नई दिल्ली: वर्षों से अपने घर का इंतजार कर रहे खरीदारों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने रियल एस्टेट सेक्टर को बड़ा संदेश दिया है। शीर्ष अदालत ने पार्श्वनाथ डेवलपर्स को निर्देश दिया है कि वह घर खरीदारों को देय पूरी राशि 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ सात दिनों के भीतर जमा करे। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि आदेश का पालन नहीं किया गया तो जिम्मेदार लोगों के खिलाफ जेल भेजने जैसी सख्त कार्रवाई की जा सकती है। अदालत ने कहा कि बिल्डर घर खरीदारों के पक्ष में दिए गए RERA आदेशों को अनिश्चित समय तक नजरअंदाज नहीं कर सकते।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन हजारों खरीदारों के लिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जो लंबे समय से अधूरे प्रोजेक्ट, कब्जे में देरी और रिफंड की समस्या से जूझ रहे हैं। अदालत ने साफ किया कि रियल एस्टेट नियामक संस्थाओं के आदेश केवल कागजी कार्रवाई नहीं हैं, बल्कि उनका पालन करना डेवलपर्स की कानूनी जिम्मेदारी है।
यह मामला गुरुग्राम स्थित पार्श्वनाथ एक्सोटिका परियोजना से जुड़ा है। यहां घर खरीदार रीटा टिक्कू और लोकेश टिक्कू ने फ्लैट के लिए करीब ₹1.78 करोड़ की पूरी रकम का भुगतान किया था। इसके बावजूद लगभग 20 साल बीत जाने के बाद भी उन्हें फ्लैट का कब्जा नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने हरियाणा रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी (HRERA) का रुख किया, जहां उनके पक्ष में आदेश जारी किए गए थे।
HRERA ने बिल्डर को खरीदारों को भुगतान और मुआवजा देने का निर्देश दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के अनुसार बार-बार नोटिस, रिकवरी प्रक्रिया और अन्य कानूनी कार्रवाई के बावजूद आदेशों का पालन नहीं किया गया। अदालत ने इस रवैये को गंभीरता से लेते हुए कंपनी के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि प्रभावित घर खरीदारों को न्याय दिलाने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया जा रहा है। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि दिवालियापन एवं शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की प्रक्रिया को RERA आदेशों से बचने के हथियार के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने पार्श्वनाथ डेवलपर्स और उसके निदेशकों के बैंक खातों को फ्रीज करने, संपत्तियों पर तीसरे पक्ष के अधिकार बनाने पर रोक लगाने और संबंधित लोगों के खिलाफ वारंट जारी करने जैसे कदम उठाए थे। ताजा सुनवाई में अदालत ने जेल भेजने की कार्रवाई शुरू करने से पहले कंपनी को अंतिम अवसर दिया है।
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कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यह फैसला रियल एस्टेट क्षेत्र के लिए एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। विशेषज्ञों के अनुसार, इस आदेश से यह संदेश गया है कि यदि कोई डेवलपर जानबूझकर RERA के आदेशों का पालन नहीं करता है तो उसके खिलाफ केवल कंपनी स्तर पर नहीं, बल्कि जिम्मेदार निदेशकों के खिलाफ भी कार्रवाई हो सकती है।
उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने IBC की व्यवस्था को खत्म नहीं किया है, लेकिन यह जरूर स्पष्ट किया है कि दिवालियापन प्रक्रिया का इस्तेमाल उपभोक्ताओं के अधिकारों को कमजोर करने के लिए नहीं किया जा सकता। वास्तविक दिवालियापन मामलों में IBC के नियम लागू रहेंगे, लेकिन केवल भुगतान से बचने के लिए इसका सहारा लेना स्वीकार्य नहीं होगा।
इस फैसले के बाद घर खरीदारों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए कानूनी प्रक्रिया में मजबूती मिलेगी। वे RERA आदेशों के पालन के लिए रिकवरी प्रक्रिया शुरू करा सकते हैं, संपत्तियों की कुर्की की मांग कर सकते हैं और जरूरत पड़ने पर अदालत की अवमानना कार्रवाई का सहारा ले सकते हैं।
रियल एस्टेट विशेषज्ञों का मानना है कि यह आदेश उन खरीदारों के लिए उम्मीद की किरण है, जो वर्षों से अपने घर या निवेश की वापसी का इंतजार कर रहे हैं। हालांकि हर मामले का फैसला उसके तथ्यों के आधार पर होगा, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के इस रुख से स्पष्ट संकेत मिलता है कि अदालतें खरीदारों के अधिकारों की रक्षा के लिए सख्त कदम उठाने से पीछे नहीं हटेंगी।
