प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत और थानों में लगे सीसीटीवी कैमरों की निगरानी को लेकर कड़ा रुख अपनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि थाने का सीसीटीवी फुटेज उपलब्ध नहीं है या कैमरे बंद रखे गए हैं और पुलिस किसी व्यक्ति को पूछताछ के बाद रिहा किए जाने का पुख्ता दस्तावेजी या अन्य साक्ष्य पेश नहीं कर पाती है, तो अदालत अवैध हिरासत के आरोप को स्वीकार कर सकती है। ऐसे मामलों में पुलिस पर अपनी कार्रवाई का रिकॉर्ड रखने की जिम्मेदारी होगी।
यह आदेश न्यायमूर्ति अतुल श्रीधरन और न्यायमूर्ति दिवेश चंद्र सामंत की खंडपीठ ने देवरिया निवासी महेंद्र गौड़ और तीन अन्य की बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनाया। याचियों ने आरोप लगाया था कि गौरी बाजार थाने की पुलिस ने उन्हें बिना एफआईआर दर्ज किए, गिरफ्तारी दिखाए बिना और मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बगैर कई दिनों तक अवैध रूप से हिरासत में रखा।
सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने संबंधित अवधि का थाने का सीसीटीवी रिकॉर्ड तलब किया। रिकॉर्ड की जांच में कई दिनों की फुटेज उपलब्ध नहीं मिली। तत्कालीन थाना प्रभारी ने कैमरे खराब होने और उन्हें मैकेनिक से ठीक कराए जाने की बात कही, लेकिन इस तकनीकी खराबी का कोई उल्लेख जनरल डायरी में नहीं था। पुलिस की ओर से कैमरों की खराबी के संबंध में कोई तकनीकी रिपोर्ट भी अदालत के समक्ष पेश नहीं की गई।
कोर्ट ने कहा कि थानों में सीसीटीवी कैमरों की व्यवस्था का उद्देश्य पुलिस की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता सुनिश्चित करना और हिरासत में लिए गए लोगों के अधिकारों की रक्षा करना है। इसके लिए कैमरों का लगातार चालू रहना जरूरी है। कोर्ट ने इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट के परमवीर सिंह सैनी मामले में दिए गए निर्देशों का भी उल्लेख किया।
हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी तकनीकी कारण से सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे हैं तो पुलिस को इसकी जानकारी तत्काल रिकॉर्ड में दर्ज करनी होगी। कैमरे बंद रहने की अवधि में थाने में आने-जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति का समय सहित विवरण जनरल डायरी में दर्ज किया जाना चाहिए। इसी तरह किसी व्यक्ति को हिरासत से रिहा करने की स्थिति में पुलिस के पास रिहाई का विश्वसनीय रिकॉर्ड होना जरूरी है। परिजनों के हस्ताक्षर या रिहाई की वीडियोग्राफी जैसे साक्ष्य भी सुरक्षित रखे जाने चाहिए।
अदालत ने मामले में याचियों के अवैध हिरासत के आरोपों को स्वीकार करते हुए राज्य सरकार को प्रभावित नागरिकों को मुआवजा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कुल 65 हजार रुपये मुआवजा निर्धारित किया। साथ ही निर्देश दिया कि जांच के बाद जिन पुलिसकर्मियों की जिम्मेदारी तय हो, उनसे यह राशि वेतन से वसूल की जाए। संबंधित पुलिसकर्मियों की सेवा पुस्तिका में अदालत की नाराजगी भी दर्ज करने का आदेश दिया गया है।
थाना प्रभारी ने कोर्ट में मांगी माफी
मामले की सुनवाई के दौरान तत्कालीन थाना प्रभारी स्वयं अदालत में उपस्थित हुए। उन्होंने अपनी ओर से हुई कथित चूक के लिए न्यायालय से क्षमा मांगी। हालांकि कोर्ट ने कहा कि मामले में सामने आए तथ्यों से पता चलता है कि थाना प्रभारी के कार्यों से कार्यपालिका की शक्तियों का दुरुपयोग हुआ और याचिकाकर्ताओं के अधिकारों का उल्लंघन हुआ।
अदालत ने इसी आधार पर संबंधित थाना प्रभारी की सेवा पुस्तिका में न्यायालय के असंतोष को दर्ज करने का निर्देश दिया। फैसले में यह भी स्पष्ट किया गया कि हिरासत से जुड़े मामलों में पुलिस द्वारा तैयार किए जाने वाले रिकॉर्ड और सीसीटीवी निगरानी को महज औपचारिकता नहीं माना जा सकता। पुलिस के पास यदि हिरासत और रिहाई का विश्वसनीय रिकॉर्ड नहीं है, तो अदालत उपलब्ध परिस्थितियों के आधार पर याचिकाकर्ता के दावे पर विचार कर सकती है।
