नासिक: महाराष्ट्र के नासिक जिले में आगामी कुंभ मेले से जुड़े ₹300 करोड़ के कथित सड़क निर्माण ठेके का लालच देकर एक कारोबारी से ₹35 लाख की ठगी का मामला सामने आया है। पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने भारत सरकार का प्रतीक चिह्न और नासिक त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेला प्राधिकरण का नाम वाला कथित फर्जी वर्क ऑर्डर दिखाकर कारोबारी का भरोसा जीता। इसके बाद टेंडर मंजूर कराने और प्रक्रिया आगे बढ़ाने के नाम पर उससे ₹50 लाख लिए गए। हालांकि, न तो कथित ठेके की प्रक्रिया आगे बढ़ी और न ही पूरी रकम वापस की गई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने मामला दर्ज कर जांच शुरू कर दी है।
पुलिस के मुताबिक, तीन आरोपियों ने कारोबारी से संपर्क किया और दावा किया कि उनके पास कुंभ मेले से संबंधित ₹300 करोड़ का सड़क निर्माण ठेका है। उन्होंने कारोबारी को इस परियोजना में शामिल होने का प्रस्ताव दिया। कथित सौदे को वास्तविक दिखाने के लिए आरोपियों ने ऐसा वर्क ऑर्डर पेश किया, जिस पर भारत सरकार का प्रतीक चिह्न और नासिक त्र्यंबकेश्वर कुंभ मेला प्राधिकरण का नाम दर्ज था।
कारोबारी ने कथित तौर पर दस्तावेज को वास्तविक सरकारी वर्क ऑर्डर समझ लिया। इसके बाद आरोपियों ने टेंडर की मंजूरी और आगे की प्रक्रिया पूरी कराने के नाम पर ₹50 लाख की मांग की। कारोबारी ने कथित तौर पर यह रकम आरोपियों को दे दी। अब पुलिस भुगतान के तरीके, रकम किन बैंक खातों में पहुंची और उसके बाद उसका इस्तेमाल या हस्तांतरण कहां किया गया, इसकी जांच कर रही है।
रकम देने के बाद कारोबारी को कथित ₹300 करोड़ के सड़क निर्माण ठेके के संबंध में कोई ठोस जानकारी नहीं मिली। उसे न तो परियोजना से जुड़े आगे के दस्तावेज उपलब्ध कराए गए और न ही ठेके को लागू करने की प्रक्रिया शुरू हुई। संदेह होने पर कारोबारी ने आरोपियों से अपनी रकम वापस मांगी।
पुलिस के अनुसार, आरोपियों ने पूरी रकम लौटाने के बजाय सिर्फ ₹15 लाख वापस किए। इससे ₹35 लाख की रकम बकाया रह गई। शेष राशि वापस नहीं मिलने पर कारोबारी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई। इसके आधार पर नासिक रोड पुलिस ने रविवार को आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया।
यह मामला कथित फर्जी वर्क ऑर्डर रैकेट की व्यापक जांच का हिस्सा है। अधिकारियों के अनुसार, इस नेटवर्क से जुड़े मामलों में पुलिस अब तक पांच अलग-अलग FIR दर्ज कर चुकी है और छह लोगों को गिरफ्तार किया गया है। इन मामलों में पीड़ितों से कुल करीब ₹3.40 करोड़ की ठगी किए जाने की बात सामने आई है। जांचकर्ता अब यह पता लगाने में जुटे हैं कि अलग-अलग मामलों में इस्तेमाल किए गए दस्तावेजों और आरोपियों के बीच कोई साझा कड़ी है या नहीं।
कथित फर्जी सरकारी दस्तावेज इस जांच में अहम साक्ष्य माने जा रहे हैं। पुलिस यह पता लगाएगी कि कारोबारी को दिखाया गया वर्क ऑर्डर किसने तैयार किया, सरकारी प्रतीक चिह्न और प्राधिकरण के नाम का इस्तेमाल कैसे किया गया और क्या अन्य संभावित पीड़ितों के लिए भी इसी तरह के दस्तावेज तैयार किए गए थे। संबंधित सरकारी विभागों और कुंभ मेला प्राधिकरण के रिकॉर्ड से दस्तावेज की वास्तविकता का मिलान किया जाएगा।
प्रसिद्ध साइबर क्राइम विशेषज्ञ और पूर्व IPS अधिकारी प्रो. त्रिवेणी सिंह के मुताबिक, डिजिटल दस्तावेजों से जुड़े फर्जी कॉन्ट्रैक्ट मामलों में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की पूरी श्रृंखला सुरक्षित रखना जरूरी है। दस्तावेजों की डिजिटल कॉपी, ई-मेल, मैसेजिंग एप की बातचीत और बैंकिंग रिकॉर्ड यह पता लगाने में मदद कर सकते हैं कि कथित ठगी की योजना कैसे बनाई गई और उसे कैसे अंजाम दिया गया। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे गए फर्जी दस्तावेजों का स्रोत और प्रसारण रिकॉर्ड आरोपियों की भूमिका स्थापित करने में महत्वपूर्ण हो सकता है।
पुलिस कारोबारी और आरोपियों के बीच हुई बातचीत, भुगतान रिकॉर्ड, कथित वर्क ऑर्डर और परियोजना से जुड़े अन्य दस्तावेजों की जांच कर रही है। साथ ही यह भी पता लगाया जा रहा है कि नेटवर्क में कितने लोग शामिल थे और क्या अन्य कारोबारियों को भी इसी तरह सरकारी ठेकों का लालच दिया गया था।
जांच अभी जारी है। पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ₹300 करोड़ की सड़क परियोजना पूरी तरह काल्पनिक थी या किसी वास्तविक परियोजना के नाम का कथित तौर पर दुरुपयोग किया गया। आरोपियों के खिलाफ लगाए गए आरोप फिलहाल जांच और न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हैं तथा अदालत में साक्ष्यों के परीक्षण के बाद ही उनकी पुष्टि होगी।
