नई दिल्ली: देश में हरियाली बढ़ाने और पर्यावरण संरक्षण के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए, लेकिन जमीनी स्तर पर पौधरोपण की उपलब्धियों की तस्वीर संतोषजनक नहीं मिली। नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) की जांच में सामने आया कि नौ राज्यों में पौधरोपण के लिए चिन्हित 153 जगहों में करीब 70 फीसदी स्थानों पर 2016-17 से 2019-20 के बीच लगाए गए पौधों के कारण वर्ष 2024 तक पेड़ों या हरियाली में कोई स्पष्ट बढ़ोतरी नहीं दिखाई दी। इन परियोजनाओं पर कुल ₹1,163.42 करोड़ खर्च किए जाने के बावजूद पौधरोपण की वास्तविक स्थिति और सरकारी दावों में बड़ा अंतर मिला।
कैग ने इन 153 जगहों की सेटेलाइट तस्वीरों और उपलब्ध सरकारी आंकड़ों की तुलना की। राज्यों ने इन स्थानों पर कुल 1,245.69 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण होने का दावा किया था। हालांकि, जांच में इस दावे की वास्तविकता पर सवाल उठे। सरकारी नक्शों में इन स्थानों का कुल क्षेत्रफल 1,305 हेक्टेयर बताया गया था, जबकि सेटेलाइट से माप करने पर क्षेत्रफल 1,807.01 हेक्टेयर पाया गया। यानी दोनों आंकड़ों में 502.01 हेक्टेयर का अंतर सामने आया।
जांच में 153 में से केवल 46 स्थान ऐसे मिले, जहां पौधरोपण के बाद हरियाली में कुछ बदलाव दिखाई दिया। इन 46 स्थानों के लिए सरकारी रिकॉर्ड में 561.32 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण बताया गया था, लेकिन वास्तविक गतिविधि केवल 179.43 हेक्टेयर में मिली। इस तरह जांचे गए कुल क्षेत्रफल का महज 9.93 फीसदी हिस्सा ही ऐसा था, जहां पौधरोपण का असर सेटेलाइट तस्वीरों में स्पष्ट रूप से दिखाई दिया।
उत्तराखंड में भी सामने आया बड़ा अंतर
उत्तराखंड में वर्ष 2018 से 2023 के बीच 14 स्थानों पर कुल 105 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण का काम पूरा होने का दावा किया गया था। कैग की जांच में जब इन स्थानों की सीमाओं और वास्तविक गतिविधियों का आकलन किया गया तो पौधरोपण केवल 67.14 हेक्टेयर में पाया गया। यानी सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज क्षेत्र और जमीन पर मिले काम के बीच करीब 38 हेक्टेयर का अंतर सामने आया।
कैग ने पौधरोपण से जुड़े 170 स्थानों के नक्शों की जांच के लिए बेंगलूरू स्थित भारतीय विज्ञान संस्थान की तकनीकी मदद भी ली। इनमें आठ नक्शे ऐसे पाए गए, जो सही नहीं थे और इसलिए उन्हें आगे की जांच में शामिल नहीं किया जा सका। इससे रिकॉर्ड तैयार करने और निगरानी की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े हुए।
पहले से लगे पौधों को दोबारा दिखाया
ओडिशा में कैग को ऐसी नौ जगहें मिलीं, जहां पहले ही पौधरोपण किया जा चुका था, लेकिन बाद में उन्हीं स्थानों को दोबारा पौधरोपण के लिए इस्तेमाल किया गया। इस प्रक्रिया के कारण सरकारी उपलब्धि करीब 45 हेक्टेयर अधिक दिखाई गई। इससे यह सवाल भी उठा कि पौधरोपण योजनाओं में पुराने और नए कार्यों की पहचान तथा रिकॉर्ड के सत्यापन की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।
जांच में ओडिशा, आंध्र प्रदेश और हरियाणा में कुल ₹5.82 करोड़ के अतिरिक्त या अनधिकृत खर्च पर भी सवाल उठाए गए। मध्य प्रदेश के बुरहानपुर में वर्ष 2022 में 135 हेक्टेयर क्षेत्र में पौधरोपण दिखाकर ₹58 लाख खर्च किए गए थे। जांच में सामने आया कि इसी जमीन के 75 हेक्टेयर हिस्से में पहले ही दूसरी योजनाओं के तहत पौधे लगाए जा चुके थे।
कैग के निष्कर्ष बताते हैं कि पौधरोपण योजनाओं में केवल खर्च और कागजी उपलब्धियों को दर्ज करना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक क्षेत्रफल, पौधों के जीवित रहने की स्थिति और कई वर्षों बाद हरियाली में आए बदलाव की स्वतंत्र निगरानी भी जरूरी है। सेटेलाइट आधारित सत्यापन में सामने आए अंतर ने सरकारी दावों की निगरानी और जमीनी क्रियान्वयन की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।
