नई दिल्ली। ईरान के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल कारोबार पर दबाव बढ़ाते हुए अमेरिका ने भारत स्थित चार कंपनियों के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की है। अमेरिकी विदेश विभाग के अनुसार, इन कंपनियों पर ईरानी मूल के पेट्रोलियम या पेट्रोकेमिकल उत्पादों के आयात, खरीद और कारोबार से जुड़े नेटवर्क में शामिल होने का आरोप है। यह कार्रवाई ईरान की सैन्य गतिविधियों, खरीद नेटवर्क और ऊर्जा क्षेत्र पर आर्थिक दबाव बढ़ाने के लिए चलाए जा रहे अमेरिकी अभियान के तहत की गई है।
अमेरिकी विदेश विभाग ने जिन भारतीय कंपनियों को कार्रवाई के दायरे में रखा है, उनमें पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी, सदाशिवा ओवरसीज लिमिटेड, पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड और प्रकृतीज इंफ्रा इम्पेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड शामिल हैं। अमेरिकी सरकार का कहना है कि इन कंपनियों ने अलग-अलग अवधि में ईरानी मूल के पेट्रोलियम और पेट्रोकेमिकल उत्पादों से जुड़े कारोबार में भूमिका निभाई।
अमेरिकी विभाग के अनुसार, पोर्टईज पार्टनर्स एलएलपी ने ईरान से भारत में पेट्रोकेमिकल उत्पादों की कई खेपों के आयात में कथित तौर पर सहायता की। अमेरिकी कार्रवाई में इसके दो नामित साझेदारों के रूप में भारतीय नागरिक इंद्रिस्मिया अशरफमिया शेख और हरीश रामचंद्र रंगी का भी उल्लेख किया गया है। अमेरिकी अधिकारियों ने कंपनी की गतिविधियों को ईरानी मूल के उत्पादों के कारोबार से जोड़ते हुए प्रतिबंध लगाया है।
सदाशिवा ओवरसीज लिमिटेड पर भी ईरानी मूल के पेट्रोलियम उत्पादों के बड़े पैमाने पर आयात का आरोप लगाया गया है। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, कंपनी ने फरवरी 2024 से जून 2025 के बीच विभिन्न कंपनियों से करीब 6.9 करोड़ डॉलर मूल्य के ईरानी मूल के पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए। भारतीय मुद्रा में यह राशि करीब ₹5,700 करोड़ के आसपास बैठती है। अमेरिकी विभाग ने कहा कि इनमें बोनजोर कमोडिटी एफजेडई भी शामिल थी, जिसे पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ा है।
अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, सदाशिवा ओवरसीज को ईरान से पेट्रोलियम या पेट्रोलियम उत्पादों की खरीद, अधिग्रहण, बिक्री, परिवहन या विपणन से जुड़े महत्वपूर्ण लेनदेन में कथित रूप से जानबूझकर शामिल होने के आधार पर प्रतिबंधित किया गया है।
पीपी सॉफ्टटेक प्राइवेट लिमिटेड पर भी इसी तरह के आरोप लगाए गए हैं। अमेरिकी विदेश विभाग के मुताबिक, कंपनी ने जनवरी 2024 से जून 2025 के बीच करीब 2.5 करोड़ डॉलर मूल्य के ईरानी मूल के पेट्रोलियम उत्पादों का आयात किया। भारतीय मुद्रा में यह रकम करीब ₹2,100 करोड़ के बराबर है। जारी विवरण में कंपनी के निदेशक के तौर पर भारतीय नागरिक प्रशांत गर्ग का नाम भी शामिल किया गया है।
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चौथी कंपनी प्रकृतीज इंफ्रा इम्पेक्स इंडिया प्राइवेट लिमिटेड है। अमेरिकी विभाग का आरोप है कि कंपनी ने मई 2023 से फरवरी 2026 के बीच विभिन्न कंपनियों से करीब 2.5 करोड़ डॉलर मूल्य के ईरानी मूल के पेट्रोलियम उत्पाद आयात किए। अमेरिकी कार्रवाई के मुताबिक, यह कारोबार ईरान के ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े प्रतिबंधित नेटवर्क के दायरे में आता है।
अमेरिका की व्यापक रणनीति ईरान के तेल कारोबार से होने वाली आय पर अंकुश लगाने और उन नेटवर्क को बाधित करने की है, जिनके जरिए ईरान को आर्थिक संसाधन उपलब्ध होने का आरोप लगाया जाता है। अमेरिकी सरकार का मानना है कि पेट्रोलियम से होने वाली आय ईरान की सैन्य और खरीद गतिविधियों को समर्थन देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
इस कार्रवाई से भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर तत्काल किसी बड़े प्रभाव का आकलन करना जल्दबाजी होगा, लेकिन भारतीय कंपनियों पर अमेरिकी प्रतिबंधों का कारोबारी और वित्तीय असर पड़ सकता है। अमेरिकी प्रतिबंधों के दायरे में आने वाली कंपनियों के लिए अमेरिकी वित्तीय प्रणाली और अमेरिकी संस्थाओं के साथ लेनदेन प्रभावित हो सकते हैं। इसके अलावा अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग और शिपिंग नेटवर्क में भी अतिरिक्त जांच का सामना करना पड़ सकता है।
ईरान के साथ भारत के ऊर्जा और व्यापारिक संबंधों की पृष्ठभूमि में अमेरिकी कार्रवाई खास महत्व रखती है। भारतीय कंपनियां अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमेरिकी डॉलर आधारित भुगतान व्यवस्था और वैश्विक वित्तीय संस्थानों पर निर्भर रहती हैं। ऐसे में किसी कंपनी पर अमेरिकी प्रतिबंध लगने के बाद उसके लिए वैकल्पिक भुगतान, बीमा और लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की जरूरत बढ़ सकती है।
हालांकि, अमेरिकी घोषणा के बाद संबंधित चारों भारतीय कंपनियों की ओर से फिलहाल कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। इन कंपनियों पर लगाए गए आरोप अमेरिकी प्रशासन के दावों पर आधारित हैं और इनके अंतिम प्रभाव तथा संभावित कानूनी चुनौती का स्वरूप आगे स्पष्ट हो सकता है।
अमेरिका की यह कार्रवाई ऐसे समय हुई है जब वॉशिंगटन ईरान के तेल, पेट्रोकेमिकल और खरीद नेटवर्क पर दबाव लगातार बढ़ा रहा है। भारतीय कंपनियों को प्रतिबंधों की सूची में शामिल किया जाना इस बात का संकेत है कि अमेरिकी प्रशासन ईरान से जुड़े कारोबारी नेटवर्क की निगरानी का दायरा अब क्षेत्रीय सीमाओं से आगे बढ़ा रहा है।
