नई दिल्ली, 23 सितंबर 2026। देश में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर जारी बहस के बीच चुनाव आयोग के अंदर निर्णय प्रक्रिया से जुड़े गंभीर सवाल सामने आए हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की एक खोजी रिपोर्ट के मुताबिक, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने पिछले करीब दस महीनों में कम-से-कम 14 मौकों पर लिखित आपत्तियां दर्ज कीं। इन आपत्तियों का संबंध मतदाता पंजीकरण, नाम जोड़ने-हटाने, Form 6 में बदलाव, मतदाता डेटाबेस और आयोग के IT सिस्टम के संचालन जैसे विषयों से था।
बिना जानकारी और मंजूरी के आदेश जारी होने पर सवाल
रिपोर्ट के अनुसार, दोनों चुनाव आयुक्तों ने कई अवसरों पर इस बात पर आपत्ति जताई कि आयोग के नाम से कुछ आदेश या आधिकारिक संचार ऐसे जारी हुए जिनके बारे में आयोग के सभी सदस्यों की पूर्व जानकारी या मंजूरी नहीं थी। रिपोर्ट में कहा गया है कि संबंधित आपत्तियों की प्रतियां मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को भी भेजी गई थीं।
सबसे महत्वपूर्ण विवाद Form 6 को लेकर सामने आया। यह वह वैधानिक फॉर्म है जिसके माध्यम से नया मतदाता अपना नाम मतदाता सूची में दर्ज कराने के लिए आवेदन करता है। रिपोर्ट के मुताबिक, मई 2026 में चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने रिकॉर्ड पर कहा कि Form 6 में इस प्रकार बदलाव करने के लिए Registration of Electors Rules, 1960 में उचित संशोधन की आवश्यकता होगी। संधू ने भी इस दृष्टिकोण से सहमति जताई थी। बाद में ऑनलाइन Form 6 में SIR से जुड़ा एक अतिरिक्त प्रश्न जोड़े जाने पर संधू ने 13 अगस्त को इसे “unauthorised and illegal” बताते हुए तत्काल हटाने की बात कही।
मतदाता डेटाबेस के केंद्रीकरण पर भी चिंता
दोनों आयुक्तों की चिंताओं का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू मतदाता सूची से जुड़े डिजिटल सिस्टम ERONet/ECINet के नियंत्रण को लेकर था। रिपोर्ट के अनुसार, सवाल उठाया गया कि क्या Electoral Registration Officers (EROs) जैसे वैधानिक फील्ड अधिकारियों की पहुंच सीमित करते हुए मतदाता डेटाबेस का नियंत्रण दिल्ली में अधिक केंद्रीकृत हो रहा है। विवेक जोशी ने मई में मतदाता सूची डेटाबेस के ऑडिट की आवश्यकता भी बताई थी।
मामला जुलाई के अंत में और आगे बढ़ा, जब दोनों आयुक्तों ने IT व्यवस्था से जुड़े कार्य आवंटन में बदलाव को लेकर कैबिनेट सचिव को अलग-अलग पत्र लिखे। इसके अगले दिन दोनों आयुक्तों ने संयुक्त रूप से नए कार्य आवंटन आदेश को निरस्त करते हुए पुरानी व्यवस्था जारी रखने को कहा।
पश्चिम बंगाल और मतदाता सूची पर भी उठे सवाल
रिपोर्ट में पश्चिम बंगाल में SIR से जुड़े मतदाताओं के मामलों में दायर अपीलों के अधिकार और प्रक्रिया को लेकर भी संधू की आपत्तियों का उल्लेख है। सवाल यह था कि ऐसी अपीलें किसके निर्देश पर और किस प्राधिकार से दाखिल की गईं। इसी तरह गोवा में कुछ पात्र मतदाताओं से जुड़े मामलों में सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली को लेकर भी मुद्दे सामने आए।
चुनाव आयोग की ओर से अलग तस्वीर
हालांकि, इस रिपोर्ट के सामने आने के बाद चुनाव आयोग से जुड़े सूत्रों ने आंतरिक टकराव की व्याख्या को खारिज किया। उनके मुताबिक SIR समेत चुनाव आयोग के सभी संस्थागत फैसले तीनों चुनाव आयुक्तों की मंजूरी से और सर्वसम्मति से लिए गए। आयोग का कहना है कि किसी विषय पर आयुक्तों द्वारा प्रश्न या राय दर्ज करना निर्णय प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है।
कानूनी रूप से भी चुनाव आयोग तीन सदस्यीय संस्था है। Chief Election Commissioner and Other Election Commissioners Act, 2023 के तहत आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से किया जाना है और मतभेद की स्थिति में निर्णय बहुमत से किया जा सकता है।
इसलिए सामने आए दस्तावेज दो अलग लेकिन महत्वपूर्ण पहलुओं को रेखांकित करते हैं—एक ओर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा दर्ज की गई लिखित प्रक्रियागत और कानूनी आपत्तियां हैं, जबकि दूसरी ओर आयोग का पक्ष है कि अंतिम संस्थागत निर्णय सर्वसम्मति से हुए। आने वाले दिनों में इन आपत्तियों पर आयोग की विस्तृत आधिकारिक प्रतिक्रिया यह स्पष्ट करने में महत्वपूर्ण होगी कि उठाए गए प्रक्रियागत सवालों का समाधान किस तरह किया गया।
