बेंगलुरु। कर्नाटक में सुप्रीम कोर्ट के कथित फर्जी आदेश के आधार पर उम्रकैद की सजा काट रहे कैदी को जेल से रिहा कराने के मामले में जेल विभाग के डीआईजी एम. सोमशेखर को गिरफ्तार किया गया है। पुलिस के मुताबिक, जब शंकर अरमुगम को नवंबर 2018 में बेंगलुरु सेंट्रल जेल से रिहा किया गया था, तब सोमशेखर वहां चीफ सुपरिटेंडेंट के पद पर तैनात थे। पुलिस ने आरोप लगाया है कि रिहाई की प्रक्रिया में उनकी कथित भूमिका रही और बाद की जांच के दौरान उन्होंने मामले से जुड़ी जानकारी छिपाई तथा जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया।
पुलिस के अनुसार शंकर अरमुगम को चिकपेट थाने में दर्ज अपहरण और जबरन वसूली से जुड़े मामले में दोषी ठहराया गया था। फास्ट-ट्रैक विशेष अदालत ने 12 जुलाई 2004 को उसे उम्रकैद की सजा के साथ ₹10 हजार जुर्माने का आदेश दिया था। शंकर ने अपनी सजा के खिलाफ हाईकोर्ट और बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी, लेकिन दोनों स्तरों पर उसकी याचिकाएं खारिज हो गई थीं। इसके बाद भी नवंबर 2018 में वह जेल से बाहर आ गया।
जांच में सामने आया कि शंकर की रिहाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के आदेश के रूप में एक कथित फर्जी दस्तावेज पेश किया गया था। पुलिस के मुताबिक, इस दस्तावेज के आधार पर उसकी रिहाई की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई। शंकर ने ₹10 हजार का जुर्माना जमा किया और 13 नवंबर 2018 को उसे बेंगलुरु सेंट्रल जेल से रिहा कर दिया गया। बाद में दस्तावेज की प्रामाणिकता पर सवाल उठे तो जेल विभाग ने कथित आदेश को सुप्रीम कोर्ट के रजिस्ट्रार के पास पुष्टि के लिए भेजा। जांच में वह आदेश फर्जी पाया गया।
रिहाई के करीब आठ साल बाद इस मामले की जानकारी जेल विभाग तक एक गुमनाम पत्र के जरिए पहुंची। इसके बाद विभाग ने मामले की जांच शुरू की और कथित फर्जी आदेश की पुष्टि कराई। बेंगलुरु सेंट्रल जेल के प्रभारी सुपरिटेंडेंट की शिकायत पर परप्पना अग्रहारा थाने में मामला दर्ज किया गया। पुलिस ने जून में शंकर अरमुगम को मैसूर से गिरफ्तार किया और उससे पूछताछ के बाद जेल विभाग के कर्मचारी श्रीकांत एस. की भूमिका सामने आई।
श्रीकांत उस समय सजायाफ्ता कैदियों वाले सेक्शन में सेकंड डिवीजन असिस्टेंट के तौर पर कार्यरत था। पुलिस का आरोप है कि उसने शंकर की अपील से संबंधित सुप्रीम कोर्ट का कथित फर्जी आदेश तैयार करने में भूमिका निभाई। जांच एजेंसी अब यह पता कर रही है कि दस्तावेज कैसे तैयार किया गया, जेल प्रशासन तक किस तरह पहुंचा और रिहाई से पहले उसकी वैधता की जांच क्यों नहीं की गई।
पुलिस के मुताबिक, जांच के दौरान शंकर की पत्नी से भी पूछताछ की गई। उसने तत्कालीन चीफ सुपरिटेंडेंट पर अपने पति की रिहाई में मदद करने का आरोप लगाया। इसके बाद जांच अधिकारियों ने सोमशेखर की कथित भूमिका के संबंध में जानकारी जुटाई। पुलिस का कहना है कि मामले की जांच के दौरान सोमशेखर ने कथित तौर पर जरूरी जानकारी साझा नहीं की और जांच में सहयोग नहीं किया। इसके आधार पर उन्हें पहले हिरासत में लेकर पूछताछ की गई और बाद में गिरफ्तार कर लिया गया।
सोमशेखर वर्तमान में कलबुर्गी में जेलों के डीआईजी के पद पर तैनात थे। पुलिस ने उन्हें अदालत में पेश किया, जिसके बाद आगे की पूछताछ के लिए 9 अक्टूबर तक पुलिस हिरासत में भेज दिया गया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, वह इस मामले में तीसरे आरोपी हैं। इससे पहले शंकर अरमुगम और श्रीकांत एस. के खिलाफ कार्रवाई की जा चुकी है और दोनों को अदालत के समक्ष पेश किए जाने के बाद न्यायिक हिरासत में भेजा गया।
जांच में जेल अधिकारियों की कथित लापरवाही और मिलीभगत के पहलू की भी पड़ताल की जा रही है। पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि फर्जी आदेश तैयार करने और उसके आधार पर उम्रकैद के कैदी की रिहाई कराने की पूरी प्रक्रिया में कितने लोग शामिल थे। साथ ही यह भी जांचा जा रहा है कि न्यायिक आदेश की सत्यता की जांच के लिए निर्धारित प्रक्रिया का पालन क्यों नहीं हुआ।
पुलिस ने यह भी बताया कि जांच के दौरान शंकर की पत्नी से जुड़े यौन शोषण के आरोपों की जानकारी सामने आई है। इन आरोपों की भी अलग से जांच की जा रही है। अधिकारियों का कहना है कि जांच का उद्देश्य घटनाओं की पूरी कड़ी सामने लाना, सभी संबंधित लोगों की भूमिका स्पष्ट करना और यह पता लगाना है कि सुप्रीम कोर्ट के कथित फर्जी आदेश का इस्तेमाल कर एक उम्रकैद कैदी को जेल से बाहर निकालने की प्रक्रिया कैसे पूरी हुई।
