नई दिल्ली। टाटा समूह की होल्डिंग कंपनी टाटा संस अपने कॉर्पोरेट ढांचे में बड़े बदलाव की तैयारी कर रही है। कंपनी अपनी दो गैर-सूचीबद्ध इकाइयों—टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (TCE) और टाटा इलेक्ट्रॉनिक सर्विसेज एंड सॉल्यूशंस (TESS)—का टाटा संस में विलय करने की योजना पर काम कर रही है। प्रस्तावित मर्जर से कंपनी की आय संरचना बदल सकती है और इसका असर उसकी नियामकीय स्थिति पर भी पड़ सकता है। इस पूरी कवायद का एक अहम पहलू भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) के अपर लेयर नॉन-बैंकिंग फाइनेंशियल कंपनी (NBFC-UL) से जुड़े नियम और सूचीबद्धता की बाध्यता है।
टाटा संस को RBI के स्केल-बेस्ड रेगुलेशन ढांचे के तहत अपर लेयर NBFC और कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी (CIC) के रूप में वर्गीकृत किया गया था। RBI के नियमों के मुताबिक अपर लेयर में आने वाली NBFC के लिए निर्धारित समयसीमा के भीतर शेयर बाजार में सूचीबद्ध होना जरूरी होता है। टाटा संस के मामले में यह समयसीमा सितंबर 2025 तक निर्धारित की गई थी। ऐसे में कंपनी के लिए अपनी नियामकीय स्थिति को लेकर वैकल्पिक ढांचा तैयार करना महत्वपूर्ण हो गया।
टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी टाटा ट्रस्ट्स के पास है। कंपनी के प्रस्तावित पुनर्गठन को इसी स्वामित्व ढांचे की पृष्ठभूमि में देखा जा रहा है। टाटा संस को एक निजी और स्वतंत्र होल्डिंग कंपनी के रूप में बनाए रखने की प्राथमिकता के बीच TCE और TESS का विलय आय और कारोबार की संरचना बदलने का एक संभावित रास्ता माना जा रहा है।
मर्जर की सबसे महत्वपूर्ण वजह टाटा संस की आय के स्रोत में बदलाव है। टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स इंजीनियरिंग और तकनीकी परामर्श सेवाएं देती है, जबकि TESS इलेक्ट्रॉनिक्स और संबंधित कारोबारी गतिविधियों से जुड़ी है। दोनों कंपनियों को टाटा संस में मिलाने से होल्डिंग कंपनी के स्तर पर प्रत्यक्ष कारोबारी गतिविधियों से होने वाला राजस्व बढ़ सकता है।
वर्तमान में टाटा संस की आय का बड़ा हिस्सा समूह की कंपनियों में निवेश से मिलने वाले लाभांश और अन्य वित्तीय आय से जुड़ा है। टाटा समूह की प्रमुख कंपनियों में हिस्सेदारी रखने वाली होल्डिंग कंपनी के रूप में टाटा संस का निवेश कारोबार महत्वपूर्ण है। ऐसे में TCE और TESS के ऑपरेटिंग कारोबार को सीधे टाटा संस में शामिल करने से उसकी कुल आय में कारोबारी राजस्व का हिस्सा बढ़ सकता है और वित्तीय आय पर निर्भरता का अनुपात कम हो सकता है।
यही बदलाव कंपनी की CIC और NBFC स्थिति के लिहाज से अहम हो सकता है। कोर इन्वेस्टमेंट कंपनी की मूल प्रकृति ऐसी कंपनी से जुड़ी होती है जिसका प्रमुख कारोबार समूह की कंपनियों में निवेश रखना और उनका प्रबंधन करना है। यदि किसी कंपनी की परिसंपत्तियों और आय में गैर-वित्तीय, प्रत्यक्ष कारोबारी गतिविधियों का हिस्सा पर्याप्त रूप से बढ़ता है, तो उसकी नियामकीय स्थिति प्रभावित हो सकती है। प्रस्तावित विलय को इसी दिशा में एक संभावित संरचनात्मक बदलाव के रूप में देखा जा रहा है।
अगर विलय के बाद टाटा संस संबंधित नियामकीय परिभाषाओं के दायरे से बाहर आती है, तो अपर लेयर NBFC के तौर पर लागू सूचीबद्धता की बाध्यता भी खत्म हो सकती है। ऐसी स्थिति में कंपनी को IPO के जरिए शेयर बाजार में उतरने की आवश्यकता नहीं रहेगी और टाटा संस निजी होल्डिंग कंपनी के रूप में अपना मौजूदा स्वरूप बनाए रख सकती है। हालांकि, यह परिणाम सीधे विलय से तय नहीं होगा। इसके लिए कंपनी की परिसंपत्तियों, आय और कारोबारी गतिविधियों की संरचना को लागू RBI नियमों के तहत देखा जाएगा।
प्रस्तावित मर्जर का असर टाटा ट्रस्ट्स के नियंत्रण पर भी पड़ सकता है। टाटा संस में करीब 66 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले टाटा ट्रस्ट्स के लिए होल्डिंग कंपनी का निजी स्वरूप महत्वपूर्ण है। यदि नियामकीय स्थिति बदलती है, तो टाटा संस के स्वामित्व और नियंत्रण की मौजूदा व्यवस्था को बनाए रखते हुए कंपनी को अलग नियामकीय श्रेणी में लाने की संभावना बन सकती है।
हालांकि, केवल ऑपरेटिंग आय बढ़ने से किसी कंपनी का NBFC या CIC दर्जा अपने आप समाप्त नहीं हो जाता। नियामकीय वर्गीकरण कंपनी की परिसंपत्तियों, आय के स्रोत, निवेश गतिविधियों और अन्य निर्धारित मानकों पर निर्भर करता है। इसलिए TCE और TESS के विलय के बाद टाटा संस की अंतिम स्थिति संबंधित नियामकीय मूल्यांकन और मंजूरियों पर निर्भर करेगी।
कुल मिलाकर, TCE और TESS का प्रस्तावित विलय टाटा संस के लिए सिर्फ दो कंपनियों को एक इकाई में मिलाने की प्रक्रिया नहीं है। इसके जरिए कंपनी अपनी आय में प्रत्यक्ष कारोबारी गतिविधियों का हिस्सा बढ़ाने, वित्तीय आय पर निर्भरता घटाने और RBI के NBFC ढांचे के तहत अपनी स्थिति बदलने की संभावित राह तैयार कर रही है। यदि नया ढांचा नियामकीय मानकों के अनुरूप रहा, तो टाटा संस के लिए निजी होल्डिंग कंपनी के रूप में बने रहते हुए अपर लेयर NBFC से जुड़ी सूचीबद्धता की बाध्यता से बाहर निकलने का रास्ता खुल सकता है।
