नई दिल्ली: कॉरपोरेट दिवालिया मामलों में फर्जी और संदिग्ध लेनदेन से जुड़े धन और संपत्तियों की पहचान कर उनकी रिकवरी बेहतर करने के लिए Insolvency and Bankruptcy Board of India (IBBI) एक नया इंटर-एजेंसी मैकेनिज्म तैयार कर रहा है। प्रस्तावित व्यवस्था के तहत Ministry of Corporate Affairs (MCA), Reserve Bank of India (RBI), बैंकों और Enforcement Directorate (ED) के बीच संदिग्ध वित्तीय लेनदेन से जुड़ी जानकारी अधिक व्यवस्थित और तेज तरीके से साझा करने की कोशिश की जाएगी।
सूत्रों के अनुसार, अगले चार से पांच महीनों में इस दिशा में एक तंत्र लागू किया जा सकता है। इसका उद्देश्य इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया के दौरान Resolution Professionals (RPs) को कॉरपोरेट देनदारों की वित्तीय गतिविधियों, बैंकिंग रिकॉर्ड और संपत्तियों से जुड़े डेटा तक बेहतर पहुंच उपलब्ध कराना है। इससे लेनदारों को कंपनी की वास्तविक संपत्ति और संभावित रिकवरी का अधिक सटीक आकलन करने में मदद मिल सकती है।
Insolvency and Bankruptcy Code (IBC) के तहत avoidance transactions ऐसे वित्तीय या संपत्ति हस्तांतरण हैं, जो किसी कंपनी के दिवालिया होने से पहले किए जाते हैं और जिनसे कंपनी की संपत्ति अनुचित तरीके से कम हो सकती है या किसी खास पक्ष को फायदा पहुंच सकता है। जब RP को ऐसे संदिग्ध लेनदेन का पता चलता है तो वह उन्हें रद्द कराने और संपत्ति या रकम वापस लाने के लिए National Company Law Tribunal (NCLT) में आवेदन कर सकता है।
मौजूदा व्यवस्था में सबसे बड़ी चुनौती संदिग्ध लेनदेन की पहचान के बाद रकम और संपत्ति की वास्तविक स्थिति पता लगाने तथा उसे वापस हासिल करने की है। हालिया संसदीय समिति की रिपोर्ट ने फंड डायवर्जन और avoidance transactions को गंभीर चिंता का विषय बताया है। रिपोर्ट के मुताबिक, ₹3.76 लाख करोड़ मूल्य वाले 1,326 avoidance applications दायर किए गए, लेकिन इन मामलों में अब तक लगभग ₹7,500 करोड़ की ही रिकवरी हो सकी है।
रिपोर्ट में कहा गया कि मामलों की बड़ी संख्या और रिकवरी के बीच इतना बड़ा अंतर संभावित फंड डायवर्जन और उसके कारण कंपनियों की संपत्ति की गुणवत्ता पर पड़ने वाले गंभीर प्रभाव को दर्शाता है। RBI ने संसदीय समिति को बताया था कि फंड डायवर्जन की जांच के लिए credit audits जैसी व्यवस्थाएं मौजूद हैं और बड़े उधारकर्ताओं के खातों की निगरानी की प्राथमिक जिम्मेदारी बैंकों की होती है।
संसदीय समिति ने IBC में बदलाव की सिफारिश करते हुए Resolution Professionals को avoidance transactions और फंड डायवर्जन की गहन और समयबद्ध जांच करने के लिए अधिक अधिकार देने की बात कही है। समिति के अनुसार, इससे संदिग्ध संपत्तियों और रकम की जल्द पहचान हो सकती है और उन्हें वापस लाने की प्रक्रिया तेज की जा सकती है।
विशेषज्ञों के मुताबिक, avoidance proceedings में लेनदेन का मूल्यांकन, उसका व्यावसायिक उद्देश्य, संबंधित पक्षों के संबंध, लेनदेन का समय, उसके प्रभाव और संबंधित पक्षों की मंशा जैसे कई पहलुओं की जांच करनी पड़ती है। यही वजह है कि ऐसे मामलों का निपटारा अक्सर लंबा खिंचता है। इंसॉल्वेंसी प्रक्रिया समयबद्ध होने के बावजूद NCLT आमतौर पर insolvency admission, Corporate Insolvency Resolution Process (CIRP) और resolution plans जैसे मामलों को प्राथमिकता देता है, जिससे avoidance applications पर सुनवाई बाद में हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि प्रस्तावित समयबद्ध व्यवस्था में RP को शुरुआती चरण में transaction-risk assessment करना, forensic जांच कराना और उसके निष्कर्ष तथा आगे की कार्रवाई का प्रस्ताव Committee of Creditors और NCLT के सामने निर्धारित समय में रखना चाहिए।
मौजूदा नियमों के अनुसार RP को insolvency commencement date के 75वें दिन तक avoidance transaction के अस्तित्व पर राय बनानी होती है। 115वें दिन तक उसका determination करने और 135वें दिन तक संबंधित आवेदन NCLT के समक्ष दाखिल करने का प्रावधान है। हालांकि, विशेषज्ञों के अनुसार इन समयसीमाओं को अब तक मुख्य रूप से निर्देशात्मक माना गया है। इनका कड़ाई से पालन सुनिश्चित होने पर संदिग्ध लेनदेन की पहचान और कार्रवाई तेज हो सकती है।
प्रस्तावित व्यवस्था में IBBI और मंत्रालय RBI, बैंकों, information utilities और ED के साथ सुरक्षित और प्रोटोकॉल आधारित डेटा शेयरिंग सिस्टम बना सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार समस्या अक्सर अधिकारों की कमी नहीं बल्कि अलग-अलग एजेंसियों में बिखरे डेटा और जरूरी जानकारी मिलने में होने वाली देरी की होती है।
हालांकि, डेटा साझा करने की व्यवस्था में गोपनीयता और कारोबारी रूप से संवेदनशील सूचनाओं की सुरक्षा के लिए स्पष्ट प्रावधान जरूरी होंगे। साथ ही संपत्तियों की पहचान, उन्हें वापस हासिल करने और ED के कब्जे में मौजूद संपत्तियों की सशर्त रिहाई जैसी चुनौतियां भी बनी रह सकती हैं। प्रस्तावित इंटर-एजेंसी ढांचा इन बाधाओं को कम कर कॉरपोरेट धोखाधड़ी से जुड़ी संपत्तियों की जल्द पहचान और लेनदारों के लिए बेहतर रिकवरी सुनिश्चित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
