वॉशिंगटन: अमेरिका ने बढ़ते साइबर अपराधों के खिलाफ अपनी रणनीति में बड़ा बदलाव करते हुए केवल बचाव तक सीमित रहने के बजाय जवाबी कार्रवाई की दिशा में कदम बढ़ाया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक ऐसे ‘Hack Back’ कार्यक्रम को मंजूरी दी है, जिसके तहत जांची-परखी अमेरिकी निजी कंपनियों को सरकारी निगरानी और अनुमति के साथ विदेशी साइबर आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ डिजिटल कार्रवाई करने की क्षमता दी जाएगी। नई व्यवस्था का उद्देश्य रैनसमवेयर, ऑनलाइन ठगी और अन्य साइबर अपराधों में शामिल विदेशी आपराधिक गिरोहों की गतिविधियों को बाधित करना है।
इस पहल के तहत चयनित निजी कंपनियां सरकारी कार्यक्रम के अंतर्गत काम करेंगी। उन्हें सीधे और स्वतंत्र रूप से किसी विदेशी नेटवर्क में घुसने की खुली अनुमति नहीं होगी। प्रस्तावित व्यवस्था में सरकार की निगरानी, पूर्व जांच और संघीय स्तर पर नियंत्रण के साथ अभियान चलाने की बात कही गई है। इसका मकसद निजी क्षेत्र की तकनीकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल कर उन साइबर अपराधियों तक पहुंचना है, जो अक्सर विदेशों में बैठकर अमेरिकी संस्थानों और नागरिकों को निशाना बनाते हैं।
विदेशी साइबर गिरोह होंगे मुख्य निशाने पर
नई नीति का प्राथमिक लक्ष्य विदेशी साइबर-सक्षम आपराधिक संगठन होंगे। इनमें रैनसमवेयर गिरोह, ऑनलाइन ठगी करने वाले नेटवर्क और अन्य डिजिटल अपराधों में शामिल समूहों को निशाना बनाया जा सकता है। हालांकि, इस व्यवस्था के तहत विदेशी सरकारों को सीधे निशाना बनाने की अनुमति नहीं होगी।
सरकार का तर्क है कि साइबर अपराधियों के खिलाफ कार्रवाई में निजी क्षेत्र के पास मौजूद तकनीकी संसाधन और विशेषज्ञता महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। सरकारी एजेंसियों के पास सीमित मानव संसाधन और तकनीकी क्षमता होने के कारण वे हर साइबर हमले के पीछे मौजूद आपराधिक नेटवर्क पर तत्काल कार्रवाई नहीं कर पातीं। ऐसे में निजी कंपनियों की क्षमता का इस्तेमाल सरकारी निगरानी में करने से प्रतिक्रिया तेज करने की उम्मीद है।
निगरानी से लेकर डिजिटल ढांचे को बाधित करने तक
कार्यक्रम में शामिल की जाने वाली कंपनियों को विदेशी आपराधिक नेटवर्क की डिजिटल गतिविधियों की निगरानी करने, उनके बुनियादी ढांचे की पहचान करने और जरूरत पड़ने पर उसे बाधित करने की अनुमति दी जा सकती है। कुछ परिस्थितियों में डिजिटल ढांचे को निष्क्रिय करने या उसमें बदलाव करने जैसी कार्रवाई भी व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है।
हालांकि, ऐसी कार्रवाई को लेकर जवाबदेही का ढांचा भी तैयार किया गया है। भाग लेने वाली कंपनियों को सरकार की ओर से जांच और स्वीकृति प्रक्रिया से गुजरना होगा। उन्हें कम से कम $1 million का ऋण पत्र या समकक्ष वित्तीय व्यवस्था बनाए रखने की शर्त भी बताई गई है। इसका उद्देश्य नियमों के उल्लंघन या गलत कार्रवाई की स्थिति में जवाबदेही सुनिश्चित करना है।
सरकारी एजेंसियों पर कम होगा दबाव
अमेरिकी प्रशासन का मानना है कि साइबर अपराध की तेजी से बदलती प्रकृति के कारण केवल सरकारी एजेंसियों के भरोसे प्रभावी प्रतिक्रिया देना चुनौतीपूर्ण है। निजी साइबर सुरक्षा कंपनियों के पास नेटवर्क विश्लेषण, खतरे की पहचान और डिजिटल फोरेंसिक जैसी तकनीकी क्षमताएं पहले से मौजूद हैं।
नई व्यवस्था के जरिए इन संसाधनों को सरकारी निगरानी के तहत इस्तेमाल करने की कोशिश की जा रही है। इससे सरकारी एजेंसियां अपनी प्राथमिक क्षमताओं को बड़े और राष्ट्र-स्तरीय साइबर खतरों पर केंद्रित कर सकती हैं, जबकि निजी विशेषज्ञ विदेशी आपराधिक नेटवर्क के खिलाफ सीमित दायरे में कार्रवाई में मदद कर सकते हैं।
गलत पहचान बनी तो बढ़ सकता है जोखिम
‘Hack Back’ नीति को लेकर साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच चिंता भी है। किसी साइबर हमले के पीछे मौजूद वास्तविक व्यक्ति या संगठन की पहचान करना हमेशा आसान नहीं होता। अपराधी अक्सर दूसरे देशों के सर्वर, चोरी किए गए कंप्यूटर या किसी अन्य संस्था के नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं।
ऐसे में यदि किसी अस्पताल, कंपनी या अन्य निर्दोष संस्था के डिजिटल ढांचे को गलती से अपराधी नेटवर्क समझ लिया गया, तो जवाबी कार्रवाई से गंभीर नुकसान हो सकता है। इसके अलावा किसी आपराधिक गिरोह और विदेशी सरकार के बीच संबंध की गलत पहचान होने पर मामला साइबर अपराध से आगे बढ़कर अंतरराष्ट्रीय विवाद का रूप ले सकता है।
नई नीति इसलिए अमेरिका की साइबर सुरक्षा रणनीति में महत्वपूर्ण बदलाव मानी जा रही है, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि जवाबी डिजिटल कार्रवाई कितनी सटीक, नियंत्रित और कानूनी निगरानी के दायरे में रखी जाती है।
