मुंबई: बॉम्बे हाईकोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के एक पूर्व कर्मचारी को आपराधिक चेक धोखाधड़ी मामले में बरी होने के बावजूद नौकरी में बहाल करने से इनकार कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में बरी होना अपने आप विभागीय कार्रवाई को खत्म नहीं करता। यदि किसी कर्मचारी के खिलाफ स्वतंत्र विभागीय जांच में कदाचार साबित हुआ हो और उसी आधार पर बर्खास्तगी की गई हो, तो बाद में आपराधिक अदालत से मिली राहत के आधार पर नौकरी में बहाली का दावा नहीं किया जा सकता।
न्यायमूर्ति आरआई चागला और न्यायमूर्ति फरहान पी. दुबाश की पीठ ने 6 अगस्त को दिए आदेश में पूर्व कर्मचारी की याचिका खारिज कर दी। कर्मचारी ने RBI की ओर से 20 जुलाई 2015 को जारी उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उसकी नौकरी में बहाली, बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ देने की मांग ठुकरा दी गई थी।
1987 में RBI में नियुक्ति, 2001 में बर्खास्तगी
पूर्व कर्मचारी ने 23 अप्रैल 1987 को RBI के नेशनल क्लियरिंग सेल में पार्ट-टाइम मशीन ऑपरेटर के रूप में नौकरी शुरू की थी। बाद में 21 दिसंबर 1992 को उसे पूर्णकालिक कर्मचारी नियुक्त किया गया। नौकरी के दौरान उस पर कुछ अन्य कर्मचारियों के साथ मिलकर नेशनल क्लियरिंग सेल से गुजरने वाले चेकों में कथित तौर पर हेरफेर करने और विभिन्न बैंकों को धोखा देने की साजिश में शामिल होने के आरोप लगे।
मामले की जानकारी सामने आने के बाद RBI ने केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) में शिकायत दर्ज कराई, जिसके आधार पर आपराधिक मामला दर्ज हुआ। इसके साथ ही RBI ने कर्मचारी के खिलाफ अलग से विभागीय कार्रवाई शुरू की। उसे 30 जुलाई 1994 को निलंबित किया गया और लंबी विभागीय जांच के बाद 30 अगस्त 2001 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।
विभागीय जांच में सबूत और कर्मचारी की स्वीकारोक्ति
हाईकोर्ट ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी केवल FIR या आपराधिक मुकदमे के आधार पर नहीं हुई थी। RBI ने स्वतंत्र और विस्तृत विभागीय जांच की थी। इसमें कर्मचारी को लिखित आरोपपत्र दिया गया, सबूत पेश किए गए, गवाहों के बयान दर्ज हुए और उनसे जिरह भी हुई।
अदालत के मुताबिक, कर्मचारी ने कई वर्षों तक चली इस कार्यवाही में सक्रिय रूप से हिस्सा लिया। विभागीय जांच के दौरान उसने कथित कदाचार को लेकर कई मौकों पर स्वीकारोक्ति भी की और अपने प्रति नरमी बरतने का अनुरोध किया। अदालत ने कहा कि ये स्वीकारोक्तियां विभागीय प्राधिकारी के समक्ष उपलब्ध सामग्री का हिस्सा थीं और जांच के दौरान दर्ज अन्य साक्ष्यों के साथ उन पर भी विचार किया गया।
2015 में आपराधिक मामले से मिली राहत
विभागीय कार्रवाई पूरी होने के करीब 14 साल बाद, मार्च 2015 में विशेष अदालत ने पूर्व कर्मचारी को आपराधिक आरोपों से बरी कर दिया। इसके बाद उसने RBI में आवेदन देकर दोबारा नौकरी में बहाली के साथ बकाया वेतन और अन्य सेवा लाभ की मांग की।
RBI ने 20 जुलाई 2015 को उसकी मांग अस्वीकार कर दी। इसके बाद पूर्व कर्मचारी ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि बरी होने के बाद उसे सेवा में बहाल किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा- विभागीय और आपराधिक कार्रवाई अलग
हाईकोर्ट ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि आपराधिक मामले और विभागीय जांच की प्रकृति अलग होती है। आपराधिक अदालत में आरोप साबित करने के लिए अलग कानूनी मानक लागू होते हैं, जबकि विभागीय कार्यवाही में कर्मचारी के सेवा आचरण और कदाचार की जांच की जाती है।
अदालत ने पाया कि इस मामले में बर्खास्तगी का आधार CBI की FIR, आरोपपत्र या आपराधिक मुकदमे का लंबित रहना नहीं था। इसके बजाय RBI की स्वतंत्र विभागीय जांच में सामने आए निष्कर्षों के आधार पर सेवा समाप्त की गई थी। इसलिए 2015 में आपराधिक मामले से मिली बरी की राहत का बर्खास्तगी पर स्वतः प्रभाव नहीं पड़ा।
बहाली की मांग को अदालत ने किया खारिज
पूर्व कर्मचारी की ओर से दलील दी गई कि RBI का 2015 का आदेश उचित कारणों के बिना पारित किया गया था और उसे सुनवाई का पर्याप्त अवसर नहीं दिया गया। दूसरी ओर RBI ने कहा कि कर्मचारी की बर्खास्तगी आपराधिक मामले में किसी दोषसिद्धि के कारण नहीं, बल्कि विभागीय जांच के बाद हुई थी।
हाईकोर्ट ने RBI की दलील स्वीकार करते हुए कहा कि विभागीय जांच में कदाचार साबित होने और नियमों के तहत दंड के रूप में बर्खास्तगी किए जाने की स्थिति में बाद की आपराधिक बरी अपने आप बहाली का अधिकार पैदा नहीं करती। इसी आधार पर अदालत ने पूर्व कर्मचारी की याचिका और नौकरी में बहाली की मांग खारिज कर दी।
