नई दिल्ली। बेंगलुरु, हैदराबाद, पुणे या नोएडा से अमेरिका की टेक कंपनियों में नौकरी हासिल करने वाले भारतीय युवाओं के लिए यह सिर्फ बेहतर वेतन पाने का मौका नहीं होता। इसके साथ माता-पिता की उम्मीदें, परिवार की आर्थिक योजनाएं और बेहतर भविष्य का सपना भी जुड़ा होता है। डॉलर में मिलने वाली कमाई से घर खरीदने, शादी करने, बच्चों की पढ़ाई और परिवार को अमेरिका बुलाने की योजनाएं बनती हैं। लेकिन एच-1बी वीजा की व्यवस्था में नौकरी हासिल करना और अमेरिका में स्थायी जिंदगी बना पाना दो अलग-अलग चुनौतियां हैं।
अमेरिका में अच्छी नौकरी और आकर्षक वेतन के बावजूद वीजा की स्थिति करियर के कई अहम फैसलों को प्रभावित कर सकती है। नौकरी बदलने, दूसरे शहर में जाने, घर खरीदने या परिवार की लंबी अवधि की योजना बनाने से पहले इमिग्रेशन स्थिति पर विचार करना पड़ता है। नौकरी जाने की स्थिति में नया नियोक्ता तलाशने के साथ वीजा से जुड़ी प्रक्रिया भी संभालनी होती है। यही वजह है कि कई भारतीय पेशेवरों के लिए अमेरिकी सपने का मतलब केवल डॉलर की कमाई नहीं, बल्कि उस कमाई के साथ जुड़ी अनिश्चितता को संभालना भी है।
एच-1बी धारक नौकरी बदल सकते हैं, लेकिन यह प्रक्रिया अमेरिकी नागरिकों की तुलना में अधिक कागजी और इमिग्रेशन संबंधी जरूरतें लेकर आ सकती है। नए नियोक्ता को एच-1बी याचिका दाखिल करनी होती है। कुछ परिस्थितियों में नौकरी की भूमिका या काम की जगह में बदलाव पर अतिरिक्त प्रक्रिया की जरूरत भी पड़ सकती है। ऐसे में बेहतर वेतन, प्रमोशन या किसी दूसरे शहर में अवसर मिलने के बावजूद कर्मचारी निर्णय लेने से पहले कई पहलुओं पर विचार करते हैं।
इसका असर संभावित आय वृद्धि पर भी पड़ सकता है। एडीपी रिसर्च के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई में अमेरिका में नौकरी बदलने वालों की सालाना वेतन वृद्धि का मध्य स्तर 7 प्रतिशत था, जबकि एक ही नौकरी में बने रहने वालों के लिए यह 4.4 प्रतिशत रहा। यानी नौकरी बदलना कई कर्मचारियों के लिए वेतन बढ़ाने का महत्वपूर्ण रास्ता हो सकता है, लेकिन एच-1बी धारकों के लिए यह फैसला केवल करियर और वेतन का सवाल नहीं रहता। इसके साथ इमिग्रेशन प्रक्रिया और नौकरी की निरंतरता भी जुड़ी होती है।
अमेरिका में करीब पांच साल बिताने वाले मधुर मेहता का अनुभव इस स्थिति को समझने में मदद करता है। उन्होंने मास्टर डिग्री हासिल की और अमेजन में प्रोग्राम मैनेजर के तौर पर काम किया। उनके पास एच-1बी वीजा भी था। इसके बावजूद 35 साल की उम्र में वह और उनकी मंगेतर घर खरीदने का फैसला नहीं कर पाए। वजह उनकी मंगेतर की एच-1बी स्थिति को लेकर भविष्य की अनिश्चितता थी।
घर खरीदना लंबे समय की वित्तीय प्रतिबद्धता होती है। इसमें डाउन पेमेंट, होम लोन, नौकरी की स्थिरता और भविष्य की आय जैसे कई पहलू शामिल होते हैं। एच-1बी धारकों के लिए इन सबके साथ इमिग्रेशन स्थिति भी आर्थिक गणित का हिस्सा बन जाती है। वीजा या नौकरी की स्थिति में अचानक बदलाव की आशंका लंबे समय के वित्तीय फैसले को टालने का कारण बन सकती है।
नौकरी जाने की स्थिति में दबाव और बढ़ जाता है। कर्मचारी को एक तरफ नई नौकरी तलाशनी होती है और दूसरी तरफ अपनी कानूनी इमिग्रेशन स्थिति को बनाए रखने की चिंता रहती है। परिवार वाले पेशेवरों के लिए इसमें पति-पत्नी की वीजा स्थिति, बच्चों की पढ़ाई, किराया या होम लोन और भारत लौटने की स्थिति में आर्थिक योजना जैसे सवाल भी जुड़ जाते हैं।
एच-1बी को लेकर अनिश्चितता व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित नहीं है। पिछले एक साल में अमेरिकी प्रशासन ने कानूनी इमिग्रेशन व्यवस्था में कई सख्त कदम और प्रस्ताव सामने रखे हैं। इनमें कुछ एच-1बी मामलों में 1 लाख डॉलर की फीस, छंटनी से जुड़े मामलों की ज्यादा जांच और एच-1बी चयन प्रक्रिया में वेतन स्तर को अधिक महत्व देने वाली व्यवस्था जैसे बदलाव शामिल हैं। इनका असर हर कर्मचारी पर एक जैसा नहीं होगा, लेकिन इससे वीजा व्यवस्था में संभावित बदलावों को लेकर चिंता बढ़ी है।
भारतीय पेशेवरों के लिए इसलिए अमेरिकी नौकरी की योजना अब केवल वेतन और पद के आधार पर नहीं बनती। वीजा की अवधि, नियोक्ता पर निर्भरता, परिवार की स्थिति, स्थायी निवास की संभावना और संभावित नियम बदलाव भी महत्वपूर्ण हो गए हैं। डॉलर की कमाई अमेरिकी सपने का आकर्षक हिस्सा जरूर है, लेकिन एच-1बी व्यवस्था यह भी दिखाती है कि नौकरी की सुरक्षा और स्थायी भविष्य हमेशा एक ही चीज नहीं होते। ऐसे में वित्तीय बचत के साथ करियर और इमिग्रेशन का वैकल्पिक प्लान तैयार रखना भारतीय पेशेवरों की दीर्घकालीन योजना का अहम हिस्सा बनता जा रहा है।
