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Policy Watch

₹1,432 करोड़ के बिहार टेंडर पर घमासान, तीन बार बदली शर्तें; छोटे उद्यमियों के बाहर होने का आरोप

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksSeptember 21, 2026No Comments4 Mins Read
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आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए फोर्टिफाइड फूड की आपूर्ति का टेंडर विवादों में; ईएमडी ₹10 लाख से बढ़ाकर ₹28.64 करोड़, ₹100 करोड़ औसत टर्नओवर और 15,000 मीट्रिक टन उत्पादन अनुभव की शर्त पर उठे सवाल
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पटना। बिहार स्टेट मिल्क को-ऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड (कॉम्फेड) की ओर से आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए रेसिपी आधारित फोर्टिफाइड फूड की आपूर्ति के लिए जारी ₹1,432.12 करोड़ के टेंडर को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। आरोप है कि 28 जुलाई को टेंडर जारी होने के बाद इसकी शर्तों में तीन बार बदलाव किए गए। इनमें दो बार बोली जमा करने की समयसीमा बढ़ाई गई, जबकि एक बार पात्रता और अन्य नियमों में संशोधन किया गया। 8 सितंबर तक चार कंपनियों ने बोली लगाई, लेकिन इनमें से दो कंपनियां प्रक्रिया से बाहर हो गईं। अब टेंडर में दो दावेदार ही बचे हैं।
इस टेंडर के तहत राज्य के आंगनवाड़ी केंद्रों के लिए खिचड़ी, दलिया और हलवा जैसे रेसिपी आधारित फोर्टिफाइड फूड की आपूर्ति की जानी है। टेंडर की वित्तीय और तकनीकी पात्रता शर्तों को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं। आरोप है कि शर्तों में बदलाव और ऊंचे वित्तीय मानकों के कारण छोटे तथा स्थानीय उद्यमियों के लिए प्रतिस्पर्धा का रास्ता मुश्किल हो गया। विशेषज्ञों का कहना है कि इतनी बड़ी पूंजी, बैंक गारंटी और उत्पादन अनुभव की मांग स्थानीय सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई की भागीदारी को सीमित कर सकती है।
सबसे बड़ा विवाद बयाना राशि यानी अर्नेस्ट मनी डिपॉजिट (ईएमडी) को लेकर है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शुरुआत में ईएमडी ₹10 लाख निर्धारित थी, जिसे बाद में बढ़ाकर ₹28.64 करोड़ कर दिया गया। यानी इसमें करीब 286 गुना की बढ़ोतरी हुई। आरोप है कि इतनी बड़ी राशि की बैंक गारंटी या नकदी की व्यवस्था छोटे और स्थानीय उद्यमियों के लिए बेहद कठिन हो सकती है। इससे पर्याप्त वित्तीय क्षमता नहीं रखने वाली कंपनियां बोली प्रक्रिया में शामिल होने से पहले ही बाहर हो सकती हैं।
टेंडर में बोलीदाता के लिए ₹75 करोड़ की न्यूनतम नेटवर्थ की शर्त भी रखे जाने की बात सामने आई है। इसके साथ पिछले पांच वित्तीय वर्षों में आईसीडीएस या सरकारी आपूर्ति से औसतन ₹100 करोड़ का वार्षिक टर्नओवर जरूरी किया गया है। आलोचकों का कहना है कि इन शर्तों से उन स्थानीय इकाइयों की भागीदारी प्रभावित हो सकती है, जिनके पास उत्पादन क्षमता और स्थानीय स्तर पर काम करने का अनुभव तो है, लेकिन इतने बड़े सरकारी आपूर्ति अनुबंधों का वित्तीय रिकॉर्ड नहीं है।
फोर्टिफाइड फूड के निर्माण और आपूर्ति के अनुभव को लेकर भी कड़ा मानक रखा गया है। बोलीदाता के पास हर वर्ष कम से कम 15,000 मीट्रिक टन फोर्टिफाइड फूड के निर्माण और आपूर्ति का रिकॉर्ड होना जरूरी बताया गया है। विशेषज्ञों के अनुसार, इतनी बड़ी उत्पादन क्षमता का अनुभव सीमित कंपनियों के पास ही हो सकता है। ऐसे में स्थानीय एमएसएमई के लिए बड़ी कंपनियों के साथ प्रतिस्पर्धा करना मुश्किल हो सकता है।

Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise

ज्वाइंट वेंचर के नियमों पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। टेंडर की शर्तों के मुताबिक, लीड सदस्य को तकनीकी और विनिर्माण संबंधी पात्रता खुद पूरी करनी होगी, जबकि सहयोगी कंपनी केवल नेटवर्थ जैसी वित्तीय पात्रता में योगदान कर सकती है। आरोप है कि इससे छोटी कंपनियों के लिए बड़ी कंपनियों के साथ साझेदारी करके अपनी तकनीकी और वित्तीय क्षमता जोड़ने का विकल्प भी सीमित हो गया।
टेंडर में कॉम्फेड ने खुद को परियोजना प्राधिकरण और नोडल एजेंसी बताया है। इसी को लेकर यह सवाल उठाया जा रहा है कि कॉम्फेड को यह अधिकार किस विधिक और प्रशासनिक आधार पर मिला। संबंधित विभाग की ओर से इसके लिए कौन सा परिपत्र, कार्यालय ज्ञापन या विभागीय संकल्प जारी किया गया, इसे सार्वजनिक किए जाने की मांग की जा रही है।
टेंडर प्रक्रिया से पहले उच्च न्यायालय में दाखिल किए गए केविएट को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। कॉम्फेड ने पहले ही केविएट दाखिल किया है। आलोचकों का सवाल है कि टेंडर को लेकर संभावित कानूनी चुनौती की आशंका के बीच पहले से केविएट दाखिल करने की जरूरत क्यों पड़ी। उनका कहना है कि इस कदम के पीछे का प्रशासनिक और कानूनी आधार स्पष्ट किया जाना चाहिए।
सिविल कोर्ट के अधिवक्ता संजीव सौरभ के अनुसार, ₹1,432.12 करोड़ के प्रोजेक्ट में रखी गई शर्तों से प्रतिस्पर्धा कुछ बड़े और अधिक पूंजी वाले कारोबारियों तक सीमित होने का आरोप है। उनके मुताबिक, इससे छोटे उद्यमों के लिए जोखिम बढ़ सकता है। उन्होंने टेंडर की शर्तों को एकपक्षीय और मनमाना बताते हुए संविधान के अनुच्छेद 14 के तहत समान अवसर से जुड़े सवाल उठाए। उन्होंने टेंडर से पहले केविएट दाखिल किए जाने को लेकर भी छोटे उद्यमियों के हितों के संदर्भ में सवाल उठाया।
हालांकि, टेंडर में बदलाव और पात्रता शर्तों को लेकर लगाए गए आरोपों से अपने आप किसी अनियमितता का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। इसके लिए टेंडर दस्तावेजों, नियमों और शर्तों में किए गए बदलाव के प्रशासनिक आधार की स्वतंत्र जांच जरूरी होगी। फिलहाल चार कंपनियों के बोली लगाने के बाद दो कंपनियां प्रक्रिया से बाहर हो चुकी हैं और दो दावेदार मैदान में हैं। आगे पात्रता की जांच, तकनीकी मूल्यांकन और वित्तीय बोली के आधार पर टेंडर का अंतिम फैसला किया जाएगा।
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