नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने GST मामलों में कर अधिकारियों के लिए महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि CGST Act की Section 74 के तहत विस्तारित समयसीमा लागू करने के लिए शो-कॉज नोटिस में केवल ‘fraud’ या ‘concealment of facts’ जैसे शब्द लिख देना पर्याप्त नहीं है। नोटिस में यह स्पष्ट होना चाहिए कि अधिकारी को धोखाधड़ी, जानबूझकर गलत बयान या तथ्यों को छिपाने का निष्कर्ष किन विशिष्ट परिस्थितियों और आरोपों के आधार पर मिला।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की पीठ ने यह फैसला M/s G.R. Infra Projects Limited, Ratlam बनाम State of Madhya Pradesh & Others मामले में सुनाया। कोर्ट ने कंपनी को वित्त वर्ष 2018-19 के लिए जारी Section 74 के शो-कॉज नोटिस को रद्द कर दिया। साथ ही मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के उस आदेश को भी निरस्त कर दिया, जिसमें नोटिस को बरकरार रखा गया था।
नोटिस में ठोस आधार बताना जरूरी
सुप्रीम कोर्ट ने विवादित नोटिस की भाषा पर गंभीर आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि नोटिस को पढ़ने से पता चलता है कि उसमें ‘fraud or concealment of facts’ का सामान्य उल्लेख तो किया गया था, लेकिन यह नहीं बताया गया कि फ्रॉड का निष्कर्ष कैसे निकाला गया या तथ्यों को छिपाने का पता किस आधार पर चला।
पीठ ने यह भी गौर किया कि नोटिस में ‘fraud’ और ‘concealment’ के बीच ‘or’ का इस्तेमाल किया गया था। कोर्ट के अनुसार, इससे यह भी स्पष्ट नहीं होता कि अधिकारी वास्तव में किस आधार पर Section 74 की कार्यवाही शुरू करना चाहता था।
कोर्ट ने कहा कि विस्तारित समयसीमा का लाभ लेने के लिए नोटिस में ऐसे आरोप और तथ्य मौजूद होने चाहिए, जिनसे यह निष्कर्ष निकलता हो कि करदाता ने धोखाधड़ी, जानबूझकर गलत बयान या तथ्यों को छिपाने जैसी गतिविधि की है। इन कानूनी शब्दों का यांत्रिक इस्तेमाल करके Section 74 लागू नहीं किया जा सकता।
बाद में दाखिल जवाब से नोटिस की कमी पूरी नहीं होगी
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार की उस दलील को भी स्वीकार नहीं किया, जिसमें नोटिस की कमियों को कोर्ट के सामने दाखिल किए गए counter-affidavit के जरिए स्पष्ट करने का प्रयास किया गया था।
पीठ ने दोहराया कि जब कोई वैधानिक प्राधिकरण नोटिस या आदेश जारी करता है, तो उसे वैध बनाने के लिए जरूरी सभी आधार उसी दस्तावेज में मौजूद होने चाहिए। बाद में कोर्ट में दाखिल किए गए जवाब या हलफनामे के जरिए मूल नोटिस की कमियों को पूरा नहीं किया जा सकता।
Section 73 की समयसीमा पहले ही खत्म हो चुकी थी
विवाद की शुरुआत 13 जून 2025 को जारी शो-कॉज नोटिस से हुई थी। यह वित्त वर्ष 2018-19 से संबंधित था।
कोर्ट ने पाया कि Section 73 के तहत सामान्य मामलों में कार्यवाही की समयसीमा पहले ही समाप्त हो चुकी थी। Section 73 उन मामलों से संबंधित है, जहां टैक्स का भुगतान कम या नहीं हुआ हो और उसके पीछे fraud, wilful misstatement या suppression of facts का आरोप न हो।
2018-19 के लिए वार्षिक रिटर्न दाखिल करने की अंतिम तारीख बढ़ाकर 31 दिसंबर 2020 की गई थी। COVID-19 महामारी के दौरान सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई समयसीमा संबंधी छूट को ध्यान में रखते हुए पीठ ने माना कि Section 73 के तहत नोटिस जारी करने की विस्तारित समयसीमा 28 फरवरी 2025 को समाप्त हो गई थी।
लेकिन संबंधित शो-कॉज नोटिस इसके तीन महीने से अधिक समय बाद, 13 जून 2025 को जारी किया गया। इसके बाद राज्य ने कार्यवाही को Section 74 के तहत बनाए रखने की कोशिश की।
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जांच में मिली सामग्री Section 74 के नोटिस का विकल्प नहीं
राज्य की ओर से बताया गया कि कंपनी के वित्त वर्ष 2017-18 से 2020-21 तक के कारोबार को लेकर जांच शुरू की गई थी। कंपनी के परिसरों का निरीक्षण किया गया और अकाउंटेंट, अधिकृत हस्ताक्षरकर्ता तथा निदेशक के बयान दर्ज किए गए। कंपनी पर जांच के दौरान निर्धारित तारीखों पर पेश नहीं होने का आरोप भी लगाया गया।
3 मार्च 2025 को ड्राफ्ट नोटिस-कम-इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट तैयार की गई और बाद में Section 142(1A) के तहत सूचना दी गई। कंपनी की आपत्तियों और ड्राफ्ट नोटिस की प्रक्रिया के बाद 13 जून 2025 को Section 74 के तहत अंतिम शो-कॉज नोटिस जारी किया गया।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जांच के दौरान जुटाई गई सामग्री अंतिम वैधानिक नोटिस में विशिष्ट आरोपों के अभाव की भरपाई नहीं कर सकती।
पीठ ने शो-कॉज नोटिस को कायम रखने का “बिल्कुल कोई कारण नहीं” पाया और इसे रद्द कर दिया। कोर्ट ने मध्य प्रदेश हाई कोर्ट का आदेश भी निरस्त करते हुए राज्य को निर्देश दिया कि चुनौती दिए गए नोटिस के आधार पर आगे कोई कार्यवाही न की जाए।
