नई दिल्ली। अंतरिक्ष में बढ़ती सैन्य गतिविधियों ने दुनिया की प्रमुख शक्तियों के बीच संभावित टकराव को लेकर चिंता बढ़ा दी है। विशेषज्ञों ने आशंका जताई है कि अगले पांच वर्षों में अंतरिक्ष सैन्य संघर्ष का नया मोर्चा बन सकता है। अमेरिका, चीन, रूस और ब्रिटेन सहित कई देश अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं को मजबूत करने में जुटे हैं। यदि किसी संघर्ष के दौरान संचार या नेविगेशन उपग्रहों को निशाना बनाया गया, तो इसका असर इंटरनेट, जीपीएस, टीवी प्रसारण, मौसम पूर्वानुमान, हवाई यातायात और बैंकिंग सेवाओं पर पड़ सकता है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में इन सेवाओं की व्यापक भूमिका को देखते हुए अंतरिक्ष में किसी बड़े व्यवधान के परिणाम दूरगामी हो सकते हैं।
अंतरिक्ष अब केवल वैज्ञानिक अनुसंधान, संचार और मौसम संबंधी जानकारी हासिल करने का माध्यम नहीं रह गया है। सैन्य रणनीति में भी उपग्रहों की भूमिका लगातार बढ़ रही है। सेनाएं निगरानी, संचार, लक्ष्य की पहचान और सटीक नेविगेशन के लिए अंतरिक्ष आधारित प्रणालियों पर निर्भर हैं। ऐसे में इन प्रणालियों को बाधित करने या निष्क्रिय करने की क्षमता किसी भी संघर्ष में रणनीतिक बढ़त हासिल करने का साधन बन सकती है।
ब्रिटेन की अंतरिक्ष कंपनियां भी उपग्रहों की निगरानी, उनकी कक्षा में गतिविधियों को नियंत्रित करने और संभावित खतरों से निपटने वाली तकनीकों पर काम कर रही हैं। ब्रिटेन के रक्षा मंत्रालय ने एस्ट्रोस्केल और ऑर्बिट फैब जैसी कंपनियों को अंतरिक्ष सुरक्षा से जुड़े कार्यक्रमों में शामिल किया है। इन प्रयासों का उद्देश्य अंतरिक्ष में मौजूद उपकरणों की सुरक्षा और संभावित विरोधी गतिविधियों पर नजर रखने की क्षमताओं को मजबूत करना है।
इसी बीच, अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने रूस के कॉस्मॉस-2553 उपग्रह को लेकर भी चिंता जताई है। आशंका व्यक्त की गई है कि 2022 में प्रक्षेपित इस उपग्रह में परमाणु उपकरण से जुड़े कुछ हिस्से भेजे गए हो सकते हैं। हालांकि, इस तरह के आकलनों और दावों की पुष्टि तथा उनके वास्तविक उद्देश्य को लेकर सावधानी बरतना जरूरी है।
उपग्रहों पर हमले के पांच प्रमुख तरीके
अंतरिक्ष में सैन्य संघर्ष की स्थिति में उपग्रहों को निशाना बनाने के कई तरीके हो सकते हैं। इनमें मिसाइल से उपग्रह को नष्ट करना, रेडियो संकेतों को बाधित करना, नकली संकेत भेजना, जमीन पर मौजूद नियंत्रण केंद्रों पर साइबर हमला करना और दूसरे अंतरिक्ष यानों के जरिए नजदीक पहुंचकर निगरानी या हस्तक्षेप करना शामिल है।
उपग्रह-रोधी मिसाइलों के इस्तेमाल से अंतरिक्ष में मलबा फैल सकता है। वर्ष 2007 में चीन ने अपनी एक मौसम संबंधी उपग्रह को मिसाइल से नष्ट किया था। अमेरिका, रूस और भारत भी उपग्रह-रोधी क्षमता का प्रदर्शन कर चुके हैं। इस तरह के हमले का खतरा केवल निशाना बनाए गए उपग्रह तक सीमित नहीं रहता। विस्फोट से पैदा हुए मलबे के टुकड़े अन्य उपग्रहों और अंतरिक्ष यानों से टकराकर उन्हें भी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इससे लंबे समय तक अंतरिक्ष गतिविधियां प्रभावित होने का जोखिम पैदा होता है।
