चंडीगढ़: देश में बढ़ते साइबर अपराधों के बीच पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने मौजूदा कानूनी व्यवस्था और साइबर फ्रॉड के मामलों में निर्धारित सजा को लेकर गंभीर चिंता जताई है। करीब ₹73 लाख की कथित साइबर ठगी से जुड़े मामले में सुनवाई करते हुए अदालत ने कहा कि साइबर अपराधों के लिए मौजूदा कानूनी ढांचा और निर्धारित सजा फिलहाल पर्याप्त निरोधक प्रभाव पैदा करती हुई नजर नहीं आती। कोर्ट ने कहा कि बढ़ते साइबर अपराधों ने बैंक खाताधारकों के बीच भी भय का माहौल पैदा कर दिया है।
मामला गुरुग्राम निवासी विक्रम मिधा से कथित तौर पर हुई ₹73 लाख की ऑनलाइन ठगी से जुड़ा है। इस मामले में आरोपी संजय सिंह ने नियमित जमानत के लिए हाईकोर्ट का रुख किया था। आरोपी करीब 11 महीने से जेल में था। मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने साइबर अपराधों के बढ़ते खतरे और बैंकिंग व्यवस्था पर इसके असर को लेकर महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
मामले के अनुसार, आरोपी को ऑनलाइन ट्रेडिंग से संबंधित एक WhatsApp लिंक भेजा गया था। ऑनलाइन कमाई का लालच मिलने के बाद उसने कथित तौर पर उस लिंक पर क्लिक किया और अलग-अलग बैंक खातों में रकम ट्रांसफर की। पीड़ित ने सितंबर 2025 में मामले की जानकारी साइबर पुलिस को दी थी। पुलिस की कार्रवाई के बाद करीब ₹20 लाख की रकम बरामद की जा सकी थी।
जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने साइबर फ्रॉड के मामलों में एक बड़ी चुनौती की ओर अदालत का ध्यान खींचा। दलील दी गई कि ऐसे मामलों में वास्तविक मास्टरमाइंड अक्सर कानून की पकड़ से बाहर रह जाते हैं, जबकि छोटे आर्थिक लाभ के बदले अपने बैंक खाते उपलब्ध कराने वाले खाताधारक और बिचौलिए गिरफ्तार हो जाते हैं।
बचाव पक्ष के अनुसार, कई मामलों में खाताधारक अपने बैंक खातों के इस्तेमाल के पीछे मौजूद वास्तविक लोगों से परिचित नहीं होते। उन्हें मामूली रकम का लालच देकर खाते उपलब्ध कराने के लिए तैयार किया जाता है और बाद में उन्हीं खातों के जरिए लाखों या करोड़ों रुपये का लेनदेन किया जाता है। कई बार खाते उपलब्ध कराने वाले लोगों को यह जानकारी भी नहीं होती कि रकम कहां से आ रही है और आखिरकार किस व्यक्ति तक पहुंच रही है।
अदालत के सामने यह भी बताया गया कि मामले में अभियोजन के कुल पांच गवाहों में से अब तक केवल दो की गवाही पूरी हुई है। आरोपी के करीब 11 महीने जेल में रहने और मुकदमे की प्रगति को देखते हुए नियमित जमानत की मांग की गई।
हाईकोर्ट ने आरोपी को जमानत देते हुए साइबर अपराध के व्यापक खतरे पर चिंता जताई। अदालत ने कहा कि देश में साइबर अपराधों में लगातार बढ़ोतरी हो रही है और इससे बैंक खाताधारकों के बीच यह आशंका पैदा हो रही है कि उनके खातों में जमा रकम किसी भी समय धोखाधड़ी के जरिए निकाल ली जा सकती है। ऐसी स्थिति में पीड़ित खुद को असहाय और कमजोर महसूस कर सकता है।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि बढ़ते साइबर अपराधों और उनके गंभीर परिणामों को देखते हुए मौजूदा कानूनी ढांचा तथा निर्धारित सजा पर्याप्त निरोधक प्रभाव पैदा करती हुई नहीं दिखती। अदालत की यह टिप्पणी साइबर फ्रॉड के मामलों में सख्त जांच, प्रभावी अभियोजन और वास्तविक अपराधियों तक पहुंचने की चुनौती को रेखांकित करती है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले की प्रति हरियाणा, पंजाब और चंडीगढ़ के पुलिस महानिदेशकों को भेजने का निर्देश भी दिया। संबंधित DGPs को आदेश की प्रति साइबर अपराधों की पहचान और जांच से जुड़े अधिकारियों तथा संबंधित साइबर सेल तक पहुंचाने को कहा गया है, ताकि जांच एजेंसियां अदालत की टिप्पणियों और निर्देशों से अवगत रहें।
हालांकि जमानत देते समय अदालत ने आरोपी के लिए सख्त शर्त भी रखी। कोर्ट ने कहा कि यदि वर्तमान में लंबित मुकदमों के दौरान आरोपी भविष्य में किसी समान अपराध में शामिल पाया जाता है, तो वह बाद के मामलों में जमानत का हकदार नहीं होगा। अभियोजन को भी निर्देश दिया गया कि ऐसी स्थिति सामने आने पर संबंधित अदालतों में आवेदन देकर इस आदेश की जानकारी दी जाए।
यह मामला साइबर अपराध की उस चुनौती को भी सामने लाता है जिसमें बैंक खाते ठगी की रकम को एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने का माध्यम बनते हैं। जांच एजेंसियों के लिए ऐसे मामलों में केवल खाते के इस्तेमाल तक सीमित रहने के बजाय रकम के वास्तविक स्रोत, अंतिम लाभार्थी और पूरे नेटवर्क की पहचान करना महत्वपूर्ण है। हाईकोर्ट के निर्देश के बाद संबंधित साइबर सेल के लिए यह फैसला भविष्य की जांच और अभियोजन में महत्वपूर्ण संदर्भ बन सकता है।
