नई दिल्ली। जी ग्रुप के संस्थापक सुभाष चंद्र ने राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय अधिकरण (NCLAT) का रुख करते हुए राष्ट्रीय कंपनी विधि अधिकरण (NCLT) की पांच सदस्यीय विशेष पीठ के 1 सितंबर के आदेश को चुनौती दी है। इस आदेश में चंद्र को अपनी किसी भी संपत्ति को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से हस्तांतरित करने से रोक दिया गया था। NCLAT ने अपील पर सुनवाई करते हुए चंद्र को मामले में शामिल लेनदारों को याचिका की प्रतियां उपलब्ध कराने का निर्देश दिया और अगली सुनवाई 29 सितंबर के लिए तय की।
मामला इंडियाबुल्स हाउसिंग फाइनेंस लिमिटेड की ओर से दिवाला और दिवालियापन संहिता (IBC) की धारा 95 के तहत शुरू की गई व्यक्तिगत दिवाला कार्यवाही से जुड़ा है। चंद्र ने इन कार्यवाहियों में लेनदारों के लिए ₹6.25 करोड़ के भुगतान की पुनर्भुगतान योजना पेश की थी। योजना में दिवाला प्रक्रिया की लागत के लिए अतिरिक्त ₹25 लाख रखे गए थे। इसके मुकाबले स्वीकृत दावों की कुल राशि ₹22,006.57 करोड़ बताई गई है।
चंद्र की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता ध्रुव मेहता ने NCLAT को बताया कि अपील मुख्य रूप से NCLT की विशेष पीठ के 1 सितंबर के आदेश के खिलाफ है। सुनवाई के दौरान कई लेनदारों ने आपत्ति जताई कि उन्हें अपील की प्रतियां नहीं मिली हैं या NCLT की कार्यवाही में शामिल होने के बावजूद उन्हें मामले में पक्षकार नहीं बनाया गया है। इसके बाद NCLAT ने चंद्र को उपस्थित पक्षों को उसी दिन अपील की प्रतियां देने और आवश्यक पक्षकारों को शामिल करने के लिए कदम उठाने को कहा।
चंद्र ने अपनी अपील में मुख्य रूप से तर्क दिया है कि NCLT की विशेष प्रधान पीठ ने उन सीमित मुद्दों से आगे जाकर आदेश पारित किया, जिन पर मूल पीठ के सदस्यों के बीच मतभेद था। उन्होंने अपनी संपत्तियों को “किसी भी रूप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष” तरीके से हस्तांतरित करने पर लगाई गई व्यापक रोक को भी चुनौती दी है।
इसके अलावा, चंद्र ने 25 अगस्त को तीसरे सदस्य की ओर से दिए गए कारणयुक्त मत पर रोक लगाने और लंबित आवेदनों पर नए जवाब मांगने के निर्देश पर भी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि इस प्रक्रिया से उन विशिष्ट मुद्दों तक सीमित रहने के बजाय पूरी कार्यवाही दोबारा खोल दी गई, जिन पर मूल सदस्यों में मतभेद था।
यह विवाद कंपनियां अधिनियम, 2013 की धारा 419(5) की व्याख्या से भी जुड़ा है। यह प्रावधान तब लागू होता है जब NCLT की पीठ के सदस्य किसी एक या अधिक मुद्दों पर अलग-अलग राय रखते हैं। ऐसी स्थिति में मतभेद वाले बिंदुओं को दर्ज कर NCLT के अध्यक्ष के पास भेजा जाता है, जो मामले को एक या अधिक अन्य सदस्यों के पास भेज सकते हैं। इसके बाद मामले का निर्णय उन सदस्यों के बहुमत की राय के आधार पर किया जाता है, जिनके सामने मामला सुना गया हो।
चंद्र का तर्क है कि इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल पहचाने गए मतभेदों का समाधान करना है। इसका इस्तेमाल पूरी कार्यवाही की नए सिरे से सुनवाई करने या उनकी सभी संपत्तियों के हस्तांतरण पर व्यापक रोक लगाने के लिए नहीं किया जा सकता।
मामले की शुरुआत NCLT की दो सदस्यीय पीठ के सामने हुई थी, जिसमें न्यायिक सदस्य अशोक कुमार भारद्वाज और तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी शामिल थीं। दोनों सदस्यों ने अलग-अलग राय दी। भारद्वाज ने योजना को उन लेनदारों तक सीमित रखते हुए मंजूरी देने का समर्थन किया था, जिन्होंने इसका समर्थन किया था। उनका प्रस्ताव था कि असहमत लेनदार, जिनमें बैंक और वित्तीय संस्थान शामिल हैं, अपने बकाये की वसूली के लिए स्वतंत्र कानूनी उपाय जारी रख सकें।
वहीं, तकनीकी सदस्य रीना सिन्हा पुरी ने समाधान पेशेवर द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया में गंभीर खामियां पाए जाने के आधार पर योजना को खारिज कर दिया था। इसके बाद मामला कंपनियां अधिनियम की धारा 419(5) के तहत तीसरे सदस्य न्यायिक सदस्य निलेश शर्मा के पास भेजा गया।
25 अगस्त को शर्मा ने योजना को मंजूरी देने की राय दी। हालांकि, उन्होंने अनिल कुमार की ओर से 960 व्यक्तियों और सुनील जैन की ओर से 300 व्यक्तियों के लिए दाखिल दावों को योजना से बाहर रखने का निर्देश दिया। इन दावों के लिए निर्धारित राशि को अन्य पात्र लेनदारों के बीच बांटने की बात भी कही गई।
शर्मा ने यह भी माना कि मंजूर की गई योजना IBC की धारा 115 के तहत उन लेनदारों समेत सभी लेनदारों पर बाध्यकारी होगी, जिन्होंने इसका विरोध किया था।
जब मामला मूल दो सदस्यीय पीठ के पास वापस आया तो 31 अगस्त को उसने कहा कि तीसरे सदस्य की राय से भी बहुमत का स्पष्ट मत सामने नहीं आया। पीठ ने कहा कि तकनीकी सदस्य ने योजना खारिज की थी, न्यायिक सदस्य ने इसे केवल समर्थक लेनदारों तक सीमित करने की राय दी थी, जबकि तीसरे सदस्य ने इसे मंजूरी देते हुए सभी लेनदारों पर बाध्यकारी माना था।
तीनों राय अलग होने के बाद मामला फिर NCLT अध्यक्ष के पास भेजा गया, जिन्होंने सुनवाई के लिए पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया। इस बड़ी पीठ ने चंद्र को अपनी किसी भी संपत्ति को हस्तांतरित करने से रोक दिया और ₹22,006.57 करोड़ के स्वीकृत दावों के मुकाबले ₹6.25 करोड़ भुगतान की योजना को समर्थन देने वाले आदेश पर भी रोक लगा दी। इसी आदेश के खिलाफ अब चंद्र NCLAT पहुंचे हैं।
