मुंबई। महाराष्ट्र खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) ने शिशुओं के लिए बनाए जाने वाले खाद्य उत्पादों, फॉर्मूला मिल्क और फीडिंग बोतलों को लेकर नए अनुपालन आदेश जारी किए हैं। आदेश में इन उत्पादों के मुफ्त सैंपल, उपहार, कूपन, कैशबैक, इन्फ्लुएंसर प्रचार और सोशल मीडिया के जरिए प्रचार पर पूरी तरह रोक लगा दी गई है। साथ ही, उत्पादों के पैकेट पर ‘मां का दूध आपके बच्चे के लिए सर्वोत्तम है’ जैसी प्रमुख चेतावनी प्रदर्शित करना अनिवार्य किया गया है।
नए नियम तत्काल प्रभाव से लागू किए गए हैं और इनका दायरा निर्माता, ब्रांड मालिक, आयातक, रीपैकर, वितरक, खुदरा विक्रेता, फार्मेसी, अस्पताल आपूर्तिकर्ता और ई-कॉमर्स मंचों तक रखा गया है। नियम फॉर्मूला मिल्क, शिशु दुग्ध आहार, फॉलो-अप फॉर्मूला, पूरक एवं पारंपरिक शिशु आहार, विशेष चिकित्सकीय जरूरतों वाले खाद्य उत्पाद और फीडिंग बोतलों पर लागू होंगे।
खाद्य एवं औषधि प्रशासन के अनुसार, दो साल से कम उम्र के बच्चे सबसे संवेदनशील उपभोक्ताओं में शामिल हैं। वे खुद यह तय नहीं कर सकते कि उन्हें क्या खाना या पीना चाहिए और उनके माता-पिता उत्पाद के लेबल तथा स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह पर निर्भर रहते हैं। ऐसे में भ्रामक विज्ञापन या उत्पादों की गलत जानकारी बच्चों के स्वास्थ्य से जुड़े फैसलों को प्रभावित कर सकती है।
आदेश के तहत हर पैकेट के सामने प्रमुखता से ‘महत्वपूर्ण सूचना एवं मां का दूध आपके बच्चे के लिए सर्वोत्तम है’ लिखना जरूरी होगा। पैकेट पर शिशुओं या महिलाओं की तस्वीरों के इस्तेमाल की भी अनुमति नहीं होगी। इसके अलावा ‘मानवीकृत’, ‘मातृकृत’, ‘पूर्ण आहार’ और ‘स्वास्थ्यवर्धक आहार’ जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई गई है।
उत्पादों की पैकेजिंग पर बच्चे को खिलाने की स्पष्ट जानकारी देना जरूरी होगा। पूरक आहार के मामले में यह स्पष्ट करना होगा कि इसे बच्चे के जन्म के छह महीने पूरे होने के बाद ही शुरू किया जाना चाहिए। निर्माताओं और ब्रांड मालिकों को उत्पादों की बैचवार जानकारी, शिकायतों और प्रतिकूल प्रभावों से जुड़ी व्यवस्था तथा जरूरत पड़ने पर उत्पाद वापस लेने की क्षमता भी बनाए रखनी होगी।
नियमों के उल्लंघन पर अलग-अलग प्रावधानों के तहत जुर्माना तय किया गया है। भ्रामक विज्ञापन या बिना लाइसेंस संचालन के मामले में ₹10 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है। घटिया गुणवत्ता वाले खाद्य उत्पादों पर ₹5 लाख तक और गलत ब्रांडिंग के मामले में ₹3 लाख तक का जुर्माना लगाया जा सकता है।
फॉर्मूला मिल्क और शिशु खाद्य उत्पादों के विज्ञापन किसी भी माध्यम से नहीं किए जा सकेंगे। ई-कॉमर्स बाजारों और सोशल मीडिया मैसेजिंग मंचों के जरिए प्रचार भी प्रतिबंधित रहेगा। मुफ्त सैंपल, उपहार, कूपन और कैशबैक के जरिए ग्राहकों को आकर्षित करने की गतिविधियां भी प्रतिबंध के दायरे में होंगी। इन्फ्लुएंसर के माध्यम से प्रचार पर भी रोक रहेगी।
डॉक्टरों, अस्पतालों और चिकित्सा संगठनों को सम्मेलन, सेमिनार, चिकित्सकीय शिक्षा कार्यक्रम या शोध के नाम पर प्रायोजन, आतिथ्य, वक्ता शुल्क या अनुदान देने पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। किसी व्यक्ति, कंपनी, अस्पताल, डॉक्टर या इन्फ्लुएंसर को कानून के उल्लंघन में फॉर्मूला मिल्क का प्रचार करने की अनुमति नहीं होगी।
शिशु खाद्य उत्पादों में परिरक्षकों, मिलाए गए रंगों और फ्लेवरिंग पदार्थों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई गई है। अतिरिक्त सुक्रोज का इस्तेमाल केवल आवश्यकता होने पर और कुल कार्बोहाइड्रेट के 20 प्रतिशत तक किया जा सकेगा। ‘बिना अतिरिक्त चीनी’ जैसे भ्रामक दावों की अनुमति नहीं होगी।
अस्पतालों और बाल रोग विशेषज्ञों को फॉर्मूला मिल्क लेने वाले शिशुओं में संदिग्ध प्रतिकूल प्रभावों की जानकारी देने को कहा गया है। निर्माताओं को गंभीर प्रतिकूल घटनाओं की रिपोर्ट 48 घंटे के भीतर करनी होगी। इस व्यवस्था के जरिए उत्पादों से जुड़े संभावित जोखिमों की निगरानी और समय पर कार्रवाई का प्रावधान किया गया है।
इसी बीच खाद्य एवं औषधि प्रशासन ने बुलढाणा के खामगांव में एक कंपनी से ₹3.51 करोड़ मूल्य का रिफाइंड सोयाबीन तेल जब्त किया। इसके अलावा मुंबई-नासिक मार्ग पर पालघर से कसारा घाट तक पीछा करने के बाद एक वाहन से ₹1.26 करोड़ का प्रतिबंधित गुटखा भी जब्त किया गया।
