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विशेष छूट वाली दवाओं के डायवर्जन पर एफएसडीए की सख्ती, गलत जगह बिक्री पर लगेगी रोक

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksSeptember 26, 2026No Comments4 Mins Read
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कंपनियों, सीएंडएफ एजेंटों और स्टॉकिस्टों को अब वास्तविक अस्पताल या चिकित्सक के नाम पर ही बिलिंग करनी होगी; सस्ती दवाओं की आड़ में फर्जी बिलिंग और नकली दवाओं की बिक्री रोकने की कवायद
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लखनऊ। नकली, काउंटरफिट और अधोमानक दवाओं की बिक्री पर प्रभावी अंकुश लगाने के साथ मरीजों को उचित कीमत पर गुणवत्तापरक दवाएं उपलब्ध कराने के लिए खाद्य सुरक्षा एवं औषधि प्रशासन (एफएसडीए) ने दवाओं की विशेष छूट वाली संस्थागत आपूर्ति के डायवर्जन पर सख्ती कर दी है। विभाग ने कंपनियों और दवा आपूर्ति श्रृंखला से जुड़े कारोबारियों के लिए ऐसे निर्देश जारी किए हैं, जिनके तहत विशेष छूट पर दी जाने वाली दवाओं की बिलिंग और वास्तविक आपूर्ति के बीच किसी तरह का अंतर नहीं होना चाहिए।
विभाग के संज्ञान में आया है कि कई दवा निर्माता और विपणनकर्ता कंपनियां चिकित्सकों, अस्पतालों और नर्सिंग होम को विशेष छूट पर दवाओं की आपूर्ति करती हैं। इसके लिए कंपनियां अपने सीएंडएफ एजेंट, सुपर डिस्ट्रीब्यूटर या स्टॉकिस्ट के माध्यम से दवाएं उपलब्ध कराती हैं। सामान्य व्यवस्था में जिन चिकित्सकों या संस्थानों के लिए दवाएं भेजी जानी होती हैं, उनकी पहचान बिलिंग के स्तर पर दर्ज की जानी चाहिए। हालांकि, कुछ मामलों में कथित तौर पर इस व्यवस्था का पालन नहीं किया जाता।
बताया गया है कि कंपनियां या उनके सीएंडएफ एजेंट दवाओं की बिलिंग वास्तविक लाभार्थी चिकित्सक या अस्पताल के नाम पर करने के बजाय अपने स्टॉकिस्ट के नाम पर कर देते हैं। इसके बाद स्टॉकिस्ट बिल में दर्ज चिकित्सक या अस्पताल को दवा भेजने के बजाय किसी दूसरे विक्रेता या फर्म को उसकी आपूर्ति कर देते हैं। इस तरह विशेष संस्थागत छूट के तहत उपलब्ध कराई गई दवाएं अपने निर्धारित गंतव्य से हटकर सामान्य बाजार में पहुंच सकती हैं।
एफएसडीए की आयुक्त की ओर से जारी आदेश में इस तरह की प्रथा पर रोक लगाने के निर्देश दिए गए हैं। विभाग के मुताबिक, विशेष छूट पर हासिल की गई दवाओं को अन्य थोक विक्रेताओं की तुलना में कम कीमत पर बाजार में बेचने से संबंधित स्टॉकिस्ट को अनुचित कारोबारी लाभ मिल सकता है। इससे दवा बाजार में स्वस्थ प्रतिस्पर्धा प्रभावित होने की आशंका रहती है और दूसरे विक्रेताओं के लिए प्रतिस्पर्धा की स्थिति असमान हो सकती है।
विभाग ने विशेष चिंता नकली दवाओं की संभावित बिक्री को लेकर जताई है। आदेश के अनुसार, कई बार विशेष छूट या कम कीमत पर उपलब्ध दवाओं की आपूर्ति की आड़ में फर्जी बिल तैयार किए जाने की आशंका रहती है। ऐसी स्थिति में वास्तविक आपूर्ति और दस्तावेजों में दर्ज आपूर्ति के बीच अंतर पैदा हो सकता है। जांच के दौरान इस तरह के दस्तावेजों का इस्तेमाल दवा के स्रोत और उसकी बिक्री का रिकॉर्ड दिखाने के लिए किया जा सकता है। इससे नकली, काउंटरफिट या अधोमानक दवाओं के कारोबार की पहचान करना भी मुश्किल हो सकता है।
नए निर्देशों के तहत दवा निर्माता कंपनियों, विपणनकर्ताओं, सीएंडएफ एजेंटों, सुपर डिस्ट्रीब्यूटर और स्टॉकिस्टों को यह सुनिश्चित करना होगा कि दवा की बिलिंग उसी चिकित्सक या संस्थान के नाम पर हो, जहां वास्तव में उसकी आपूर्ति की जानी है। यानी जिस अस्पताल, नर्सिंग होम या चिकित्सक के लिए विशेष छूट के तहत दवा उपलब्ध कराई गई है, बिक्री दस्तावेजों में उसी का उल्लेख होना चाहिए।
इसके साथ ही विभाग ने बिक्री बिल में “बिल टू” और “शिप्ड टू” व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग को रोकने पर भी जोर दिया है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बिल में एक पक्ष का नाम दर्ज करके दवा किसी दूसरे विक्रेता या फर्म को भेजने की व्यवस्था का इस्तेमाल विशेष छूट वाली दवाओं के डायवर्जन के लिए न किया जा सके।
एफएसडीए की इस पहल से दवा की आपूर्ति श्रृंखला में निर्माता से लेकर अंतिम संस्थागत खरीदार तक रिकॉर्ड को अधिक स्पष्ट रखने की कोशिश की गई है। विभाग का मानना है कि बिलिंग और वास्तविक आपूर्ति का मिलान होने से दवाओं के स्रोत, कीमत और गंतव्य की निगरानी आसान होगी। साथ ही विशेष छूट वाली दवाओं को अनधिकृत तरीके से खुले बाजार में पहुंचाने की संभावनाओं पर भी अंकुश लगाया जा सकेगा। इससे मरीजों तक गुणवत्तापरक दवाओं की सुरक्षित और निर्धारित आपूर्ति सुनिश्चित करने में मदद मिलने की उम्मीद है।
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