चेन्नई। मद्रास हाईकोर्ट ने मोटर दुर्घटना दावा मामलों और श्रम न्यायालयों से जुड़े उन मुआवजा मामलों की निगरानी के लिए एक समर्पित डिजिटल डैशबोर्ड शुरू किया है, जिनमें राशि जमा होने के बावजूद उसके वास्तविक हकदारों तक भुगतान नहीं पहुंच पाया है। इस व्यवस्था का उद्देश्य अदालतों में जमा लावारिस मुआवजा राशि की पहचान करना, पात्र लाभार्थियों तक रकम पहुंचाने की प्रक्रिया तेज करना और विभिन्न न्यायालयों में बिखरे रिकॉर्ड को एक केंद्रीय डिजिटल मंच पर उपलब्ध कराना है। इससे मुआवजा वितरण में पारदर्शिता बढ़ाने और दावेदारों के वित्तीय हितों की सुरक्षा करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
यह डैशबोर्ड राष्ट्रीय सूचना विज्ञान केंद्र (एनआईसी), मद्रास के समन्वय से विकसित किया गया है। हाईकोर्ट की कंप्यूटर समिति ने 28 सितंबर 2026 को हुई बैठक में इसे मंजूरी दी थी। इसके बाद पोर्टल को सक्रिय कर दिया गया। इस डिजिटल व्यवस्था के माध्यम से मोटर दुर्घटना दावा याचिकाओं और श्रम न्यायालयों से संबंधित मामलों में जमा ऐसी रकम की जानकारी जुटाई जा सकेगी, जिसका भुगतान अभी तक संबंधित व्यक्ति या उसके कानूनी उत्तराधिकारी को नहीं हो पाया है।
जिला अदालतों को रिकॉर्ड अपडेट करने के निर्देश
हाईकोर्ट की रजिस्ट्री ने 6 अक्टूबर को जारी निर्देश के माध्यम से सभी प्रधान जिला न्यायाधीशों को अपने अधीनस्थ न्यायालयों में डैशबोर्ड पर आवश्यक प्रविष्टियां दर्ज कराने और उपलब्ध जानकारी को नियमित रूप से अपडेट करने के निर्देश दिए हैं। यह व्यवस्था मोटर वाहन अधिनियम, 1988, कर्मचारी मुआवजा अधिनियम, 1923 और लंबित श्रम न्यायालय मामलों के दायरे में आने वाले प्रकरणों पर लागू होगी।
इस निर्देश का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग अदालतों में जमा मुआवजा राशि का रिकॉर्ड व्यवस्थित रूप से उपलब्ध हो और किसी मामले में भुगतान लंबित रहने की स्थिति को समय रहते पहचाना जा सके। डिजिटल रिकॉर्ड से न्यायिक और प्रशासनिक अधिकारियों को यह पता लगाने में भी मदद मिलेगी कि किन मामलों में लाभार्थियों की पहचान, संपर्क या भुगतान की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की जरूरत है।
लापता दावेदारों तक पहुंचने में मिलेगी मदद
डैशबोर्ड का एक प्रमुख उद्देश्य ऐसे दावेदारों का पता लगाना है, जिनके नाम पर मुआवजा स्वीकृत या जमा है, लेकिन वे किसी कारणवश राशि प्राप्त नहीं कर सके हैं। कई मामलों में दावेदारों के संपर्क विवरण उपलब्ध नहीं होने, पते में बदलाव, मृत्यु या कानूनी उत्तराधिकारियों की पहचान स्पष्ट न होने जैसी परिस्थितियों के कारण भुगतान लंबित रह सकता है।
नई व्यवस्था के तहत संबंधित कानूनी सेवा प्राधिकरणों, पैरा-लीगल स्वयंसेवकों, पुलिस और राजस्व अधिकारियों के साथ समन्वय कर लाभार्थियों का पता लगाने में सहायता मिलेगी। इस समन्वय से उन लोगों या उनके परिवारों तक पहुंचने की संभावना बढ़ेगी, जो मुआवजे के हकदार हैं, लेकिन उन्हें जमा राशि की जानकारी नहीं है या वे दावा प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाए हैं।
पारदर्शिता और जवाबदेही पर जोर
डिजिटल डैशबोर्ड के माध्यम से विभिन्न अदालतों में जमा मुआवजा राशि की केंद्रीकृत निगरानी की जा सकेगी। इससे प्रशासनिक अधिकारियों को लंबित मामलों की स्थिति समझने और भुगतान में देरी से जुड़ी समस्याओं की पहचान करने में मदद मिलेगी। अलग-अलग रजिस्टरों और बिखरे हुए दस्तावेजों पर निर्भरता घटने से रिकॉर्ड प्रबंधन अधिक व्यवस्थित हो सकेगा।
यह व्यवस्था न्यायिक निर्देशों के अनुपालन की निगरानी में भी सहायक होगी। संबंधित अधिकारियों को यह देखने में सुविधा होगी कि मुआवजा वितरण से जुड़े निर्देशों पर आवश्यक कार्रवाई हुई है या नहीं। इसके अलावा, पात्र लाभार्थियों के वित्तीय हितों की रक्षा के लिए सावधि जमा से जुड़े सुरक्षा उपायों की निगरानी भी डैशबोर्ड के प्रमुख उद्देश्यों में शामिल है।
मुआवजा वितरण प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की पहल
मोटर दुर्घटना और श्रम संबंधी मामलों में मुआवजा अक्सर पीड़ितों और उनके परिवारों के लिए आर्थिक सहायता का महत्वपूर्ण साधन होता है। ऐसे में राशि अदालत में जमा रहने के बावजूद लाभार्थी तक नहीं पहुंचने से मुआवजे का वास्तविक उद्देश्य प्रभावित हो सकता है। नई डिजिटल व्यवस्था का लक्ष्य ऐसी रकम की पहचान कर उसके उचित वितरण की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाना है।
डैशबोर्ड से अदालतों के बीच सूचना साझा करने, लंबित मामलों पर निगरानी रखने और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसका वास्तविक प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि अधीनस्थ अदालतें रिकॉर्ड कितनी नियमितता और सटीकता से अपडेट करती हैं तथा संबंधित विभाग लाभार्थियों की पहचान और भुगतान के लिए कितनी प्रभावी कार्रवाई करते हैं।
यह पहल न्यायिक प्रशासन में डिजिटल तकनीक के इस्तेमाल को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। इसके जरिए जमा मुआवजा राशि को केवल रिकॉर्ड में दर्ज रखने के बजाय उसे वास्तविक हकदारों तक पहुंचाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है।
