नई दिल्ली। ईरान के साथ जारी युद्ध अमेरिका के लिए लगातार महंगा साबित हो रहा है। अमेरिकी रक्षा विभाग के ताजा अनुमान के मुताबिक, युद्ध पर अब तक 47 अरब डॉलर से अधिक खर्च हो चुके हैं, जो भारतीय मुद्रा में लगभग ₹4.15 लाख करोड़ बैठता है। यह अनुमान जुलाई में सामने आए ₹3.30 लाख करोड़ के आसपास के खर्च से 25% से अधिक ज्यादा है। युद्ध में इस्तेमाल किए गए हथियारों की भरपाई, सैन्य उपकरणों के नुकसान और सैन्य अभियानों के संचालन पर होने वाला खर्च इस बढ़ोतरी की प्रमुख वजहें हैं। पेंटागन के आंतरिक आंकड़ों के मुताबिक, केवल इस्तेमाल किए जा चुके हथियारों को दोबारा भंडार में शामिल करने के लिए 29 अरब डॉलर से अधिक, यानी करीब ₹2.55 लाख करोड़ की जरूरत पड़ सकती है।
अमेरिकी रक्षा विभाग के आकलन के अनुसार, युद्ध के दौरान नष्ट या क्षतिग्रस्त हुए सैन्य उपकरणों और प्लेटफॉर्म की भरपाई के लिए भी कांग्रेस से 6 अरब डॉलर से अधिक की अतिरिक्त राशि की आवश्यकता होगी। भारतीय मुद्रा में यह रकम लगभग ₹52,800 करोड़ से ज्यादा है। इसमें युद्ध के दौरान खोए विमानों और बड़ी संख्या में नष्ट हुए ड्रोन की भरपाई भी शामिल है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों से यह स्पष्ट नहीं होता कि ईरान के मिसाइल और ड्रोन हमलों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को हुए नुकसान की मरम्मत पर आने वाला पूरा खर्च भी इस अनुमान में शामिल है या नहीं। ऐसे में वास्तविक वित्तीय बोझ इससे अधिक होने की आशंका बनी हुई है।
जुलाई के अनुमान से तेजी से बढ़ी लागत
अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ ने जुलाई में युद्ध की लागत 37.5 अरब डॉलर आंकी थी। उस समय की तुलना में ताजा अनुमान में करीब 9.5 अरब डॉलर की वृद्धि हुई है, जो भारतीय मुद्रा में लगभग ₹83,600 करोड़ होती है। इस तरह कुछ ही महीनों में युद्ध का वित्तीय बोझ काफी बढ़ गया है। ताजा अनुमान सैन्य अभियानों से जुड़ी विभिन्न लागतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। इसमें लड़ाकू विमानों की उड़ानों, सैन्य गतिविधियों के संचालन और साइबर सहायता जैसी सेवाओं पर होने वाला खर्च शामिल है।
हालांकि, यह आंकड़ा युद्ध के सभी संभावित खर्चों की अंतिम गणना नहीं है। अमेरिकी ठिकानों को हुए नुकसान की मरम्मत, भविष्य में सैन्य अभियानों की जरूरत और हथियारों के भंडार को दोबारा भरने की वास्तविक लागत के कारण आगे वित्तीय जरूरतें बढ़ सकती हैं। हथियारों की खपत और सैन्य उपकरणों का नुकसान किसी भी लंबे संघर्ष में रक्षा बजट पर अतिरिक्त दबाव डालता है। ईरान के खिलाफ अभियान में भी अमेरिका को इसी चुनौती का सामना करना पड़ रहा है।
महंगे हथियारों की रणनीति और युद्ध का बदलता स्वरूप
युद्ध की शुरुआत में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की रणनीति ईरान की रक्षा प्रणालियों को कमजोर करने के लिए महंगी और अत्याधुनिक सटीक निशाना लगाने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल करने पर केंद्रित थी। इसके बाद अपेक्षाकृत सस्ते हथियारों, खासकर हवा से गिराए जाने वाले जेडीएएम जैसे निर्देशित बमों का इस्तेमाल बढ़ाने की योजना थी। इन हथियारों की उपलब्धता अधिक होने के कारण उन्हें लंबे अभियान में उपयोगी माना जाता है।
