नई दिल्ली: देश में बैंक ऋण धोखाधड़ी के मामलों में पिछले तीन वर्षों के दौरान तेज वृद्धि दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2025-26 में बैंकों से जुड़े ऋण धोखाधड़ी मामलों का कुल मूल्य बढ़कर ₹40,739.74 करोड़ पहुंच गया, जबकि इस राशि का 7 प्रतिशत से भी कम हिस्सा ही वापस वसूला जा सका। संसद में वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, ऋण धोखाधड़ी का मूल्य तीन वर्षों में लगभग चार गुना बढ़ा है, जबकि वसूली की गति अभी भी बेहद धीमी बनी हुई है। सरकार का कहना है कि जटिल कानूनी प्रक्रियाओं, विभिन्न एजेंसियों की समानांतर जांच और लंबी न्यायिक कार्यवाही के कारण बड़ी वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में धन की वापसी अपेक्षा से कम हो रही है।
लोकसभा में पूछे गए एक प्रश्न के लिखित उत्तर में सरकार ने बताया कि वित्त वर्ष 2025-26 के दौरान ऋण धोखाधड़ी के 10,678 मामलों में कुल ₹40,739.74 करोड़ की धोखाधड़ी दर्ज की गई। इसके मुकाबले बैंकों ने केवल ₹2,787.90 करोड़ की ही वसूली की, जो कुल राशि का लगभग 6.84 प्रतिशत है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में ₹29,267.42 करोड़ की धोखाधड़ी के विरुद्ध ₹1,236.95 करोड़ की वसूली हुई थी, जबकि 2023-24 में ₹8,920.44 करोड़ की धोखाधड़ी के मुकाबले मात्र ₹265.56 करोड़ ही वापस प्राप्त किए जा सके थे।
सरकारी आंकड़ों से स्पष्ट है कि सबसे अधिक वित्तीय नुकसान ऋण एवं अग्रिम (Advances) श्रेणी में दर्ज किया गया है। इसके विपरीत कार्ड और इंटरनेट बैंकिंग तथा जमा (Deposits) से जुड़े मामलों में कुल धोखाधड़ी की राशि अपेक्षाकृत कम रही और इन श्रेणियों में वसूली प्रतिशत बेहतर देखने को मिला। वर्ष 2025-26 में कार्ड एवं इंटरनेट बैंकिंग से जुड़े मामलों में लगभग 28.20 प्रतिशत तथा जमा संबंधी मामलों में करीब 20.82 प्रतिशत राशि की वसूली दर्ज की गई। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि ऋण धोखाधड़ी का आकार अत्यधिक बड़ा होने के कारण समग्र वसूली दर अभी भी बेहद कम बनी हुई है।
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प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह का कहना है कि बड़े वित्तीय धोखाधड़ी मामलों में अपराधी फर्जी कंपनियों, शेल संस्थाओं, मनी म्यूल खातों और कई स्तरों वाले बैंकिंग लेनदेन का उपयोग कर धन को तेजी से अलग-अलग खातों में स्थानांतरित कर देते हैं। इससे जांच एजेंसियों के लिए धन का पता लगाना और उसे वापस लाना अधिक कठिन हो जाता है। उन्होंने कहा कि बैंकिंग क्षेत्र में कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, रियल-टाइम ट्रांजैक्शन विश्लेषण और जोखिम आधारित अलर्ट प्रणाली को और मजबूत करना आवश्यक है, ताकि संदिग्ध लेनदेन शुरुआती स्तर पर ही रोके जा सकें।
वित्त मंत्रालय ने संसद में बताया कि बड़ी बैंकिंग धोखाधड़ी की राशि की वसूली के लिए कई कानूनी मंचों और एजेंसियों के माध्यम से कार्रवाई करनी पड़ती है। इनमें ऋण वसूली अधिकरण (DRT), SARFAESI अधिनियम, दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC), राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT), दीवानी न्यायालयों के अलावा आवश्यकतानुसार केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI), गंभीर धोखाधड़ी जांच कार्यालय (SFIO) तथा राज्य पुलिस जैसी एजेंसियां भी शामिल होती हैं। कई संस्थाओं की समानांतर कार्यवाही के कारण मामलों के निस्तारण और धनवसूली में अधिक समय लगता है।
सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक ने वसूली प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने के लिए कई नई पहलें भी शुरू की हैं। गृह मंत्रालय के भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) के तहत संचालित नागरिक वित्तीय साइबर धोखाधड़ी रिपोर्टिंग एवं प्रबंधन प्रणाली के माध्यम से संदिग्ध लेनदेन को रियल-टाइम में फ्रीज करने की व्यवस्था लागू की गई है। इसके साथ ही हेल्पलाइन 1930 के जरिए प्राप्त शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई कर धन को विभिन्न खातों में स्थानांतरित होने से पहले रोकने का प्रयास किया जा रहा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने मनी म्यूल खातों की पहचान के लिए AI आधारित MuleHunter प्रणाली भी विकसित की है, जबकि Indian Digital Payment Intelligence Platform के माध्यम से डिजिटल भुगतान नेटवर्क में उभरते साइबर खतरों की निगरानी की जा रही है।
सरकार का कहना है कि बैंकिंग धोखाधड़ी की रोकथाम के लिए तकनीकी निगरानी, मजबूत नियामकीय ढांचा, समयबद्ध जांच और विभिन्न एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय पर लगातार काम किया जा रहा है। अधिकारियों का मानना है कि उन्नत तकनीक, त्वरित धन फ्रीजिंग व्यवस्था और प्रभावी कानूनी कार्रवाई के माध्यम से भविष्य में बैंकिंग धोखाधड़ी के मामलों में धनवसूली की दर को और बेहतर बनाया जा सकेगा।
