वाशिंगटन/नई दिल्ली। अमेरिका में H-1B वीजा कार्यक्रम को लेकर विवाद एक बार फिर तेज हो गया है। FY 2025 के ताज़ा आंकड़ों और राजनीतिक आरोपों ने इस मुद्दे को अमेरिकी आव्रजन नीति की सबसे बड़ी बहसों में शामिल कर दिया है। यह कार्यक्रम अमेरिकी कंपनियों को उच्च कुशल विदेशी पेशेवरों को नियुक्त करने की अनुमति देता है, लेकिन अब यह फ्रॉड, वेतन दबाव और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गंभीर सवालों के केंद्र में आ गया है।
आधिकारिक USCIS डेटा के अनुसार, FY 2025 में अमेरिका में कुल 4,70,342 H-1B रजिस्ट्रेशन दर्ज किए गए, जो पिछले वर्षों की तुलना में उल्लेखनीय गिरावट है। यह कमी नए beneficiary-centric चयन सिस्टम के कारण आई है, जिसका उद्देश्य डुप्लीकेट एंट्री और सिस्टम के दुरुपयोग को रोकना बताया गया है। इस प्रक्रिया के तहत 1,27,624 यूनिक बेनिफिशियरी चयनित किए गए।
FY 2024 में यह संख्या काफी अधिक थी, जब कुल 7,80,884 रजिस्ट्रेशन हुए थे और दो चरणों में 1,88,400 चयन किए गए थे। यह आंकड़े दर्शाते हैं कि H-1B वीजा प्रणाली अब भी अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और मांग में बनी हुई है।
इस कार्यक्रम की वैधानिक वार्षिक सीमा 85,000 नए वीजा की है, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार वास्तविक जारी किए गए वीजा इससे कहीं अधिक होते हैं क्योंकि इसमें रिन्यूअल और कैप-एक्जेम्प्ट श्रेणियां भी शामिल होती हैं। उदाहरण के तौर पर FY 2023 में 3,86,000 से अधिक याचिकाएं स्वीकृत हुई थीं।
टेक सेक्टर पर भारी निर्भरता
H-1B वीजा का सबसे बड़ा उपयोग तकनीकी और इंजीनियरिंग क्षेत्रों में होता है। आंकड़ों के अनुसार लगभग 80% H-1B वर्कर्स कंप्यूटर साइंस, इंजीनियरिंग, गणित और संबंधित क्षेत्रों में कार्यरत हैं। इनमें से बड़ी संख्या के पास मास्टर्स या उससे उच्च डिग्री होती है।
उद्योग जगत का कहना है कि यह व्यवस्था अमेरिका में स्किल्ड टैलेंट की कमी को पूरा करने के लिए आवश्यक है, खासकर उस समय जब टेक्नोलॉजी और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में विशेषज्ञों की मांग तेजी से बढ़ रही है।
राजनीतिक विवाद तेज हुआ
विवाद तब और गहरा गया जब रिपब्लिकन सेनेटर एरिक श्मिट ने H-1B प्रोग्राम को “आर्थिक विश्वासघात” और “राष्ट्रीय सुरक्षा जोखिम” करार दिया। उन्होंने आरोप लगाया कि यह प्रणाली अमेरिकी कामगारों को नुकसान पहुंचा रही है और इसमें बड़े पैमाने पर दुरुपयोग हो रहा है।
उनके अनुसार, वीजा प्रक्रिया में मौजूद खामियों का फायदा उठाकर विदेशी कर्मचारियों की भर्ती बढ़ रही है, जिससे घरेलू रोजगार पर असर पड़ रहा है। उनके बयानों के बाद राजनीतिक हलकों में तीखी बहस छिड़ गई है।
आंकड़ों के मुताबिक भारत इस कार्यक्रम का सबसे बड़ा लाभार्थी देश बना हुआ है। FY 2024 में 2,83,397 भारतीय नागरिकों को H-1B वीजा स्वीकृत हुआ, जो कुल अनुमोदनों का लगभग 71% है। यह प्रवृत्ति पिछले कई वर्षों से लगातार बनी हुई है।
अमेज़न, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी बड़ी टेक कंपनियां इस वीजा कार्यक्रम की प्रमुख स्पॉन्सर हैं, साथ ही कई भारतीय आईटी कंपनियां भी इसमें अहम भूमिका निभाती हैं।
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समर्थकों की दलीलें
दूसरी ओर, इमिग्रेशन विशेषज्ञों का कहना है कि इस बहस में कई बार आंकड़ों की गलत व्याख्या की जाती है। उनका तर्क है कि कुल H-1B संख्या में एक बड़ा हिस्सा रिन्यूअल का होता है, न कि नए आने वाले कर्मचारियों का।
विशेषज्ञों के अनुसार यह कार्यक्रम अमेरिकी अर्थव्यवस्था और इनोवेशन को मजबूती देता है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां स्थानीय प्रतिभा की कमी है। कई कंपनियों का कहना है कि H-1B वर्कर्स के बिना प्रोजेक्ट्स में देरी और प्रतिस्पर्धा पर असर पड़ सकता है।
अमेरिकी नौकरी बाजार पर बहस जारी
H-1B वर्कर्स द्वारा अमेरिकी नौकरियों पर प्रभाव को लेकर बहस लगातार जारी है। कुछ शोध बताते हैं कि विदेशी स्किल्ड वर्कर्स की उपस्थिति से बेरोजगारी नहीं बढ़ती, बल्कि कई मामलों में रोजगार और वेतन दोनों में वृद्धि देखी गई है।
हालांकि आलोचकों का कहना है कि वेतन संरचना और आउटसोर्सिंग मॉडल में मौजूद खामियों के कारण कंपनियां लागत कम करने के लिए इस प्रणाली का उपयोग कर सकती हैं, जिससे घरेलू श्रमिकों पर दबाव बढ़ता है।
बड़ा नीतिगत सवाल
H-1B वीजा आज वैश्विक प्रतिभा के लिए अमेरिका में प्रवेश का सबसे महत्वपूर्ण माध्यम बना हुआ है। लेकिन यह अब आव्रजन नीति, रोजगार सुरक्षा और तकनीकी प्रतिस्पर्धा के बीच गहरे टकराव का प्रतीक भी बन गया है।
आने वाले समय में इस कार्यक्रम का भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि अमेरिकी नीति निर्माता इसे और सख्त नियंत्रण में लाते हैं या वैश्विक प्रतिभा के लिए और अधिक लचीला बनाते हैं।
