बिजनौर। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले में ट्रैक्टर बिक्री से जुड़ा एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है, जिसने फाइनेंस कंपनियों और बैंकिंग सिस्टम की निगरानी पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस मामले में एक संगठित गिरोह द्वारा लोन पर खरीदे गए ट्रैक्टरों को फर्जी दस्तावेजों के सहारे कई बार बेचने का खुलासा हुआ है। जांच के दौरान पुलिस ने करीब ₹53 लाख मूल्य के सात ट्रैक्टर बरामद किए हैं, जबकि इस घोटाले के मुख्य आरोपी समेत तीन लोग अभी फरार बताए जा रहे हैं।
प्रारंभिक जांच के मुताबिक, आरोपी पहले विभिन्न फाइनेंस कंपनियों से लोन लेकर ट्रैक्टर खरीदते थे। इसके बाद वे ट्रैक्टरों की पहचान छिपाने के लिए उनके नंबर प्लेट बदल देते थे, चेसिस नंबर में छेड़छाड़ करते थे और फर्जी कागजात तैयार करते थे। इन फर्जी दस्तावेजों के आधार पर ट्रैक्टरों को अलग-अलग स्थानों पर दोबारा बेचा जाता था। इस पूरी प्रक्रिया में न तो मूल फाइनेंस कंपनी से ‘नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट’ (NOC) लिया जाता था और न ही खरीदारों को वास्तविक स्थिति की जानकारी दी जाती थी।
जांच अधिकारियों के अनुसार, इस गिरोह का मकसद एक ही ट्रैक्टर को कई बार बेचकर मोटा मुनाफा कमाना था। जब तक फाइनेंस कंपनियों को धोखाधड़ी का पता चलता, तब तक ट्रैक्टर कई हाथों में जा चुके होते थे और उनकी ट्रेसिंग मुश्किल हो जाती थी। इससे कंपनियों को न केवल आर्थिक नुकसान होता था, बल्कि लोन की वसूली भी लगभग असंभव हो जाती थी।
मामले का खुलासा तब हुआ जब 27 अप्रैल 2026 को कई फाइनेंस कंपनियों ने स्थानीय थाने में शिकायत दर्ज कराई। कंपनियों ने बताया कि जिन ट्रैक्टरों पर लोन दिया गया था, वे अचानक ‘गायब’ हो गए हैं और उनकी लोकेशन का कोई रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है। शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर जांच शुरू की गई, जिसमें यह पूरा संगठित फर्जीवाड़ा सामने आया।
जांच में मुख्य आरोपी की पहचान जावेद के रूप में हुई है, जिसके साथ संजीव कुमार और भूपेंद्र सिंह भी इस नेटवर्क का हिस्सा बताए जा रहे हैं। तीनों आरोपी बिजनौर जिले के ही निवासी हैं और फिलहाल फरार हैं। जांच एजेंसियों का कहना है कि जावेद पहले भी इसी तरह के ट्रैक्टर फर्जीवाड़े के मामले में आरोपी रह चुका है, जिससे यह संकेत मिलता है कि वह इस तरह की गतिविधियों में पहले से शामिल रहा है।
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पुलिस ने आरोपियों की तलाश के लिए दो विशेष टीमें गठित की हैं, जो संभावित ठिकानों पर दबिश दे रही हैं। अधिकारियों का कहना है कि तकनीकी साक्ष्यों और स्थानीय नेटवर्क की मदद से आरोपियों तक जल्द पहुंचने की कोशिश की जा रही है। साथ ही, बरामद ट्रैक्टरों के वास्तविक मालिकों और उनसे जुड़े फाइनेंस रिकॉर्ड की भी जांच की जा रही है, ताकि पूरे नेटवर्क का पता लगाया जा सके।
विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह के मामलों में फर्जी दस्तावेज, वाहन पहचान में छेड़छाड़ और मल्टी-लेयर ट्रांजैक्शन का इस्तेमाल किया जाता है, जिससे धोखाधड़ी को लंबे समय तक छिपाए रखा जा सके। यह भी सामने आया है कि ऐसे गिरोह अक्सर ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों को निशाना बनाते हैं, जहां सत्यापन प्रणाली अपेक्षाकृत कमजोर होती है।
यह मामला न केवल एक आपराधिक साजिश को उजागर करता है, बल्कि फाइनेंस कंपनियों और वाहन पंजीकरण प्रणाली में मौजूद खामियों को भी सामने लाता है। विशेषज्ञों का सुझाव है कि डिजिटल ट्रैकिंग, चेसिस नंबर की रियल-टाइम वेरिफिकेशन और लोन-लिंक्ड वाहनों के लिए सख्त मॉनिटरिंग सिस्टम लागू करना जरूरी है, ताकि इस तरह की धोखाधड़ी को रोका जा सके।
फिलहाल, पुलिस मामले की गहराई से जांच कर रही है और उम्मीद जताई जा रही है कि जल्द ही फरार आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। अधिकारियों का कहना है कि इस फर्जीवाड़े में शामिल अन्य लोगों की भी पहचान की जा रही है और उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाएगी।
यह घटना एक बार फिर यह दर्शाती है कि संगठित अपराध किस तरह तकनीकी और प्रक्रियात्मक खामियों का फायदा उठाकर बड़े पैमाने पर आर्थिक नुकसान पहुंचा सकते हैं।
