नई दिल्ली: भारत में डिजिटल बैंकिंग और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) के तेजी से बढ़ते उपयोग के साथ साइबर अपराधियों की रणनीति भी तेजी से बदल रही है। फ्रॉड प्रिवेंशन कंपनी BioCatch की वर्ष 2026 की Digital Banking Fraud Trends in India रिपोर्ट के अनुसार, साइबर अपराधी अब पारंपरिक डेस्कटॉप आधारित हमलों के बजाय मोबाइल-फर्स्ट रणनीति अपना रहे हैं। रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि मध्य-2025 से मध्य-2026 के बीच मोबाइल बैंकिंग फ्रॉड सेशन में 67 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इनमें iPhone (iOS) डिवाइस पर 86 प्रतिशत और Android डिवाइस पर 35 प्रतिशत की बढ़ोतरी दर्ज की गई।
रिपोर्ट के अनुसार, कुल फ्रॉड प्रयासों (Attempted Fraud Sessions) में 12 प्रतिशत की कमी आई है, लेकिन ठगी की गंभीरता बढ़ गई है। भारतीय बैंकों के खिलाफ दर्ज संदिग्ध धोखाधड़ी लेनदेन के कुल मूल्य में 35 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। इससे संकेत मिलता है कि अपराधी अब कम संख्या में लेकिन अधिक मूल्य वाले और सुनियोजित साइबर हमलों को अंजाम दे रहे हैं। रिपोर्ट के मुताबिक अपराधियों ने अपनी कार्यप्रणाली को अधिक तेज और प्रभावी बनाते हुए औसत फ्रॉड सेशन की अवधि में भी 32 प्रतिशत की कमी कर दी है।
विशेषज्ञों के अनुसार, साइबर अपराधी अब पीड़ितों को फोन कॉल के जरिए निर्देश देते हुए रियल-टाइम भुगतान करवाने पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। खुद को बैंक अधिकारी, केवाईसी (KYC) अपडेट टीम, बिजली विभाग या अन्य सरकारी एजेंसियों का प्रतिनिधि बताकर लोगों को तत्काल कार्रवाई के लिए दबाव में लाया जाता है। इसके बाद उन्हें फर्जी लिंक पर क्लिक करने, मोबाइल ऐप डाउनलोड करने या तुरंत UPI अथवा बैंक ट्रांसफर करने के लिए प्रेरित किया जाता है।
रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में डिजिटल भुगतान, मोबाइल बैंकिंग, ई-कॉमर्स और ऑनलाइन निवेश प्लेटफॉर्म के तेजी से विस्तार ने वित्तीय समावेशन को नई गति दी है, लेकिन इसी तेज रफ्तार भुगतान व्यवस्था का अपराधी भी फायदा उठा रहे हैं। चूंकि UPI आधारित लेनदेन कुछ ही सेकंड में पूरा हो जाता है, इसलिए पीड़ित को संदेह होने से पहले ही धनराशि विभिन्न खातों में स्थानांतरित कर दी जाती है।
रिपोर्ट में एक और महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रूप में घरेलू “मनी म्यूल-एज-ए-सर्विस” नेटवर्क के तेजी से विस्तार का उल्लेख किया गया है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर म्यांमार, कंबोडिया और लाओस जैसे देशों में साइबर ठगी नेटवर्क पर कार्रवाई के बाद अपराधी अब भारत के भीतर ही स्थानीय बैंक खातों और भुगतान व्यवस्था का उपयोग कर अवैध धन को निकालने और छिपाने की रणनीति अपना रहे हैं।
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केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) ने वर्ष 2025 के दौरान देशभर में 700 से अधिक बैंक शाखाओं से जुड़े 8.5 लाख से अधिक संदिग्ध मनी म्यूल खातों की पहचान की थी। रिपोर्ट के अनुसार, अपराधी फर्जी नौकरी के विज्ञापनों, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म और मैसेजिंग ऐप्स के माध्यम से लोगों को मनी म्यूल बनने के लिए तैयार करते हैं। बाद में इन्हीं खातों का उपयोग साइबर ठगी की रकम को तेजी से कई खातों में स्थानांतरित करने के लिए किया जाता है ताकि जांच एजेंसियों और बैंकों की निगरानी से बचा जा सके।
BioCatch के ग्लोबल एडवाइजरी निदेशक सुभाशीष बोस के अनुसार, अंतरराष्ट्रीय साइबर सिंडिकेट अब भारतीय बैंक खातों, स्थानीय भुगतान प्रणालियों और भारतीय सिम कार्ड का उपयोग कर चोरी की गई धनराशि को क्रिप्टोकरेंसी में परिवर्तित कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि बैंकों को केवल संदिग्ध लेनदेन पर नजर रखने के बजाय खाते के शुरुआती चरण से ही मनी म्यूल गतिविधियों की पहचान करने वाली प्रणालियों को मजबूत करना होगा, क्योंकि अपराधी अक्सर वैध KYC वाले वास्तविक बैंक खातों का दुरुपयोग करते हैं।
प्रसिद्ध साइबर अपराध विशेषज्ञ एवं पूर्व आईपीएस अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के अनुसार, साइबर अपराधियों का फोकस अब तकनीकी हैकिंग से अधिक सोशल इंजीनियरिंग, मोबाइल बैंकिंग और स्थानीय मनी म्यूल नेटवर्क पर केंद्रित हो गया है। उन्होंने कहा कि बैंकिंग संस्थानों को व्यवहार आधारित फ्रॉड डिटेक्शन, एआई आधारित जोखिम विश्लेषण, रियल-टाइम ट्रांजैक्शन मॉनिटरिंग और मनी म्यूल खातों की शीघ्र पहचान पर विशेष ध्यान देना होगा। वहीं आम नागरिकों को किसी भी फोन कॉल, KYC अपडेट, निवेश प्रस्ताव या भुगतान संबंधी निर्देश पर बिना स्वतंत्र सत्यापन के कार्रवाई नहीं करनी चाहिए, क्योंकि अधिकांश साइबर ठगी अब इसी तरह के मनोवैज्ञानिक दबाव और त्वरित भुगतान तंत्र का फायदा उठाकर की जा रही है।
