नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने लौह अयस्क (Iron Ore) पर रॉयल्टी की गणना से जुड़े महत्वपूर्ण मामले में केंद्र सरकार के पक्ष में फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि औसत बिक्री मूल्य (Average Sale Price-ASP) तय करते समय रॉयल्टी, जिला खनिज फाउंडेशन (District Mineral Foundation-DMF) और राष्ट्रीय खनिज अन्वेषण न्यास (National Mineral Exploration Trust-NMET) के भुगतान को बिक्री मूल्य में शामिल करने का मौजूदा प्रावधान पूरी तरह वैध और संवैधानिक है। अदालत ने इस आधार पर दायर उस याचिका को खारिज कर दिया जिसमें दावा किया गया था कि यह व्यवस्था प्रभावी रूप से “रॉयल्टी पर रॉयल्टी” वसूलने के समान है।
यह मामला Kirloskar Ferrous Industries Ltd. द्वारा दायर याचिका से जुड़ा था। कंपनी ने Minerals (Other than Atomic and Hydro Carbons Energy Minerals) Concession Rules, 2016 तथा Mineral Conservation and Development Rules, 2017 में जोड़ी गई व्याख्याओं को चुनौती दी थी। याचिकाकर्ता का तर्क था कि इन प्रावधानों के कारण बिक्री मूल्य कृत्रिम रूप से बढ़ जाता है, जिससे उसी बढ़े हुए आधार पर रॉयल्टी की गणना होती है। कंपनी का कहना था कि यह व्यवस्था Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957 (MMDR Act) के प्रावधानों के अनुरूप नहीं है।
खनन क्षेत्र में रॉयल्टी वह राशि होती है, जो खनन पट्टा धारक खनिजों के उत्खनन के बदले खनिज अधिकारों के स्वामी को अदा करता है। सुप्रीम कोर्ट पहले भी स्पष्ट कर चुका है कि रॉयल्टी कर (Tax) नहीं, बल्कि एक संविदात्मक भुगतान (Contractual Payment) है। लौह अयस्क के मामले में MMDR Act की धारा 9 और दूसरी अनुसूची के प्रावधानों के तहत औसत बिक्री मूल्य (ASP) का 15 प्रतिशत रॉयल्टी के रूप में निर्धारित किया गया है।
भारतीय खान ब्यूरो (IBM) प्रत्येक माह विभिन्न श्रेणी के खनिजों का औसत बिक्री मूल्य (ASP) प्रकाशित करता है। यह मूल्य पात्र खदानों द्वारा रिपोर्ट किए गए एक्स-माइन बिक्री मूल्य के भारित औसत के आधार पर निर्धारित किया जाता है। इसी ASP का उपयोग रॉयल्टी और नीलामी प्रीमियम जैसी देयताओं की गणना के लिए किया जाता है।
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रॉयल्टी के अतिरिक्त खनन पट्टा धारकों को दो वैधानिक निधियों में भी योगदान देना होता है। DMF का उद्देश्य खनन प्रभावित क्षेत्रों और वहां रहने वाले लोगों के कल्याण के लिए वित्त उपलब्ध कराना है, जिसमें लौह अयस्क पट्टा धारकों को रॉयल्टी का 10 प्रतिशत योगदान देना होता है। वहीं NMET खनिज अन्वेषण गतिविधियों को वित्तपोषित करता है, जिसके लिए पट्टा धारकों से रॉयल्टी का दो प्रतिशत योगदान लिया जाता है।
याचिकाकर्ता कंपनियों का मुख्य तर्क था कि 2016 और 2017 के नियमों में जोड़ी गई व्याख्याओं के अनुसार बिक्री मूल्य की गणना करते समय रॉयल्टी, DMF और NMET की राशि को घटाया नहीं जा सकता। चूंकि यही बिक्री मूल्य आगे चलकर ASP का आधार बनता है, इसलिए खनन कंपनियों को ऐसे मूल्य पर भी रॉयल्टी देनी पड़ती है जिसमें पहले से ही रॉयल्टी और संबंधित देयताएं शामिल होती हैं। उनके अनुसार इससे वित्तीय बोझ बढ़ता है और एक प्रकार का “रॉयल्टी पर रॉयल्टी” प्रभाव उत्पन्न होता है।
केंद्र सरकार ने अदालत में इन दलीलों का विरोध करते हुए कहा कि यह व्यवस्था लौह अयस्क क्षेत्र में मूल्य हेरफेर (Price Manipulation) और कम मूल्य पर बिक्री दिखाने (Under-Invoicing) जैसी प्रवृत्तियों को रोकने के लिए लागू की गई थी। सरकार का कहना था कि कोयला और लौह अयस्क के बाजार ढांचे अलग-अलग हैं, इसलिए दोनों के लिए अलग गणना पद्धति अपनाना पूरी तरह उचित है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि 2016 और 2017 के नियमों में शामिल व्याख्याएं संविधान के अनुच्छेद 14 और अनुच्छेद 19(1)(g) का उल्लंघन नहीं करतीं तथा MMDR Act की धारा 9 के भी अनुरूप हैं। अदालत ने यह तर्क भी खारिज कर दिया कि इस व्यवस्था से तीन वर्ष के भीतर रॉयल्टी में अप्रत्यक्ष संशोधन हो जाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि तीन वर्ष की सीमा केवल रॉयल्टी की दर (Rate of Royalty) में संशोधन पर लागू होती है, न कि उसकी गणना की मौजूदा पद्धति पर।
अदालत के इस फैसले से कोई नया कर या अतिरिक्त रॉयल्टी लागू नहीं हुई है, बल्कि केवल वर्तमान गणना प्रणाली को वैध ठहराया गया है। इसके साथ ही लौह अयस्क के लिए औसत बिक्री मूल्य की मौजूदा व्यवस्था यथावत बनी रहेगी और जब तक संसद या केंद्र सरकार नियमों में संशोधन नहीं करती, तब तक रॉयल्टी, DMF और NMET के भुगतान बिक्री मूल्य का हिस्सा बने रहेंगे तथा उसी आधार पर ASP और संबंधित देयताओं की गणना जारी रहेगी।