लेकिन अप्रैल में हुए युद्धविराम ने संघर्ष की दिशा को प्रभावित किया। इस दौरान ईरान को भूमिगत भंडारण सुविधाओं से हथियार निकालने और कुछ रक्षा प्रणालियों को दोबारा सक्रिय करने का समय मिला। इसके बाद ईरान की कुछ मिसाइल और ड्रोन क्षमताएं भी फिर से सक्रिय हो गईं, जिन तक पहले पहुंचना मुश्किल था। इससे युद्ध की रणनीतिक और सैन्य चुनौतियां बढ़ीं तथा अभियान की लागत पर भी दबाव पड़ा।
नौसैनिक नाकेबंदी और दोबारा बड़े हमलों की आशंका
अमेरिका ने इसके बाद ईरान की तेल निर्यात से होने वाली आय पर दबाव डालने के लिए नौसैनिक नाकेबंदी लागू की। ट्रंप ने मध्यावधि चुनावों के बाद फिर से बड़े पैमाने पर सैन्य कार्रवाई शुरू करने की संभावना भी खुली रखी है। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, पेंटागन को आदेश मिलने की स्थिति में भारी सैन्य कार्रवाई दोबारा शुरू करने की तैयारी कर रहा है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि ऐसी कार्रवाई कब होगी या इसका दायरा कितना बड़ा हो सकता है।
युद्ध का खर्च बढ़ने के बीच अमेरिकी प्रशासन के सामने सैन्य तैयारियों को बनाए रखने और रक्षा संसाधनों की भरपाई करने की चुनौती भी है। यदि संघर्ष दोबारा तेज होता है, तो हथियारों, विमानों, सैन्य ठिकानों और अभियान संचालन पर अतिरिक्त खर्च की जरूरत पड़ सकती है। इससे पहले से बढ़ा वित्तीय बोझ और अधिक बढ़ने की आशंका है।
ऊर्जा कीमतों का असर, चुनाव से पहले बढ़ा राजनीतिक दबाव
युद्ध का असर केवल अमेरिकी रक्षा बजट तक सीमित नहीं है। वैश्विक ऊर्जा कीमतों में बढ़ोतरी ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था और राजनीतिक माहौल पर भी दबाव डाला है। ईंधन और ऊर्जा की ऊंची कीमतों से आम उपभोक्ताओं पर पड़ने वाले असर के कारण ट्रंप की लोकप्रियता पर दबाव बढ़ने की खबरें सामने आई हैं। तीन नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनावों से पहले यह मुद्दा रिपब्लिकन पार्टी के लिए महत्वपूर्ण बन गया है। इन चुनावों से अगले दो वर्षों के लिए अमेरिकी कांग्रेस के दोनों सदनों का नियंत्रण तय होगा।
रिपब्लिकन पार्टी के पास प्रतिनिधि सभा और सीनेट, दोनों में मामूली बहुमत है। ऐसे में युद्ध की लागत, ऊर्जा कीमतों और सैन्य अभियान को लेकर उठ रहे सवाल चुनावी राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, युद्ध पर बढ़ते खर्च का राजनीतिक नतीजों पर कितना असर पड़ेगा, यह चुनाव के परिणामों से ही स्पष्ट होगा।
कुल मिलाकर, ईरान युद्ध पर 47 अरब डॉलर से अधिक का अनुमानित खर्च अमेरिका के सामने सैन्य और वित्तीय चुनौतियों की गंभीरता को दिखाता है। हथियारों की भरपाई पर अकेले ₹2.55 लाख करोड़ से अधिक खर्च होने का अनुमान है, जबकि उपकरणों और विमानों के नुकसान की भरपाई के लिए भी हजारों करोड़ रुपये की जरूरत पड़ सकती है। यदि संघर्ष फिर तेज होता है, तो अमेरिका को न केवल सैन्य रणनीति पर दोबारा विचार करना होगा, बल्कि युद्ध के बढ़ते खर्च और उसके आर्थिक प्रभावों से निपटने के लिए भी अतिरिक्त संसाधन जुटाने पड़ सकते हैं।
