आइजोल: मिजोरम में केंद्रीय सब्सिडी योजनाओं से जुड़े बहुचर्चित ₹10.34 करोड़ के कथित घोटाले में विशेष अदालत (भ्रष्टाचार निवारण) ने चार कारोबारियों को दोषी ठहराते हुए दो-दो वर्ष के कारावास और ₹1.50 लाख-₹1.50 लाख के जुर्माने की सजा सुनाई है। वहीं, पर्याप्त साक्ष्य नहीं मिलने के कारण 13 अन्य आरोपियों, जिनमें अधिकांश सरकारी कर्मचारी शामिल थे, को अदालत ने बरी कर दिया। यह मामला मिजो कार्बन प्रोडक्ट्स लिमिटेड द्वारा कथित रूप से फर्जी परिवहन और विनिर्माण दावों के आधार पर केंद्रीय सब्सिडी हासिल करने से जुड़ा है।
विशेष न्यायाधीश एफ. रोहलुपुइया ने गुरुवार को दोषसिद्धि का फैसला सुनाया था, जिसके बाद शुक्रवार को चारों दोषियों को सजा सुनाई गई। दोषी ठहराए गए आरोपियों में गुवाहाटी निवासी रवि गुलगुलिया, गुवाहाटी निवासी संदीप अग्रवाल, असम के कछार जिले के सिलचर निवासी विमल किशोर और पश्चिम बंगाल के कोलकाता निवासी प्रमोद भरेच शामिल हैं। अदालत ने उन्हें भारतीय दंड संहिता की धारा 120बी (आपराधिक साजिश), धारा 420 (धोखाधड़ी) और धारा 471 (जालसाजी से तैयार दस्तावेजों का असली के रूप में उपयोग) के तहत दोषी पाया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा कि शेष 13 आरोपियों के खिलाफ अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसी आधार पर उन्हें सभी आरोपों से बरी कर दिया गया। अदालत ने स्पष्ट किया कि आपराधिक मामलों में दोष सिद्ध करने के लिए पर्याप्त और विश्वसनीय साक्ष्य आवश्यक होते हैं, जो इन आरोपियों के संबंध में प्रस्तुत नहीं किए जा सके।
यह मामला वर्ष 2017 में गुवाहाटी उच्च न्यायालय में दायर एक जनहित याचिका (PIL) से शुरू हुआ था। भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता वनरामछुआंगी, जिन्हें रुआतफेला नु के नाम से भी जाना जाता है, ने आरोप लगाया था कि मिजो कार्बन प्रोडक्ट्स लिमिटेड ने केंद्रीय परिवहन सब्सिडी (Central Transport Subsidy-CTS) योजना के तहत ₹10.34 करोड़ की सब्सिडी प्राप्त करने के लिए फर्जी दावे किए। याचिका में कहा गया था कि कंपनी ने आवश्यक मात्रा में कच्चे कोयले का परिवहन और उपयोग किए बिना ही सब्सिडी पाने का प्रयास किया।
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जांच के दौरान सामने आया कि कंपनी ने आइजोल के लुआंगमुअल स्थित इंडस्ट्रियल ग्रोथ सेंटर में लो ऐश मेटलर्जिकल कोक (LAMC), हार्ड कोक, कोक ब्रीज़ और अन्य उत्पादों के निर्माण का दावा किया था। कंपनी का कहना था कि वह मिजोरम के बाहर से कच्चा कोयला मंगाकर उत्पादन कर रही है। हालांकि, जांच एजेंसियों को इन दावों के समर्थन में विश्वसनीय प्रमाण नहीं मिले।
मामले की शुरुआती जांच मिजोरम एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) ने की थी। बाद में दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टैब्लिशमेंट (DSPE) अधिनियम, 1946 के तहत जारी निर्देशों के आधार पर 17 अक्टूबर 2017 को जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंप दी गई। CBI ने अपनी जांच में पाया कि कंपनी ने कच्चे कोयले के आयात और बड़े पैमाने पर कोक उत्पादन के संबंध में गलत जानकारी प्रस्तुत की थी। एजेंसी के अनुसार, कंपनी ने न तो दावा की गई मात्रा में कोयला आयात किया और न ही उतना उत्पादन किया, जितना सब्सिडी के लिए दर्शाया गया था।
CBI की जांच में यह भी सामने आया कि कंपनी ने केंद्रीय परिवहन सब्सिडी (CTS) और केंद्रीय पूंजी निवेश सब्सिडी (CCIS) योजनाओं के तहत ₹3.41 करोड़ से अधिक की सब्सिडी कथित रूप से फर्जी दस्तावेजों के आधार पर प्राप्त की। जांच एजेंसी के अनुसार, सब्सिडी आवेदन में विनिर्माण उपकरणों और कच्चे कोयले के परिवहन से संबंधित जाली दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया।
जांच का सबसे महत्वपूर्ण पहलू परिवहन रिकॉर्ड से जुड़ा था। CBI ने पाया कि एक दस्तावेज में एक ही ट्रक के मेघालय के खलेहरियाट से मिजोरम के लुआंगमुअल तक लगभग 312 किलोमीटर की दूरी एक ही दिन में आठ बार तय करने का दावा किया गया था। जांच एजेंसी ने इसे व्यवहारिक रूप से असंभव बताते हुए फर्जी परिवहन रिकॉर्ड का मजबूत संकेत माना। अदालत के फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर चर्चा में है और इसे सरकारी सब्सिडी योजनाओं में कथित धोखाधड़ी के महत्वपूर्ण मामलों में से एक माना जा रहा है।
