लंदन। क्रिप्टोकरेंसी की दुनिया में साइबर सुरक्षा का खतरा अब केवल स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट हैक या तकनीकी खामियों तक सीमित नहीं रह गया है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) की मदद से होने वाली धोखाधड़ी, फर्जी पहचान, डीपफेक और सोशल इंजीनियरिंग तेजी से बड़ा खतरा बन रहे हैं। Chainalysis के आंकड़ों के अनुसार, 2025 में क्रिप्टो स्कैम से जुड़े ऑन-चेन फंड का प्रवाह कम से कम $14 बिलियन रहा। हालांकि, इस पूरी रकम को AI आधारित ठगी से जोड़ना सही नहीं होगा।
साइबर अपराधियों ने AI का इस्तेमाल फर्जी पहचान तैयार करने, निवेशकों का रूप धारण करने और पीड़ितों के साथ विश्वसनीय बातचीत करने के लिए बढ़ाया है। विशेषज्ञों के मुताबिक, AI अब अलग तरह की तकनीक के बजाय साइबर ठगी की कई प्रक्रियाओं में शामिल एक सामान्य उपकरण बनता जा रहा है। डीपफेक, फेस-स्वैपिंग सॉफ्टवेयर और बड़े भाषा मॉडल अपराधियों को बड़े पैमाने पर नकली पहचान तैयार करने में मदद कर सकते हैं।
Chainalysis के अनुसार, AI विक्रेताओं से ऑन-चेन लिंक वाले स्कैम में औसत रकम करीब $3.2 मिलियन प्रति ऑपरेशन थी, जबकि ऐसे लिंक के बिना स्कैम में यह आंकड़ा करीब $719,000 रहा। यह आंकड़ा दोनों के बीच संबंध दिखाता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि AI के इस्तेमाल से ही ठगी की रकम बढ़ी।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, AI आधारित साइबर अपराधों का सबसे खतरनाक पहलू यह है कि अपराधी तकनीक का इस्तेमाल केवल संदेश या सामग्री तैयार करने के लिए नहीं, बल्कि पीड़ित का भरोसा हासिल करने और उसकी निर्णय लेने की क्षमता को प्रभावित करने के लिए कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि क्रिप्टो लेनदेन में एक बार पीड़ित स्वयं अधिकृत होकर रकम ट्रांसफर कर देता है तो तकनीकी सिस्टम के लिए यह पहचानना कठिन हो सकता है कि निर्णय धोखे के दबाव में लिया गया था।
क्रिप्टो क्षेत्र में पारंपरिक हैक का स्वरूप भी बदल रहा है। Binance Research के अनुसार, अप्रैल 2026 में DeFi से जुड़े करीब $621 मिलियन के नुकसान में लगभग दो-तिहाई एक्सेस-कंट्रोल से जुड़ी खामियों के कारण हुआ। इसका अर्थ है कि अपराधियों को हमेशा स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट का कोड तोड़ने की जरूरत नहीं होती। वे उस व्यक्ति, वॉलेट, क्रेडेंशियल या गवर्नेंस सिस्टम को निशाना बना सकते हैं जिसके पास प्रोटोकॉल को नियंत्रित करने का अधिकार है।
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Binance के मुख्य सुरक्षा अधिकारी जिमी सु के अनुसार, जैसे-जैसे स्मार्ट कॉन्ट्रैक्ट की सुरक्षा बेहतर हो रही है, हमलावर लोगों, क्रेडेंशियल और गवर्नेंस सिस्टम की ओर अपना ध्यान बढ़ा रहे हैं। इससे क्रिप्टो प्रोटोकॉल की सुरक्षा का दायरा केवल कोड की सुरक्षा से आगे बढ़कर उन लोगों और प्रणालियों तक पहुंच गया है जो उस कोड को नियंत्रित करते हैं।
क्रिप्टो लेनदेन की ब्लॉकचेन पारदर्शिता जांच एजेंसियों के लिए महत्वपूर्ण फायदा है, लेकिन किसी वॉलेट के पीछे वास्तविक व्यक्ति या संगठन की पहचान करना अब भी चुनौतीपूर्ण है। मिक्सिंग सेवाएं और दूसरे तरीके फंड के अंतिम स्रोत और लाभार्थी तक पहुंचने की प्रक्रिया को जटिल बना सकते हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ब्लॉकचेन पर पैसे की गतिविधि देखी जा सकती है, लेकिन उससे अपने आप अपराधी की पहचान साबित नहीं होती।
इसी बीच AI एजेंटों के बढ़ते इस्तेमाल ने एक नई चुनौती खड़ी कर दी है। भविष्य में AI एजेंट उपयोगकर्ता की ओर से खरीदारी, सेवाओं के लिए भुगतान और अन्य वित्तीय लेनदेन कर सकते हैं। ऐसी स्थिति में सामने वाले पक्ष के लिए यह सत्यापित करना मुश्किल हो सकता है कि लेनदेन के पीछे जवाबदेह इंसान कौन है।
इस समस्या से निपटने के लिए कुछ कंपनियां AI एजेंट की पहचान को उसके सत्यापित मानव मालिक से जोड़ने की दिशा में काम कर रही हैं। लेकिन पहचान, गोपनीयता और जवाबदेही के बीच संतुलन अभी बड़ी चुनौती है। विशेषज्ञों का कहना है कि केवल यह जानना पर्याप्त नहीं होगा कि कोई लेनदेन ब्लॉकचेन पर वैध तरीके से हुआ; यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लेनदेन शुरू करने वाला व्यक्ति या एजेंट वास्तव में अधिकृत और जवाबदेह है।
साइबर अपराध के साथ-साथ बचाव के लिए भी AI का इस्तेमाल बढ़ रहा है। बैंक और क्रिप्टो कंपनियां संदिग्ध वॉलेट, स्कैम से जुड़े गंतव्यों और असामान्य लेनदेन की पहचान के लिए स्वचालित प्रणालियों का उपयोग कर रही हैं। इससे ठगी की रकम ट्रांसफर होने से पहले जोखिम की पहचान करने की क्षमता बढ़ सकती है।
क्रिप्टो क्षेत्र के सामने अब चुनौती दोहरी है। एक तरफ अपराधी AI की मदद से अधिक विश्वसनीय धोखाधड़ी तैयार कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सुरक्षा प्रणालियां भी AI आधारित निगरानी पर निर्भर हो रही हैं। तकनीक और अपराध के इस बदलते मुकाबले में सबसे कमजोर कड़ी अब केवल कोड नहीं, बल्कि इंसान, उसकी पहचान और वह प्रक्रिया हो सकती है जिसके जरिए किसी वित्तीय लेनदेन को मंजूरी दी जाती है।
