नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई की बढ़ती क्षमताओं ने जहां वैज्ञानिक शोध, चिकित्सा और तकनीकी विकास को नई गति दी है, वहीं इसके संभावित दुरुपयोग को लेकर सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। हाल में सामने आए मामलों में एआई मॉडल का इस्तेमाल जैविक अनुसंधान, सैन्य तकनीक, मिसाइल प्रणालियों और ड्रोन से जुड़े कामों में करने की कथित कोशिशों का पता चला है। इन घटनाओं ने यह सवाल भी खड़ा किया है कि अत्याधुनिक एआई को ऐसे क्षेत्रों में किस सीमा तक सहायता देने की अनुमति होनी चाहिए, जहां छोटी सी चूक भी गंभीर नुकसान का कारण बन सकती है।
एआई कंपनी एंथ्रोपिक के अनुसार, उसके क्लॉड मॉडल से जुड़ी गतिविधियों की निगरानी के दौरान कई ऐसे मामले सामने आए, जिनमें उपयोगकर्ताओं ने मॉडल की क्षमताओं का इस्तेमाल संवेदनशील वैज्ञानिक और सैन्य कार्यों के लिए करने की कोशिश की। कंपनी ने संदिग्ध गतिविधियों की पहचान के बाद संबंधित खातों पर कार्रवाई की और कुछ मामलों में उन्हें स्थायी रूप से बंद कर दिया। संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े इंटरनेट प्रोटोकॉल पतों को भी अवरुद्ध किए जाने की बात कही गई है।
सबसे चिंताजनक मामलों में से एक मई में सामने आया। कंपनी के मुताबिक, एक वैज्ञानिक ने क्लॉड की मदद से चिकनगुनिया वायरस के जीनोम में ऐसे बदलावों से संबंधित जानकारी हासिल करने की कोशिश की, जिनसे वायरस के प्रभाव को अधिक गंभीर बनाने की दिशा में काम किया जा सकता था। जांच में इस गतिविधि से जुड़े संस्थान की पहचान एक विदेशी सैन्य शोध केंद्र के रूप में होने का दावा किया गया। इसके बाद सुरक्षा प्रणाली ने गतिविधि को संदिग्ध मानते हुए कार्रवाई की।
यह मामला इसलिए महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि जैविक अनुसंधान की कई तकनीकें स्वभाव से दोहरे इस्तेमाल वाली होती हैं। किसी वायरस या रोगाणु पर शोध बीमारी को समझने, उपचार विकसित करने और वैक्सीन तैयार करने में मदद कर सकता है। दूसरी ओर, वही वैज्ञानिक जानकारी गलत उद्देश्य से इस्तेमाल होने पर खतरनाक जैविक एजेंटों के विकास में भी सहायक हो सकती है। एआई इस चुनौती को और जटिल बना सकता है, क्योंकि वह जटिल वैज्ञानिक जानकारी को व्यवस्थित करने और शोधकर्ताओं को तेजी से तकनीकी सहायता देने में सक्षम है।
एंथ्रोपिक के खतरा विश्लेषण से जुड़े विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे मामलों में शुरुआत में यह पहचानना मुश्किल हो सकता है कि एआई से मांगी गई जानकारी सामान्य वैज्ञानिक शोध के लिए है या किसी नुकसान पहुंचाने वाले उद्देश्य से। उपयोगकर्ता सीधे अपने इरादे नहीं बताते और वैज्ञानिक प्रश्न अपने आप में वैध भी हो सकते हैं। इसलिए एआई सुरक्षा प्रणालियों को केवल अलग-अलग प्रश्नों के बजाय उपयोगकर्ता की गतिविधियों के पूरे पैटर्न को समझकर जोखिम का आकलन करना पड़ता है।
विशेषज्ञों ने यह भी चेतावनी दी है कि उन्नत एआई ऐसे लोगों को जटिल वैज्ञानिक और तकनीकी कामों में सहायता दे सकता है, जिनके पास पहले उस स्तर की विशेषज्ञता उपलब्ध नहीं थी। इससे शोध की गति बढ़ने के साथ संवेदनशील क्षेत्रों में दुरुपयोग की संभावना भी बढ़ सकती है। जैविक विज्ञान जैसे क्षेत्रों में यही दोहरी क्षमता सबसे बड़ी सुरक्षा चुनौती बन रही है।
जैविक हथियारों से आगे बढ़कर सैन्य तकनीक से जुड़े मामलों ने भी चिंता बढ़ाई है। एंथ्रोपिक के अनुसार, चीन से जुड़े तीन मामलों में मिसाइलों, पारंपरिक हथियारों और बमों के डिजाइन से संबंधित सॉफ्टवेयर विकसित करने की कोशिशों का पता चला। इन मामलों में एआई की तकनीकी क्षमताओं का इस्तेमाल सैन्य प्रणालियों से संबंधित कार्यों के लिए करने का कथित प्रयास किया गया।
रूस से जुड़े दो मामलों में चुनावी दुष्प्रचार के लिए सामग्री तैयार करने और घातक हथियारों के डिजाइन से जुड़ी गतिविधियों की पहचान किए जाने की बात कही गई है। वहीं यमन में ईरान समर्थित हूती नेटवर्क से जुड़े एक मामले में ड्रोन और मिसाइल प्रणालियों के लिए सॉफ्टवेयर कोड तैयार कराने की कोशिश का पता चलने का दावा किया गया है।
इन घटनाओं के बाद संबंधित खातों को बंद करने की कार्रवाई की गई। कुछ संदिग्ध गतिविधियों से जुड़े इंटरनेट प्रोटोकॉल पतों को भी अवरुद्ध किया गया। हालांकि, ऐसे मामलों की पहचान और रोकथाम अपने आप में बड़ी चुनौती है, क्योंकि एआई का उपयोग सामान्य शोध, औद्योगिक विकास और सैन्य क्षेत्र के वैध कार्यों में भी किया जाता है।
हालिया घटनाएं संकेत देती हैं कि एआई सुरक्षा का दायरा केवल साइबर अपराध, फर्जी सामग्री या ऑनलाइन धोखाधड़ी तक सीमित नहीं रह सकता। जैविक विज्ञान, सैन्य तकनीक और अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में एआई के इस्तेमाल के लिए मजबूत सुरक्षा नियंत्रण, उपयोगकर्ता सत्यापन और लगातार निगरानी की जरूरत बढ़ रही है। विशेषज्ञों के अनुसार, एआई कंपनियों को ऐसी प्रणालियां विकसित करनी होंगी जो संदिग्ध गतिविधियों को शुरुआती स्तर पर पहचान सकें और खतरनाक जानकारी तक पहुंच को रोक सकें। आने वाले समय में एआई की क्षमता जितनी बढ़ेगी, उसके जिम्मेदार और सुरक्षित इस्तेमाल को सुनिश्चित करना उतना ही महत्वपूर्ण होगा।
