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Policy Watch

यूपी में ‘सत्ता परिवर्तन’ के लिए हिंसा करने वालों को नहीं मिलेगी सरकारी नौकरी, योगी सरकार ने कड़े किए नियम

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksOctober 29, 2026No Comments4 Mins Read
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नई व्यवस्था के तहत राजनीतिक विचारधारा के आधार पर किसी अभ्यर्थी को नौकरी के लिए अयोग्य नहीं ठहराया जाएगा, हिंसा के जरिए मौजूदा सामाजिक व्यवस्था बदलने के उद्देश्य वाले संगठनों से जुड़े लोगों पर लागू हो सकता है प्रतिबंध; केवल एफआईआर या लंबित जांच के आधार पर भी नहीं कटेगा नौकरी का मौका
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लखनऊ। उत्तर प्रदेश सरकार ने सरकारी नौकरियों में सीधी भर्ती के लिए चरित्र सत्यापन के नियम सख्त कर दिए हैं। नए निर्देशों के मुताबिक, हिंसा के जरिए सत्ता परिवर्तन या मौजूदा सामाजिक व्यवस्था को बदलने के उद्देश्य से गतिविधियों में शामिल पाए जाने वाले अभ्यर्थियों को सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य घोषित किया जा सकता है। यह व्यवस्था प्रदेश के सरकारी विभागों, निगमों, परिषदों और स्थानीय निकायों में सीधी भर्ती पर लागू होगी। हालांकि, सरकार ने स्पष्ट किया है कि किसी अभ्यर्थी को केवल उसकी राजनीतिक विचारधारा के आधार पर नौकरी से वंचित नहीं किया जा सकता। इसी तरह, सिर्फ प्राथमिकी (एफआईआर) दर्ज होने या जांच लंबित रहने से भी अभ्यर्थी स्वतः अयोग्य नहीं हो जाएगा।

चरित्र सत्यापन के नियमों में बदलाव

नियुक्ति विभाग के प्रमुख सचिव एम. देवराज की ओर से जारी आदेश में कहा गया है कि यदि कोई व्यक्ति ऐसे संगठन का सदस्य है, जिसका घोषित उद्देश्य हिंसा के माध्यम से समाज की मौजूदा व्यवस्था को बदलना है, तो उसे सरकारी नियुक्ति के लिए अयोग्य माना जाएगा। आदेश में यह भी स्पष्ट किया गया है कि राजनीतिक विचारधारा अपने आप में किसी उम्मीदवार को अनुपयुक्त घोषित करने का आधार नहीं हो सकती।

सरकार के इस फैसले का उद्देश्य राजनीतिक विचारों और हिंसक गतिविधियों में भागीदारी के बीच अंतर स्पष्ट करना है। अधिकारियों को किसी अभ्यर्थी के मामले में उपलब्ध तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर निर्णय लेना होगा। केवल किसी संगठन से जुड़ाव के आरोप, एफआईआर या लंबित जांच को स्वतः नौकरी से वंचित करने का पर्याप्त आधार नहीं माना जाएगा। हालांकि, हिंसक गतिविधियों में वास्तविक संलिप्तता सामने आने पर नियुक्ति के लिए पात्रता प्रभावित हो सकती है।

‘सत्ता परिवर्तन’ के नारे को लेकर विवाद के बीच फैसला

सरकार का यह कदम ऐसे समय आया है, जब हाल में हुए एक विरोध प्रदर्शन के दौरान ‘सत्ता परिवर्तन’ की मांग को लेकर राजनीतिक विवाद तेज हुआ है। प्रदेश में सत्तारूढ़ भाजपा और विपक्षी दलों के बीच चुनावी प्रक्रिया तथा लोकतांत्रिक संस्थाओं की भूमिका को लेकर भी टकराव बढ़ा है।

विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के तहत मतदाता सूचियों की समीक्षा को लेकर कांग्रेस और विपक्षी गठबंधन के अन्य दलों ने अनियमितताओं के आरोप लगाए हैं। विपक्ष ने चुनाव आयोग से जवाबदेही तय करने की मांग की है। इन राजनीतिक घटनाक्रमों के बीच सरकारी नौकरियों के चरित्र सत्यापन से जुड़े नए निर्देशों ने भी चर्चा तेज कर दी है।

विपक्ष का चुनावी प्रक्रिया को लेकर विरोध

12 अक्टूबर को कांग्रेस नेता राहुल गांधी और विपक्षी दलों के अन्य नेताओं ने ‘मार्च फॉर डेमोक्रेसी’ के तहत सुप्रीम कोर्ट की ओर मार्च किया था। विपक्षी गठबंधन अब एक नवंबर को दिल्ली के रामलीला मैदान में ‘वोट बचाओ, देश बचाओ’ रैली आयोजित करने की तैयारी कर रहा है।

इस रैली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे और मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को लेकर कार्रवाई की मांग उठाए जाने की संभावना है। विपक्षी दल चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता और कथित ‘वोट चोरी’ के आरोपों की जांच की मांग कर रहे हैं। वहीं, उत्तर प्रदेश सरकार के नए चरित्र सत्यापन निर्देशों ने सरकारी भर्ती में राजनीतिक गतिविधियों और हिंसक आचरण के बीच अंतर को लेकर बहस को नया आयाम दिया है।

एफआईआर दर्ज होना नौकरी से वंचित करने का स्वतः आधार नहीं

नए आदेश का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि किसी अभ्यर्थी के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने या उसके मामले में जांच लंबित रहने मात्र से उसे सरकारी नौकरी के लिए अयोग्य नहीं माना जाएगा। अधिकारियों को मामले की परिस्थितियों और उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन करना होगा। इससे यह सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि आपराधिक आरोपों और वास्तविक संलिप्तता के बीच अंतर बनाए रखा जाए।

सरकार ने राजनीतिक विचारधारा को आधार बनाकर किसी उम्मीदवार को नियुक्ति से बाहर करने की अनुमति नहीं दी है। हालांकि, हिंसा के जरिए मौजूदा व्यवस्था बदलने के उद्देश्य वाले संगठनों से जुड़ाव और ऐसी गतिविधियों में भागीदारी के मामलों में सख्त रुख अपनाने का संकेत दिया गया है।

नए नियमों के लागू होने के बाद सीधी भर्ती के दौरान चरित्र सत्यापन की प्रक्रिया में इन प्रावधानों को ध्यान में रखा जाएगा। इस व्यवस्था का व्यावहारिक प्रभाव संबंधित मामलों की जांच, उपलब्ध साक्ष्यों और नियुक्ति प्राधिकारियों के निर्णय पर निर्भर करेगा।

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