नई दिल्ली। देशभर में ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन के बाद जारी किए जा रहे ई-चालानों की बड़ी संख्या के बावजूद जुर्माने की पूरी वसूली नहीं हो पाने पर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को बकाया ई-चालानों की वसूली के लिए नए और प्रभावी उपाय तलाशने का सुझाव दिया। इनमें बकाया चालान को बिजली बिल से जोड़ने के साथ-साथ वाहन रजिस्ट्रेशन, ड्राइविंग लाइसेंस और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र जैसी सुविधाओं को रोकने के विकल्प शामिल हैं।
न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ ने सोमवार को सड़क सुरक्षा से जुड़ी वर्ष 2012 की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। सुनवाई में अदालत को बताया गया कि राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के स्तर पर करीब ₹45,000 करोड़ के ई-चालान की राशि अभी वसूल की जानी बाकी है। इसमें से लगभग ₹25,000 करोड़ की वसूली की जा चुकी है। इस आंकड़े के बाद अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल बड़ी संख्या में ई-चालान जारी करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि उनके भुगतान की प्रभावी व्यवस्था भी जरूरी है।
अदालत ने बकाया चालान की वसूली के लिए बिजली बिल को भी एक संभावित माध्यम के तौर पर इस्तेमाल करने का सुझाव दिया। पीठ ने कहा कि जिन लोगों ने ट्रैफिक चालान का भुगतान नहीं किया है, उनके बकाये को बिजली बिल में जोड़ा जा सकता है। अदालत ने अधिकारियों से इस विकल्प पर काम करने को कहा। उसका तर्क था कि बिजली बिल का भुगतान नहीं होने पर कनेक्शन काटे जाने जैसी व्यवस्था पहले से मौजूद है, इसलिए ई-चालान की रकम की वसूली के लिए भी ऐसी व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने वाहन से जुड़े दस्तावेजों और सेवाओं को बकाया चालान से जोड़ने के कई विकल्प भी सुझाए। अदालत के अनुसार, जब तक लंबित चालान का भुगतान नहीं किया जाता, तब तक वाहन के रजिस्ट्रेशन के नवीनीकरण को रोका जा सकता है। वाहन के डुप्लीकेट प्रमाणपत्र जारी करने और स्वामित्व हस्तांतरण जैसी प्रक्रियाओं पर भी रोक लगाने पर विचार किया जा सकता है।
पीठ ने बकाया चालान वाले वाहनों को परिवहन विभाग के पोर्टल पर चिन्हित करने या ब्लैकलिस्ट करने का सुझाव दिया। इसके अलावा ऐसे वाहनों के फिटनेस प्रमाणपत्र और प्रदूषण नियंत्रण प्रमाणपत्र यानी PUC जारी करने या नवीनीकरण पर रोक लगाने का विकल्प भी सामने रखा गया। अदालत ने ड्राइविंग लाइसेंस के नवीनीकरण को रोकने तथा पहले से जारी लाइसेंस को निलंबित करने जैसे कदमों पर भी विचार करने को कहा।
अदालत ने सड़क पर वाहनों की यादृच्छिक जांच को भी वसूली का माध्यम बनाने का सुझाव दिया। यदि जांच के दौरान किसी वाहन पर बकाया ई-चालान पाया जाता है और उसका भुगतान नहीं किया गया हो, तो संबंधित अधिकारी आवश्यक कार्रवाई कर सकते हैं। पीठ ने ऐसे मामलों में वाहन जब्त करने की संभावना पर भी विचार करने को कहा।
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने करीब 14 वर्षों से चल रही सड़क सुरक्षा जनहित याचिका के दौरान जारी अपने पुराने निर्देशों के अनुपालन पर भी सवाल उठाए। अदालत ने जानना चाहा कि अब तक दिए गए निर्देशों का जमीन पर कितना असर हुआ है और संबंधित अधिकारियों ने उन्हें किस हद तक लागू किया है। पीठ ने इस बात पर भी चिंता जताई कि अदालत के निर्देश केवल कागजों तक सीमित नहीं रहने चाहिए।
अदालत ने मामले में न्याय मित्र वरिष्ठ अधिवक्ता गौरव अग्रवाल को अब तक जारी निर्देशों का विस्तृत चार्ट तैयार करने को कहा। इसमें प्रत्येक निर्देश, उसके अनुपालन की समयसीमा और मौजूदा स्थिति का विवरण शामिल किया जाएगा। अदालत ने संकेत दिया कि यदि उसके निर्देशों का प्रभावी तरीके से पालन नहीं हुआ और वे केवल रिकॉर्ड तक सीमित पाए गए, तो भविष्य में संबंधित अधिकारियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जा सकती है।
ई-चालान व्यवस्था का उद्देश्य तकनीक के जरिए ट्रैफिक नियमों के उल्लंघन की पहचान कर कार्रवाई को अधिक प्रभावी बनाना है। कैमरा, सेंसर और अन्य डिजिटल माध्यमों से वाहनों की पहचान होने के बाद चालान जारी किए जा रहे हैं। लेकिन बड़ी संख्या में चालान जारी होने के बावजूद यदि जुर्माने की राशि वसूल नहीं हो पाती, तो व्यवस्था का उद्देश्य कमजोर पड़ सकता है। इसी वजह से अदालत ने भुगतान सुनिश्चित करने के लिए सरकारी सेवाओं और दस्तावेजों को बकाया चालान से जोड़ने जैसे विकल्पों पर विचार करने को कहा।
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुझाए गए उपाय निर्देश के रूप में लागू नहीं हुए हैं। राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इन विकल्पों की कानूनी और व्यावहारिक संभावनाओं पर विचार करना होगा। मामले की आगे की सुनवाई में ई-चालान की वसूली, सड़क सुरक्षा और अदालत के पुराने निर्देशों के अनुपालन की स्थिति पर आगे चर्चा होगी।
