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Policy Watch

13 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्रतिबंध की मांग: दिल्ली हाईकोर्ट में जनहित याचिका, नाइट कर्फ्यू और आयु सत्यापन कानून की भी अपील

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksJuly 30, 2026No Comments4 Mins Read
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बच्चों को सोशल मीडिया की लत और अनुचित सामग्री से बचाने के लिए राष्ट्रीय कानूनी ढांचा बनाने की मांग; केंद्र सरकार, प्रमुख मंत्रालयों और बड़ी टेक कंपनियों को बनाया गया पक्षकार
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नई दिल्ली: 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स तक पहुंच प्रतिबंधित करने और किशोरों के लिए सुरक्षित डिजिटल वातावरण सुनिश्चित करने की मांग को लेकर दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में केंद्र सरकार से बच्चों के सोशल मीडिया उपयोग को विनियमित करने के लिए देशव्यापी कानूनी ढांचा तैयार करने, अनिवार्य आयु सत्यापन प्रणाली लागू करने तथा किशोरों के लिए सोशल मीडिया पर “नाइट कर्फ्यू” जैसी व्यवस्था पर विचार करने का अनुरोध किया गया है।

यह जनहित याचिका तीन वर्षीय बच्ची की मां कीर्ति दुआ और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. शरद गुप्ता ने दायर की है। याचिका में इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY), महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, शिक्षा मंत्रालय, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग (NCPCR) के अलावा मेटा, अल्फाबेट (गूगल-यूट्यूब), टेलीग्राम, स्नैप इंक. (स्नैपचैट) और एक्स सहित प्रमुख सोशल मीडिया एवं प्रौद्योगिकी कंपनियों को पक्षकार बनाया गया है।

मामले की प्रारंभिक सुनवाई मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ के समक्ष हुई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति करिया ने स्वयं को मामले की सुनवाई से अलग कर लिया। इसके बाद अदालत ने निर्देश दिया कि मामले को 5 अगस्त को ऐसी नई खंडपीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए, जिसमें न्यायमूर्ति करिया शामिल न हों।

याचिका में कहा गया है कि कम उम्र के बच्चों में सोशल मीडिया की बढ़ती लत, अनुचित और अश्लील सामग्री तक आसान पहुंच तथा एल्गोरिदम आधारित सामग्री वितरण उनकी मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि ऐसी परिस्थितियां बच्चों के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार, जो संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत संरक्षित हैं, का उल्लंघन करती हैं। साथ ही संविधान के अनुच्छेद 39(एफ) के तहत बच्चों को शोषण और नैतिक एवं भौतिक परित्याग से सुरक्षित रखने का राज्य का दायित्व भी प्रभावी रूप से पूरा नहीं हो रहा है।

Registration Begins for FutureCrime Summit 2026, India’s Largest Cybercrime Conference

याचिका में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 का भी उल्लेख किया गया है, जिसमें युवाओं के बीच डिजिटल लत, अत्यधिक स्क्रीन समय और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियों पर चिंता व्यक्त की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि वर्तमान में उपलब्ध सुरक्षा उपाय मुख्यतः स्वैच्छिक हैं और प्लेटफॉर्म्स पर निर्भर हैं, जबकि बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए स्पष्ट, बाध्यकारी और लागू करने योग्य कानून की आवश्यकता है।

याचिका में कई महत्वपूर्ण मांगें रखी गई हैं। इनमें 13 वर्ष से कम आयु के बच्चों के लिए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर पूर्ण प्रतिबंध, 13 से 16 वर्ष आयु वर्ग के लिए आयु-उपयुक्त सामग्री नियमन, किशोरों के लिए रात्रिकालीन सोशल मीडिया उपयोग पर “नाइट कर्फ्यू” जैसी व्यवस्था तथा डिजियात्रा मॉडल की तर्ज पर अनिवार्य डिजिटल आयु सत्यापन प्रणाली लागू करना शामिल है। इसके अलावा सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम और पॉक्सो अधिनियम के प्रावधानों का सख्ती से पालन सुनिश्चित करने की भी मांग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी अनुरोध किया है कि सोशल मीडिया कंपनियों को बाल यौन शोषण सामग्री से जुड़े यूआरएल को तत्काल ब्लॉक करने, उन्नत कंटेंट फ़िल्टरिंग प्रणाली लागू करने और नाबालिग उपयोगकर्ताओं के लिए अतिरिक्त सुरक्षा उपाय अपनाने के निर्देश दिए जाएं। उनका कहना है कि बच्चों की डिजिटल सुरक्षा केवल अभिभावकीय निगरानी का विषय नहीं है, बल्कि यह सार्वजनिक नीति और बाल संरक्षण से जुड़ा राष्ट्रीय मुद्दा है।

फिलहाल अदालत ने याचिका के गुण-दोष पर कोई टिप्पणी नहीं की है। अब 5 अगस्त को नई खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई होगी, जहां इस जनहित याचिका की स्वीकार्यता और आगे की न्यायिक कार्यवाही पर निर्णय लिया जाएगा। यह मामला भारत में बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा, सोशल मीडिया विनियमन और डिजिटल अधिकारों से जुड़ी बहस को नई दिशा दे सकता है।

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