अलीगढ़: अलीगढ़ जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने स्मार्टफोन में तकनीकी खराबी और ग्राहक शिकायतों के समाधान में कथित लापरवाही के मामले में वीवो मोबाइल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को उपभोक्ता को ₹78,500 का भुगतान करने का आदेश दिया है। विशेष बात यह रही कि यह मामला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय (एएमयू) के विधि छात्र मोहम्मद अस्बाह ने बिना किसी अधिवक्ता की सहायता के स्वयं लड़ा और आयोग से अपने पक्ष में फैसला प्राप्त किया।
मोहम्मद अस्बाह, जो जमालपुर स्थित हमदर्द नगर-डी के निवासी हैं, ने 9 अक्टूबर 2024 को अलीगढ़ के एक अधिकृत विक्रेता से ₹23,500 में वीवो बी-30 स्मार्टफोन खरीदा था। शिकायत के अनुसार, शुरुआती कुछ महीनों तक फोन सामान्य रूप से कार्य करता रहा, लेकिन जनवरी 2025 से उसमें लगातार ओवरहीटिंग और लैग की समस्या आने लगी। उनका कहना था कि सामान्य उपयोग के दौरान भी फोन अत्यधिक गर्म हो जाता था और उसकी कार्यक्षमता प्रभावित होने लगी, जिससे दैनिक उपयोग में लगातार परेशानी का सामना करना पड़ा।
शिकायतकर्ता के अनुसार, समस्या सामने आने के बाद उन्होंने फरवरी 2025 से कंपनी के कस्टमर केयर से कई बार संपर्क किया और शिकायत दर्ज कराई, लेकिन कोई स्थायी समाधान उपलब्ध नहीं कराया गया। इसके बाद उन्होंने दो बार अधिकृत सर्विस सेंटर का भी रुख किया। आरोप है कि 3 मई 2025 को सर्विस सेंटर पहुंचने पर न केवल उनकी तकनीकी शिकायत का संतोषजनक समाधान नहीं किया गया, बल्कि कर्मचारियों ने उनके साथ अभद्र व्यवहार भी किया। लगातार शिकायतों के बावजूद समस्या का समाधान न होने पर उन्होंने कानूनी उपाय अपनाने का निर्णय लिया।
इसके बाद मोहम्मद अस्बाह ने जिला उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत वाद दायर किया। उन्होंने आयोग के समक्ष फोन में आई तकनीकी खराबी, कंपनी की कथित लापरवाही, ग्राहक सेवा की उदासीनता और सर्विस सेंटर के व्यवहार से संबंधित दस्तावेज, शिकायतों का रिकॉर्ड और अन्य साक्ष्य प्रस्तुत किए। उन्होंने बिना किसी वकील की सहायता के स्वयं पूरे मामले की पैरवी की।
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आयोग की कार्यवाही के दौरान वीवो मोबाइल इंडिया प्राइवेट लिमिटेड को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त अवसर दिए गए। हालांकि, उपलब्ध रिकॉर्ड के अनुसार कंपनी की ओर से न तो कोई लिखित जवाब दाखिल किया गया और न ही सुनवाई के दौरान प्रभावी ढंग से अपना पक्ष प्रस्तुत किया गया। इसके बाद आयोग ने शिकायतकर्ता द्वारा प्रस्तुत दस्तावेजों, शपथपत्र और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर मामले का परीक्षण किया।
आयोग के अध्यक्ष हसनैन कुरैशी और सदस्य पूर्णिमा सिंह राजपूत की पीठ ने अपने आदेश में शिकायतकर्ता के दावों को स्वीकार करते हुए कंपनी को 45 दिनों के भीतर कुल ₹78,500 का भुगतान करने का निर्देश दिया। आदेश के अनुसार, इसमें स्मार्टफोन की खरीद मूल्य ₹23,500, मानसिक उत्पीड़न, असुविधा और कथित दुर्व्यवहार के लिए ₹50,000 का मुआवजा तथा वाद व्यय के रूप में ₹5,000 शामिल हैं।
आयोग ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि निर्धारित राशि का पूरा भुगतान किए जाने के बाद कंपनी चाहे तो उपभोक्ता से संबंधित खराब स्मार्टफोन वापस ले सकती है। साथ ही आयोग ने चेतावनी दी कि यदि निर्धारित 45 दिनों की अवधि के भीतर आदेश का पालन नहीं किया जाता है तो उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 72 के तहत कंपनी के विरुद्ध विधि सम्मत दंडात्मक कार्रवाई की जा सकती है।
यह निर्णय उपभोक्ता अधिकारों की दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। मामला इस बात का भी उदाहरण है कि उपभोक्ता उचित दस्तावेज, साक्ष्य और कानूनी प्रक्रिया का पालन करते हुए बिना अधिवक्ता की सहायता के भी अपने अधिकारों के लिए न्यायिक मंच पर प्रभावी ढंग से पैरवी कर सकते हैं। आयोग के इस आदेश ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि उत्पाद की गुणवत्ता, ग्राहक सेवा और शिकायत निवारण में कमी पाए जाने पर कंपनियों को उपभोक्ता संरक्षण कानून के तहत जवाबदेह ठहराया जा सकता है।
