नई दिल्ली। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) ने गुजरात सरकार को एक महिला को ₹7.5 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया है। महिला को कथित फर्जीवाड़े के मामले में गिरफ्तारी के बाद सार्वजनिक रूप से घुमाया गया था। आयोग ने इसे उसके मानवाधिकारों का उल्लंघन माना है।
यह आदेश बुधवार को गांधीनगर में आयोग की दो दिवसीय खुली सुनवाई के दौरान अध्यक्ष न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमणियन और सदस्य न्यायमूर्ति (डॉ.) बिद्युत रंजन सारंगी तथा विजया भारती सयानी की पीठ ने पारित किया।
पायल गोती को दिसंबर 2024 में अमरेली फर्जी पत्र मामले में गिरफ्तार किया गया था। बाद में उन्हें जमानत मिल गई थी। इस घटना के बाद तीन पुलिसकर्मियों को निलंबित किया गया था।
गोती के वकील बृज शेठ के अनुसार, आयोग ने पाया कि गिरफ्तारी के दौरान दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) या भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन नहीं किया गया था।
आयोग ने मामले की आगे की कार्रवाई को भी ध्यान में रखा। शेठ के अनुसार, पुलिस ने गोती की जमानत याचिका का विरोध नहीं किया था और बाद में मामले को बंद करने की मांग करते हुए ‘सी’ सारांश रिपोर्ट दाखिल की थी।
शेठ ने कहा कि राज्य सरकार को पायल गोती को ₹7.5 लाख का मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है।
मामला दिसंबर 2024 का है, जब गोती और तीन अन्य लोगों को अमरेली तालुका पंचायत अध्यक्ष के नाम से कथित तौर पर फर्जी पत्र तैयार करने और उसे प्रसारित करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। आरोप था कि इस पत्र का इस्तेमाल भाजपा विधायक और गुजरात के मंत्री कौशिक वेकरिया को बदनाम करने के लिए किया गया।
गिरफ्तारी और गोती को कथित तौर पर सार्वजनिक रूप से घुमाए जाने के तरीके को लेकर पुलिस की कार्रवाई और व्यक्तिगत अधिकारों की सुरक्षा पर सवाल उठे थे। इसके बाद NHRC ने गिरफ्तारी की परिस्थितियों और महिला के कथित सार्वजनिक अपमान से जुड़े पहलुओं की जांच की।
आयोग के निष्कर्ष के बाद गुजरात सरकार को गोती को मानवाधिकार उल्लंघन के लिए मुआवजा देने का निर्देश दिया गया है। इस आदेश ने आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी के दौरान कानूनी प्रक्रियाओं और आरोपी व्यक्तियों की गरिमा बनाए रखने से जुड़े प्रावधानों पर भी ध्यान केंद्रित किया है।
कानूनी प्रक्रिया के तहत किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी निर्धारित नियमों और सुरक्षा उपायों के अनुसार होनी चाहिए। इनमें गिरफ्तार व्यक्ति के अधिकारों और उसकी गरिमा की रक्षा से जुड़े प्रावधान भी शामिल हैं। NHRC की टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि आरोप कितने भी गंभीर क्यों न हों, कानून लागू करने वाली एजेंसियों को निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन करना आवश्यक है।
इस मामले में मुआवजे का आदेश ऐसे समय आया है जब मूल आपराधिक मामले में भी महत्वपूर्ण बदलाव हो चुके हैं। गोती को जमानत मिल चुकी है, पुलिस ने उनकी जमानत याचिका का विरोध नहीं किया और बाद में जांच एजेंसी ने मामले को बंद करने की मांग करते हुए ‘सी’ सारांश रिपोर्ट दाखिल की।
NHRC का मुआवजा संबंधी आदेश मूल आपराधिक कार्यवाही से अलग है। आयोग ने गिरफ्तारी और उसके बाद गोती के साथ कथित व्यवहार के दौरान मानवाधिकारों के उल्लंघन से जुड़े पहलुओं पर विचार किया है। अब गुजरात सरकार को आयोग के निर्देश के अनुसार ₹7.5 लाख का मुआवजा देना होगा।
अमरेली का यह मामला फर्जी पत्र तैयार करने और उसे प्रसारित करने के आरोपों के कारण पहले ही चर्चा में रहा था। अब NHRC की कार्रवाई ने गिरफ्तारी की प्रक्रिया और आरोपी महिला के साथ किए गए व्यवहार को मामले का प्रमुख पहलू बना दिया है।
मुआवजे के निर्देश के साथ आयोग ने स्पष्ट किया है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को गिरफ्तारी से जुड़े निर्धारित नियमों का पालन करने के साथ-साथ आरोपी व्यक्तियों की गरिमा और मानवाधिकारों का भी सम्मान करना चाहिए।