दूसरा तरीका उपग्रहों से आने वाले रेडियो संकेतों को जाम करना है। जीपीएस जैसी प्रणालियों के संकेत बाधित होने पर विमान, जहाज और जमीन पर चलने वाले वाहन अपनी सटीक स्थिति निर्धारित करने में कठिनाई का सामना कर सकते हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान जीपीएस संकेतों में रुकावट की घटनाएं सामने आई हैं। इससे स्पष्ट होता है कि इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप आधुनिक सैन्य और नागरिक प्रणालियों के लिए गंभीर चुनौती बन सकता है।
तीसरा तरीका स्पूफिंग है, जिसमें वास्तविक संकेतों के स्थान पर नकली संकेत भेजे जाते हैं। इससे किसी उपकरण को उसकी वास्तविक स्थिति या समय के बारे में गलत जानकारी मिल सकती है। नेविगेशन प्रणाली पर निर्भर सेवाओं में ऐसी गड़बड़ी से मार्ग निर्धारण और संचालन प्रभावित हो सकता है।
चौथा तरीका उपग्रहों को नियंत्रित करने वाले जमीन पर स्थित कंप्यूटरों और कमांड सेंटरों को निशाना बनाना है। साइबर हमले के जरिए उपग्रह से संपर्क बाधित करने, संवेदनशील जानकारी चुराने या उसके संचालन में हस्तक्षेप करने की कोशिश की जा सकती है। पांचवें तरीके में दूसरा अंतरिक्ष यान किसी उपग्रह के बेहद करीब पहुंचकर उसकी गतिविधियों की निगरानी कर सकता है या उसमें हस्तक्षेप करने की कोशिश कर सकता है।
चीन, रूस और अमेरिका की बढ़ती अंतरिक्ष प्रतिस्पर्धा
अमेरिकी स्पेस फोर्स के अनुसार, चीन के पांच उपग्रहों ने अंतरिक्ष में एक-दूसरे के बेहद करीब पहुंचकर ऐसी गतिविधियां कीं, जिन्हें सैन्य अभ्यास जैसी क्षमताओं के विकास से जोड़कर देखा गया। चीन रोबोटिक उपकरणों के जरिए अंतरिक्ष में मौजूद वस्तुओं को पकड़ने और उनकी स्थिति बदलने की तकनीक पर भी काम कर रहा है। रूस के सैन्य उपग्रहों की दूसरे देशों के उपग्रहों के करीब पहुंचने की गतिविधियों ने भी सुरक्षा संबंधी सवाल खड़े किए हैं।
ब्रिटेन की वायुसेना ने अपने उपग्रहों की सुरक्षा के लिए एक विशेष अंतरिक्ष इकाई गठित की है। यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी की परियोजनाओं में भी सुरक्षा और संभावित दोहरे उपयोग वाली तकनीकों पर ध्यान बढ़ रहा है। विभिन्न देश लेजर आधारित प्रणालियों, विद्युत चुंबकीय ऊर्जा से जुड़े हथियारों और उपग्रहों को पकड़ने वाले उपकरणों पर अनुसंधान कर रहे हैं।
अंतरिक्ष में सैन्य क्षमताओं का विस्तार वैश्विक संचार, नेविगेशन और आर्थिक गतिविधियों की सुरक्षा के लिए नई चुनौती पेश कर रहा है। हालांकि, अगले पांच वर्षों में युद्ध छिड़ने की आशंका को निश्चित भविष्यवाणी नहीं माना जा सकता। वास्तविक जोखिम इस बात पर निर्भर करेगा कि देश अपनी अंतरिक्ष क्षमताओं का इस्तेमाल किस तरह करते हैं और संभावित टकराव को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कितने प्रभावी कदम उठाए जाते हैं।
