नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को केरल के पूर्व मुख्यमंत्री पिनराई विजयन, उनकी बेटी वीणा टी और दामाद समेत अन्य लोगों के खिलाफ सीएमआरएल-एक्सालॉजिक कथित भुगतान मामले में आगे की जांच पर सात दिन के लिए रोक लगा दी। अदालत ने प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) को अपनी वैधानिक सीमाओं में रहने की सख्त हिदायत देते हुए कहा कि उसे दूसरी जांच एजेंसियों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। शीर्ष अदालत ने स्पष्ट किया कि यह रोक केवल प्राथमिकी (एफआईआर) के आधार पर आगे होने वाली जांच पर है, प्राथमिकी दर्ज करने पर नहीं। साथ ही, अदालत ने ईडी की नई मनी लॉन्ड्रिंग कार्यवाही की वैधता पर कोई राय नहीं दी।
न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने दशहरा अवकाश के दौरान विशेष सुनवाई करते हुए विजयन और अन्य याचिकाकर्ताओं को केरल हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ अपील करने की अनुमति दी। शीर्ष अदालत ने हाईकोर्ट की खंडपीठ के 15 अक्टूबर के उस फैसले को भी दरकिनार कर दिया, जिसमें एकल न्यायाधीश के 9 अक्टूबर के आदेश को चुनौती देने वाली अपील खारिज कर दी गई थी। एकल न्यायाधीश ने मामले में आपराधिक केस दर्ज करने और जांच आगे बढ़ाने का निर्देश दिया था।
ईडी को वैधानिक सीमाओं में रहने की हिदायत
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की भूमिका पर कड़ी टिप्पणी की। पीठ ने कहा कि केंद्रीय एजेंसी अपना वैधानिक कर्तव्य निभा चुकी है और अब राज्य को अपने अधिकार क्षेत्र के तहत कार्रवाई करनी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी अनुसूचित अपराध के पर्याप्त आधार हैं, तो ईडी शिकायत दर्ज कर अभियोजन आगे बढ़ा सकती है, लेकिन उसे दूसरी जांच एजेंसियों की शक्तियों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
पीठ ने कहा कि किसी भी एजेंसी को कानून से मिले अधिकारों का इस्तेमाल निर्धारित सीमाओं से आगे बढ़कर नहीं करना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का पद कितना भी ऊंचा क्यों न हो, वह कानून से ऊपर नहीं है। हालांकि, अदालत की इन टिप्पणियों को मामले के आरोपों की सत्यता पर अंतिम निष्कर्ष नहीं माना जाएगा।
2.78 करोड़ से अधिक के कथित भुगतान का मामला
यह मामला केरल की सरकारी कंपनी सीएमआरएल और एक्सालॉजिक सॉल्यूशंस प्राइवेट लिमिटेड के बीच हुए कथित वित्तीय लेनदेन से जुड़ा है। आरोप है कि सीएमआरएल ने विजयन की बेटी वीणा टी की पूर्ण स्वामित्व वाली कंपनी एक्सालॉजिक को 2.78 करोड़ से अधिक का भुगतान किया, जबकि इसके बदले कोई सेवा नहीं दी गई।
उपलब्ध विवरण के अनुसार, सीएमआरएल ने जनवरी 2017 में वीणा को सूचना प्रौद्योगिकी और विपणन सलाहकार के रूप में रिटेनरशिप आधार पर नियुक्त किया था। वर्ष 2017 से 2020 के बीच कंपनी की ओर से एक्सालॉजिक को भुगतान किए गए। सीएमआरएल के कर आकलन से जुड़े दस्तावेजों में कथित तौर पर ऐसे अतिरिक्त भुगतानों का भी उल्लेख सामने आया, जिनके बदले सेवाएं प्रदान किए जाने का रिकॉर्ड नहीं मिला। इन आरोपों की जांच और कानूनी प्रक्रिया अभी जारी है।
एफआईआर पर नहीं, आगे की जांच पर रोक
विजयन की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने दलील दी कि हाईकोर्ट के एकल न्यायाधीश ने उन्हें अपना पक्ष रखने का अवसर दिए बिना एफआईआर दर्ज करने और जांच का निर्देश दिया था। उनका कहना था कि अपील खारिज होने के बाद उनके पास प्रभावी कानूनी उपाय नहीं बचा था।
पीठ ने स्पष्ट किया कि एफआईआर दर्ज होने पर रोक नहीं लगाई जा रही है। केवल सात दिनों तक आगे की जांच स्थगित रहेगी, ताकि याचिकाकर्ता हाईकोर्ट की खंडपीठ के समक्ष अपनी अपील और अंतरिम राहत की मांग रख सकें। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट को तथ्यों और कानून के आधार पर मामले पर स्वतंत्र रूप से विचार करना चाहिए।
ईडी की नई कार्यवाही पर फैसला नहीं
सुनवाई में यह भी बताया गया कि नई एफआईआर दर्ज होने के बाद ईडी ने कथित मनी लॉन्ड्रिंग के संबंध में नया प्रवर्तन मामला सूचना प्रतिवेदन (ईसीआईआर) दर्ज किया है। इसी मामले में विजयन को 23 अक्टूबर को पूछताछ के लिए तलब किए जाने की जानकारी दी गई।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की इस कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार करते हुए कहा कि नई ईसीआईआर की वैधता को अलग कार्यवाही में चुनौती दी जा सकती है। अदालत ने इस विषय पर कोई अंतिम राय व्यक्त नहीं की।
पीठ ने राज्य सरकार की कार्रवाई पर भी सवाल उठाए। अदालत ने कहा कि यह जांचना जरूरी है कि ईडी की ओर से धन शोधन निवारण कानून की धारा 66(2) के तहत साझा की गई सूचना क्या राज्य के लिए अनिवार्य रूप से एफआईआर दर्ज करने का आधार बनती है। साथ ही, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत लागू पूर्व अनुमति संबंधी सुरक्षा प्रावधानों पर भी विचार करने की जरूरत बताई।
एफआईआर से पहले सुनवाई के अधिकार पर बहस
विजयन के वकीलों ने याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता के. एम. शाजहान के मामले में पक्षकार होने के अधिकार पर भी सवाल उठाए। उनका कहना था कि राज्य पहले ही ईडी से मिली जानकारी के आधार पर प्रारंभिक जांच के लिए नौ सदस्यीय विशेष जांच दल गठित कर चुका था।
सुनवाई के दौरान भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 175(4) का भी उल्लेख हुआ, जिसमें सरकारी कर्मचारी के आधिकारिक कर्तव्यों से जुड़े आरोपों की जांच का आदेश देने से पहले उसे सुनने की आवश्यकता का प्रावधान है। ईडी की ओर से दलील दी गई कि यह सुरक्षा केवल आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से जुड़े मामलों में लागू होती है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में कथित गतिविधियां आधिकारिक कर्तव्यों के दायरे में आती हैं या नहीं, इसका निर्णय तथ्यों और कानून के आधार पर किया जाना चाहिए। अदालत ने याचिकाकर्ताओं को हाईकोर्ट में अपनी अपील आगे बढ़ाने का निर्देश देते हुए स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां मामले के गुण-दोष पर अंतिम राय नहीं हैं।
