मथुरा: जिले में सरकारी जमीन को निजी संपत्ति बताकर बेचने के कथित बड़े फर्जीवाड़े का खुलासा हुआ है। भूमाफिया पर आधा दर्जन ग्राम पंचायतों की करीब 100 बीघा सरकारी जमीन के फर्जी दस्तावेज तैयार कर करोड़ों रुपये के सौदे कराने का आरोप है। तहसील स्तर पर हुई जांच में इन जमीनों की अनुमानित कीमत करीब ₹400 करोड़ बताई गई है। मामला सामने आने के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप है। जांच में अड़ूकी, भुडरसू, तारसी, बाद, कोसीखुर्द और रसूलपुर समेत कई ग्राम पंचायतों की जमीनों से जुड़े दस्तावेज सामने आए हैं।
जिन जमीनों को इस कथित फर्जीवाड़े में निशाना बनाया गया, उनमें बंजर, ग्रामसभा, पशुचर, नवीन परती और पुरानी परती जैसी श्रेणियों की भूमि शामिल है। नियमानुसार ऐसी सुरक्षित सरकारी जमीनों का सामान्य तरीके से बैनामा या एग्रीमेंट नहीं किया जा सकता और न ही उन्हें निजी व्यक्तियों के नाम पट्टे पर दर्ज किया जा सकता है। आरोप है कि इसी नियम को दरकिनार करने के लिए फर्जी पट्टे और खतौनी तैयार कर जमीन को निजी स्वामित्व वाली संपत्ति के रूप में पेश किया गया।
ऐसे किया जाता था सरकारी जमीन का खेल
जांच में सामने आए कथित तरीके के अनुसार, गिरोह सबसे पहले गांव के किसी बेहद उम्रदराज व्यक्ति या महिला को निशाना बनाता था। उसे लालच देकर उसके नाम सरकारी जमीन का फर्जी पट्टा और खतौनी तैयार कराई जाती थी। इसके बाद इन दस्तावेजों को वास्तविक मानते हुए जमीन का एग्रीमेंट कराया जाता और आगे उसी आधार पर बैनामा कराने की कोशिश की जाती थी।
फर्जी दस्तावेजों के आधार पर जमीन को बाजार में निजी संपत्ति के रूप में पेश किया जाता था। इसके बाद संभावित खरीदारों से मोटी रकम में सौदे किए जाते। आरोप है कि इन एग्रीमेंट और बैनामों के जरिए जमीन की खरीद-फरोख्त का पूरा बाजार खड़ा कर दिया गया, जबकि मूल जमीन सरकारी रिकॉर्ड में सुरक्षित श्रेणी में दर्ज थी। इस प्रक्रिया में कई खरीदारों ने अपनी जीवनभर की कमाई निवेश कर दी।
ग्रामीणों की शिकायत पर शुरू हुई जांच
तारसी गांव के ग्रामीणों की शिकायत के बाद जिला प्रशासन ने मामले की जांच कराई। तहसीलदार और एसडीएम की रिपोर्ट में संबंधित जमीनों के एग्रीमेंट और बैनामों को नियमविरुद्ध बताया गया है। जांच अधिकारियों ने रिकॉर्ड की पड़ताल के बाद स्पष्ट किया कि जिन जमीनों को निजी संपत्ति बताकर सौदे किए गए, उनकी मूल प्रकृति सरकारी या सुरक्षित भूमि की है।
प्रशासनिक जांच के सामने आने के बाद उन लोगों की परेशानी भी बढ़ गई, जिन्होंने इन दस्तावेजों को वैध मानकर जमीन खरीदने के लिए रकम दी थी। कथित गिरोह के झांसे में आने वाले कई लोगों ने अपनी गाढ़ी कमाई जमीन के सौदों में लगा दी। बाद में जमीन की वास्तविक स्थिति पता चलने पर खरीदारों के सामने रकम डूबने और कानूनी विवाद का खतरा पैदा हो गया।
तारसी में वृद्ध को बनाया गया जमीन का मालिक
मौजा तारसी के एक मामले में बंजर, नवीन परती, पुरानी परती और पशुचर श्रेणी के 13 खसरा नंबरों की करीब 2.81 बीघा जमीन को एक वृद्ध व्यक्ति के नाम दिखाया गया। इस जमीन का सौदा ₹5 लाख में किए जाने का उल्लेख दस्तावेजों में किया गया। जांच के अनुसार, इसमें ₹4 लाख बयाने के तौर पर दिखाकर 3 अगस्त 2025 को वृद्ध से इकरारनामा कराया गया।
हालांकि, सरकारी रिकॉर्ड में जमीन की प्रकृति ऐसी थी, जिसे निजी व्यक्ति के नाम वैध रूप से स्थानांतरित नहीं किया जा सकता था। इसके बावजूद कथित दस्तावेजों के आधार पर सौदे की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
अड़ूकी में वृद्धा के नाम दर्ज की जमीन
मौजा अड़ूकी में भी इसी तरह का मामला सामने आया। यहां 11 खसरा नंबरों में दर्ज कुल 0.288 हेक्टेयर बंजर जमीन का मालिक गांव की ही एक वृद्धा को दर्शाया गया। दस्तावेजों में 20 दिसंबर 2024 को ₹5 लाख में सौदा और ₹2 लाख बयाने के रूप में दर्ज कर एग्रीमेंट कराया गया। जांच में यह भी सामने आया कि एग्रीमेंट के कुछ ही दिन बाद वृद्धा की मौत हो गई।
इन मामलों ने सरकारी भूमि के रिकॉर्ड और पंजीकरण प्रक्रिया की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अब प्रशासनिक स्तर पर यह पता लगाया जा रहा है कि फर्जी पट्टे और खतौनी किस स्तर पर तैयार हुए, इनके आधार पर कितने एग्रीमेंट और बैनामे कराए गए और पूरे नेटवर्क में कौन-कौन लोग शामिल हैं। जांच आगे बढ़ने के साथ फर्जीवाड़े में शामिल भूमाफिया और अन्य सहयोगियों की भूमिका सामने आने की उम्मीद है।
