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Home»Policy Watch»NEET से UPSC तक पेपर लीक मामलों पर सख्ती: 2024 कानून के तहत फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने की तैयारी, परीक्षा धोखाधड़ी मामलों की होगी त्वरित सुनवाई
Policy Watch

NEET से UPSC तक पेपर लीक मामलों पर सख्ती: 2024 कानून के तहत फास्ट-ट्रैक अदालतें बनाने की तैयारी, परीक्षा धोखाधड़ी मामलों की होगी त्वरित सुनवाई

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksJuly 23, 2026No Comments4 Mins Read
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केंद्र सरकार राज्यों और उच्च न्यायालयों से विशेष अदालतें स्थापित करने का करेगी आग्रह; पेपर लीक, संगठित नकल, उत्तर पुस्तिका से छेड़छाड़ और परीक्षा प्रणाली में धोखाधड़ी के मामलों का रोजाना आधार पर होगा निस्तारण
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नई दिल्ली: सार्वजनिक परीक्षाओं में पेपर लीक और संगठित परीक्षा धोखाधड़ी के मामलों पर सख्ती बढ़ाते हुए केंद्र सरकार सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 के तहत दर्ज मामलों की त्वरित सुनवाई के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने की तैयारी कर रही है। सरकारी सूत्रों के अनुसार, केंद्र जल्द ही राज्यों और संबंधित उच्च न्यायालयों से ऐसे मामलों की सुनवाई के लिए विशेष अदालतें गठित करने का अनुरोध करेगा, ताकि परीक्षा से जुड़े अपराधों का शीघ्र निस्तारण हो सके और दोषियों को समयबद्ध तरीके से सजा मिल सके।

सूत्रों के मुताबिक, प्रस्तावित फास्ट-ट्रैक अदालतें इन मामलों की दैनिक आधार पर सुनवाई करेंगी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि पेपर लीक, संगठित नकल और परीक्षा प्रणाली में हेरफेर से जुड़े मामलों की सुनवाई सामान्य न्यायिक प्रक्रिया में लंबित न रहे और छात्रों तथा नौकरी के अभ्यर्थियों को समय पर न्याय मिल सके।

यह पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा हाल ही में की गई उस घोषणा के बाद सामने आई है, जिसमें उन्होंने कहा था कि सरकार पेपर लीक के मामलों से निपटने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतों की व्यवस्था करेगी। प्रधानमंत्री ने कहा था कि युवाओं का भविष्य और हित सर्वोच्च प्राथमिकता है तथा परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए दोषियों के खिलाफ त्वरित कार्रवाई आवश्यक है।

सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024, 21 जून 2024 से लागू है। यह कानून सार्वजनिक परीक्षाओं में प्रश्नपत्र लीक करना, प्रश्नपत्रों तक अनधिकृत पहुंच बनाना, उत्तर पुस्तिकाओं या कंप्यूटर सिस्टम से छेड़छाड़ करना, संगठित नकल कराना तथा परीक्षा प्रक्रिया को प्रभावित करने वाली अन्य अवैध गतिविधियों को दंडनीय अपराध घोषित करता है।

यह कानून संघ लोक सेवा आयोग (UPSC), कर्मचारी चयन आयोग (SSC), रेलवे भर्ती बोर्ड (RRBs), बैंकिंग कार्मिक चयन संस्थान (IBPS), केंद्र सरकार के मंत्रालयों और विभागों की भर्ती परीक्षाओं, राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी (NTA) द्वारा आयोजित परीक्षाओं तथा केंद्र सरकार द्वारा अधिसूचित अन्य सार्वजनिक परीक्षा संस्थाओं पर लागू होता है। इसका अर्थ है कि NEET, UGC-NET, CUET और NTA द्वारा आयोजित अन्य प्रवेश परीक्षाओं में होने वाली अनियमितताओं की सुनवाई भी इसी कानून के तहत की जाएगी।

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सूत्रों के अनुसार, इस अधिनियम के तहत अब तक चार मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इनमें से दो मामले बॉम्बे हाईकोर्ट के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसी कारण प्रारंभिक चरण में बॉम्बे, कलकत्ता, दिल्ली और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालयों के अधिकार क्षेत्र में फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने का प्रस्ताव प्राथमिकता पर विचाराधीन है। आवश्यकता के अनुसार बाद में अन्य राज्यों में भी इस व्यवस्था का विस्तार किया जा सकता है।

सरकारी अधिकारियों का मानना है कि विशेष अदालतों की स्थापना से जांच एजेंसियों, अभियोजन पक्ष और न्यायपालिका के बीच बेहतर समन्वय स्थापित होगा। इससे साक्ष्यों के समय पर परीक्षण, गवाहों के बयान और न्यायिक प्रक्रिया में तेजी आएगी। सरकार का उद्देश्य परीक्षा माफियाओं और संगठित पेपर लीक गिरोहों के खिलाफ मजबूत कानूनी कार्रवाई सुनिश्चित करना है, ताकि भविष्य में ऐसे अपराधों पर प्रभावी रोक लगाई जा सके।

हाल के वर्षों में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं, विशेषकर NTA द्वारा आयोजित परीक्षाओं में सामने आई अनियमितताओं के बाद परीक्षा प्रणाली की पारदर्शिता और विश्वसनीयता को लेकर व्यापक बहस हुई है। सरकार का कहना है कि निष्पक्ष और सुरक्षित परीक्षा व्यवस्था सुनिश्चित करना छात्रों और नौकरी के अभ्यर्थियों के हितों की रक्षा के लिए अत्यंत आवश्यक है। इसी उद्देश्य से जांच, अभियोजन और न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने की दिशा में यह कदम उठाया जा रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि फास्ट-ट्रैक अदालतें प्रभावी ढंग से कार्य करती हैं, तो पेपर लीक और संगठित परीक्षा धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में शीघ्र निर्णय संभव होगा। इससे अपराधियों के खिलाफ निवारक प्रभाव भी पड़ेगा और सार्वजनिक परीक्षाओं की पारदर्शिता तथा विश्वसनीयता को मजबूत करने में मदद मिलेगी। हालांकि, प्रत्येक मामले में अंतिम निर्णय संबंधित अदालत द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों, गवाहों के बयानों और विधिक प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही दिया जाएगा।

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