नई दिल्ली। अमेरिका में तीन भारतीय आईटी कंपनियों के खिलाफ कथित हैक-फॉर-हायर गतिविधियों को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से इन कंपनियों को काली सूची में डालने और आरोपों की जांच के बाद आवश्यक प्रतिबंधात्मक कार्रवाई करने की मांग की है। आरोप है कि कंपनियों से जुड़े समूहों ने भुगतान के बदले साइबर घुसपैठ और जासूसी जैसी गतिविधियों को अंजाम दिया तथा लंबे समय तक अमेरिकी नागरिकों और संस्थानों को निशाना बनाया।
सांसदों की मांग ऐसे समय में सामने आई है जब अमेरिका में निजी साइबर समूहों और तकनीकी कंपनियों की कथित हैकिंग गतिविधियों को लेकर सुरक्षा एजेंसियों और नीति निर्माताओं की चिंता बढ़ रही है। अमेरिकी सांसदों का कहना है कि यदि किसी निजी कंपनी की तकनीकी क्षमता का इस्तेमाल लोगों की डिजिटल जानकारी हासिल करने, निगरानी करने या संवेदनशील प्रणालियों तक अनधिकृत पहुंच बनाने के लिए किया जाता है, तो इसे केवल कारोबारी गतिविधि मानकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
मामले के केंद्र में ‘हैक-फॉर-हायर’ मॉडल है। इसमें कथित तौर पर किसी ग्राहक या समूह से भुगतान लेकर साइबर हमले, डिजिटल निगरानी, खातों तक अनधिकृत पहुंच या संवेदनशील जानकारी जुटाने जैसी सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं। अमेरिकी सांसदों का आरोप है कि तीनों भारतीय आईटी कंपनियों से जुड़े नेटवर्क की गतिविधियां इसी तरह के अभियानों से जुड़ी रही हैं।
आरोपों के अनुसार, कथित अभियानों में अमेरिकी नागरिकों को लंबे समय तक निशाना बनाया गया। संभावित लक्ष्यों की डिजिटल गतिविधियों पर नजर रखने, उनकी संवेदनशील जानकारी हासिल करने और ऑनलाइन खातों या उपकरणों तक पहुंच बनाने के प्रयासों की बात कही गई है। इन आरोपों की वास्तविक स्थिति और संबंधित कंपनियों की प्रत्यक्ष भूमिका का निर्धारण अमेरिकी प्रशासन और जांच एजेंसियों की समीक्षा के बाद ही हो सकेगा।
अमेरिकी सांसदों ने ट्रंप प्रशासन से मामले की व्यापक जांच करने का आग्रह किया है। उनका जोर इस बात पर है कि यदि कंपनियां या उनसे जुड़े लोग जानबूझकर साइबर घुसपैठ और जासूसी गतिविधियों में शामिल पाए जाते हैं, तो उनके खिलाफ आर्थिक और अन्य प्रतिबंध लगाए जाएं। काली सूची में शामिल किए जाने से अमेरिकी कंपनियों और वित्तीय संस्थानों के साथ संबंधित कारोबार पर गंभीर असर पड़ सकता है।
सांसदों की चिंता केवल साइबर अपराध तक सीमित नहीं है। उनका मानना है कि निजी क्षेत्र की तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल किसी देश के नागरिकों, राजनीतिक समूहों, कारोबारी संस्थानों या अन्य संवेदनशील लक्ष्यों के खिलाफ गुप्त अभियानों में किया जा सकता है। ऐसे मामलों में साइबर सुरक्षा के साथ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा भी जुड़ जाता है।
हैक-फॉर-हायर गतिविधियों को लेकर वैश्विक स्तर पर पहले भी चेतावनियां सामने आती रही हैं। इस तरह के नेटवर्क वैध साइबर सुरक्षा सेवाओं की आड़ में ऐसी गतिविधियों को अंजाम दे सकते हैं, जिनमें किसी व्यक्ति की निजी जानकारी हासिल करना या उसके डिजिटल खातों तक अवैध पहुंच बनाना शामिल हो। यही वजह है कि अमेरिकी सांसद अब इस क्षेत्र में काम करने वाली विदेशी कंपनियों की गतिविधियों पर भी कड़ी निगरानी की मांग कर रहे हैं।
यदि अमेरिकी प्रशासन आरोपों की पुष्टि करता है, तो संबंधित कंपनियों और उनसे जुड़े व्यक्तियों या संस्थाओं पर वित्तीय प्रतिबंध, कारोबारी पाबंदियां और अन्य कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। इससे अमेरिकी बाजार और वित्तीय व्यवस्था के साथ उनके संबंध प्रभावित होने की संभावना होगी।
फिलहाल अमेरिकी सांसदों की मांग ने तीन भारतीय आईटी कंपनियों की कथित साइबर गतिविधियों को लेकर जांच और निगरानी का दबाव बढ़ा दिया है। मामले की अगली दिशा इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिकी अधिकारी आरोपों की जांच में क्या निष्कर्ष निकालते हैं और कंपनियों की कथित भूमिका कितनी प्रमाणित होती है।
