नई दिल्ली। राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने डाकघर से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि डाकघर के नाम पर चेक के माध्यम से जमा की गई रकम की जिम्मेदारी से विभाग केवल इस आधार पर नहीं बच सकता कि उसके एजेंट ने धोखाधड़ी की थी। आयोग ने दो जमाकर्ताओं द्वारा चेक के जरिए जमा किए गए कुल ₹6 लाख की रकम को लेकर डाकघर को भुगतान के लिए जिम्मेदार ठहराने वाले निचली उपभोक्ता अदालतों के आदेश को बरकरार रखा है। एनसीडीआरसी ने डाक विभाग की पुनरीक्षण याचिका खारिज करते हुए ₹6 लाख ब्याज समेत लौटाने का आदेश कायम रखा।
आयोग का यह आदेश 27 अगस्त 2026 को आया। अध्यक्ष न्यायमूर्ति एपी साही और सदस्य भरतकुमार पंड्या की पीठ ने मामले की सुनवाई की। पीठ ने पाया कि निचली उपभोक्ता अदालतों ने शिकायत में किए गए चेक भुगतान और कथित नकद लेनदेन को अलग-अलग आधार पर देखा था। जहां ₹10.50 लाख के नकद निवेश के दावे को पर्याप्त साक्ष्य नहीं होने के कारण स्वीकार नहीं किया गया, वहीं पोस्ट मास्टर के नाम जारी किए गए दो चेकों से ₹6 लाख जमा किए जाने का तथ्य प्रमाणित पाया गया।
मामला दो जमाकर्ताओं के मासिक आय योजना में निवेश से जुड़ा था। रिकॉर्ड के मुताबिक, दोनों ने 17 दिसंबर 2008 को ₹3 लाख का एक चेक पोस्ट मास्टर को दिया था। इसके बाद 4 दिसंबर 2009 को इसी तरह का एक और खाता खोलने के लिए ₹3 लाख का दूसरा चेक दिया गया। इस तरह दोनों चेकों के माध्यम से कुल ₹6 लाख की रकम जमा की गई थी।
जमाकर्ताओं ने दावा किया था कि उन्होंने डाकघर के एजेंट के माध्यम से ₹10.50 लाख नकद भी जमा किए थे। उनके अनुसार, एजेंट ने रकम प्राप्त करने की लिखित पुष्टि दी थी, लेकिन यह राशि उनकी पासबुक में दर्ज नहीं की गई और न ही उन्हें वापस मिली। दोनों ने कुल ₹16.50 लाख की रकम ब्याज समेत वापस दिलाने के साथ मुआवजा और मुकदमे का खर्च देने की मांग की थी।
डाकघर ने शिकायत का विरोध करते हुए अपनी जिम्मेदारी से इनकार किया। विभाग की ओर से तर्क दिया गया कि उसके एजेंट आरसी त्रिवेदी ने कई लेनदेन में धोखाधड़ी की थी। यह भी कहा गया कि एजेंट की नियुक्ति पंचमहल के जिलाधिकारी ने की थी। विभाग का कहना था कि एजेंट द्वारा कथित रूप से किए गए धोखाधड़ी वाले लेनदेन के लिए डाकघर को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। डाकघर ने यह भी दावा किया कि खातों के खुलने से संबंधित आवश्यक प्रपत्र और विभागीय रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं थे।
जिला उपभोक्ता आयोग ने उपलब्ध दस्तावेज और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद चेक से किए गए ₹6 लाख के भुगतान को प्रमाणित माना। हालांकि, ₹10.50 लाख के कथित नकद लेनदेन के संबंध में पर्याप्त प्रमाण नहीं मिलने पर उस हिस्से के दावे को खारिज कर दिया गया। जिला आयोग ने डाकघर को ₹6 लाख की रकम ब्याज समेत लौटाने का निर्देश दिया।
इसके बाद दोनों पक्षों ने गुजरात राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दाखिल की। जमाकर्ताओं ने भी अपने दावे के संबंध में अपील की, जबकि डाकघर ने ₹6 लाख की देनदारी को चुनौती दी। राज्य आयोग ने दोनों अपीलें खारिज करते हुए जिला आयोग के आदेश को बरकरार रखा। इसके बाद डाकघर ने एनसीडीआरसी में पुनरीक्षण याचिका दाखिल की।
एनसीडीआरसी के समक्ष डाक विभाग ने दोबारा तर्क दिया कि एजेंट के कृत्य के लिए विभाग पर परोक्ष जिम्मेदारी नहीं डाली जा सकती। विभाग ने डाक नियमों और कथित रूप से उपलब्ध नहीं होने वाले खाता खोलने संबंधी दस्तावेजों का भी हवाला दिया। आयोग ने हालांकि इन दलीलों को निचली अदालतों के निष्कर्षों में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं माना।
पीठ ने कहा कि जिला और राज्य उपभोक्ता आयोग पहले ही ₹10.50 लाख के नकद लेनदेन के दावे को अलग करके उस पर पर्याप्त प्रमाण नहीं होने की स्थिति स्पष्ट कर चुके हैं। मौजूदा विवाद में केवल उन दो चेकों पर विचार किया गया, जो पोस्ट मास्टर के नाम जारी किए गए थे। निचली अदालतों ने उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर यह तथ्यात्मक निष्कर्ष दिया था कि दोनों चेकों के जरिए कुल ₹6 लाख की रकम डाकघर को प्राप्त हुई और जमा की गई।
एनसीडीआरसी ने कहा कि राज्य आयोग के तथ्यात्मक निष्कर्ष में ऐसी कोई गंभीर त्रुटि, अवैधता या महत्वपूर्ण अनियमितता नहीं है, जिसके आधार पर पुनरीक्षण अधिकार का इस्तेमाल करते हुए आदेश में हस्तक्षेप किया जाए। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि पुनरीक्षण अधिकार का दायरा सीमित है। जब निचली उपभोक्ता अदालतें साक्ष्यों की समीक्षा के बाद एक समान तथ्यात्मक निष्कर्ष दे चुकी हों, तो केवल सामान्य आपत्तियों के आधार पर उस निष्कर्ष को पलटना उचित नहीं होगा।
आयोग ने अंततः डाकघर की पुनरीक्षण याचिका खारिज कर दी और ₹6 लाख ब्याज समेत लौटाने का आदेश बरकरार रखा। फैसले में यह अंतर भी साफ रहा कि प्रमाणित चेक लेनदेन और पर्याप्त साक्ष्य से साबित न हो सके नकद दावे को एक समान नहीं माना जा सकता। मामले में डाकघर की जिम्मेदारी उस रकम तक तय हुई, जिसके भुगतान और जमा होने का रिकॉर्ड साक्ष्यों से स्थापित पाया गया।
