की मास्टर प्लान के तहत रिहायशी भवनों में मिश्रित उपयोग और व्यावसायिक गतिविधियों की अनुमति देने वाली नीति को वापस लेने की सिफारिश की है। इसके अलावा, दिल्ली नगर निगम (MCD) के उन परिपत्रों की समीक्षा की मांग की गई है, जिनके तहत मोटल, होटल, फार्महाउस और कुछ रिहायशी क्षेत्रों में अस्थायी ढांचों में सामाजिक आयोजनों की अनुमति दी जाती है।
समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यदि किसी भवन का उपयोग सक्षम प्राधिकरण द्वारा किसी विशेष उद्देश्य के लिए स्वीकृत किया गया है तो बाद में उसमें किसी अन्य प्रकार की गतिविधि संचालित करना नियमों का उल्लंघन है। समिति ने दिल्ली के प्रमुख बाजारों में चल रही कथित अनियमितताओं और असुरक्षित व्यावसायिक प्रतिष्ठानों का उदाहरण देते हुए सभी स्थानीय निकायों को सर्वे करने और नियमों के खिलाफ चल रही गतिविधियों पर कार्रवाई करने का निर्देश देने की मांग की है।
रिपोर्ट में मालवीय नगर स्थित एक गेस्ट हाउस में हुए भीषण अग्निकांड का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें 21 लोगों की मौत हुई थी। समिति ने कहा कि यदि निर्धारित अग्नि सुरक्षा मानकों का पालन किया गया होता तो कई जानें बचाई जा सकती थीं। इसके साथ ही लखनऊ के कोचिंग सेंटर में लगी आग की घटना का भी हवाला देते हुए कहा गया कि असुरक्षित इमारतों में संचालित गतिविधियां लोगों के जीवन के लिए गंभीर खतरा पैदा करती हैं।
समिति ने 2016 के भवन उपनियमों का उल्लेख करते हुए कहा कि असुरक्षित भवन वे माने जाते हैं जो संरचनात्मक रूप से कमजोर हों, जिनमें पर्याप्त निकासी व्यवस्था न हो, जो आग के खतरे से प्रभावित हों या जिनसे मानव जीवन को जोखिम हो।
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रिपोर्ट में दिल्ली के खान मार्केट समेत कई प्रमुख इलाकों में रेस्तरां और अन्य व्यावसायिक प्रतिष्ठानों द्वारा निकासी मार्ग से जुड़े नियमों का पालन नहीं करने पर चिंता जताई गई। समिति ने कहा कि इसी तरह की स्थिति सुंदर नगर, डिफेंस कॉलोनी, ग्रेटर कैलाश, साउथ एक्सटेंशन, ग्रीन पार्क, हौज खास, मॉडल टाउन और राजेंद्र नगर जैसे क्षेत्रों में भी देखी गई है।
एक वरिष्ठ एमसीडी अधिकारी के अनुसार, नगर निकाय पहले से ही अनधिकृत निर्माण और रिहायशी क्षेत्रों में अवैध व्यावसायिक उपयोग को लेकर सर्वे कर रहा है। अधिकारी ने कहा कि इस संबंध में नियमित रिपोर्ट अदालत के समक्ष प्रस्तुत की जा रही है।
समिति ने दिल्ली अग्निशमन सेवा को निर्देश देने की भी सिफारिश की है कि वह उन इमारतों का समय-समय पर निरीक्षण करे जिन्हें पहले ही फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र जारी किए जा चुके हैं। समिति का कहना है कि केवल प्रमाणपत्र जारी कर देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि अग्नि सुरक्षा प्रणालियां लगातार कार्यशील रहें।
रिपोर्ट में कहा गया है कि संस्थागत भवनों, सभा स्थलों, शैक्षणिक संस्थानों और औद्योगिक इमारतों के लिए निकासी संबंधी नियम अधिक कड़े हैं। वहीं, होटल और गेस्ट हाउस जैसी श्रेणियों में भी अलग-अलग अग्नि सुरक्षा मानक निर्धारित हैं, लेकिन कई स्थानों पर इनका पालन नहीं किया जा रहा है।
समिति ने दिल्ली सरकार से बेड एंड ब्रेकफास्ट नीति की भी समीक्षा करने को कहा है। समिति का कहना है कि इस योजना का दुरुपयोग कर कई रिहायशी संपत्तियों को पूर्ण व्यावसायिक होटल में बदला जा रहा है, जिससे आसपास के क्षेत्रों में सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं पर दबाव बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी समिति की रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब दिल्ली में रिहायशी इलाकों में बढ़ती व्यावसायिक गतिविधियों, पार्किंग संकट और अग्नि सुरक्षा को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। समिति ने स्थानीय निकायों से नियमों का सख्ती से पालन कराने और नागरिकों की सुरक्षा को प्राथमिकता देने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
