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Fraud Alert

पुणे में डुप्लीकेट सिम से ₹85.5 लाख की साइबर ठगी, बैंक ऑफ इंडिया पर ₹1.5 करोड़ का हर्जाना

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksSeptember 14, 2026No Comments4 Mins Read
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बिना सत्यापन डुप्लीकेट सिम जारी करने पर आइडिया सेल्युलर पर ₹5 लाख का जुर्माना; 2015 में फर्म के खातों से 13 अनधिकृत RTGS लेनदेन का मामला
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पुणे। पुणे की एक फर्म के मोबाइल नंबर का डुप्लीकेट सिम जारी कराकर बैंक खातों से करीब ₹85.5 लाख की रकम निकालने के 11 साल पुराने मामले में सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम के तहत न्यायनिर्णयन प्राधिकरण ने कड़ा फैसला सुनाया है। प्राधिकरण ने बैंक ऑफ इंडिया को पीड़ित फर्म को 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ राशि लौटाने का निर्देश दिया है। ब्याज समेत यह रकम अब करीब ₹1.5 करोड़ हो चुकी है। वहीं, बिना पर्याप्त सत्यापन के डुप्लीकेट सिम जारी करने के मामले में आइडिया सेल्युलर, जो अब वोडाफोन आइडिया है, पर ₹5 लाख का जुर्माना लगाया गया है। यह राशि फर्म G D Apte & Co को 30 दिन के भीतर अदा करनी होगी।
मामला 10 मार्च 2015 का है। पुणे स्थित फर्म का पंजीकृत मोबाइल नंबर अचानक बंद हो गया था। फर्म को इसकी जानकारी मिलने से पहले ही उसके नंबर का डुप्लीकेट सिम कथित तौर पर किसी अज्ञात व्यक्ति को जारी कर दिया गया। अगले ही दिन 11 मार्च को जालसाजों ने इसी मोबाइल नंबर से जुड़े बैंकिंग प्रमाणीकरण तंत्र का फायदा उठाते हुए बैंक ऑफ इंडिया की जंगली महाराज रोड शाखा में फर्म के खातों से अनधिकृत RTGS लेनदेन किए।
साइबर वकील प्रशांत माली के अनुसार, फर्म के करंट अकाउंट से ₹6.6 लाख का एक लेनदेन किया गया, जबकि ओवरड्राफ्ट खाते से ₹78.9 लाख के 12 अनधिकृत RTGS लेनदेन हुए। इस तरह कुल 13 लेनदेन के जरिए करीब ₹85.5 लाख की रकम खातों से बाहर चली गई। इनमें से लगभग ₹14 लाख की रिकवरी हो सकी, लेकिन फर्म को करीब ₹64.4 लाख का प्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।
मामले में बैंक की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था और निर्धारित लेनदेन प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल उठे। फर्म के बैंकिंग प्रोटोकॉल के अनुसार, लेनदेन की शुरुआत निचले स्तर के यूजर को करनी थी और उसे तीन उच्च अधिकारियों में से कम से कम दो अधिकारियों की मंजूरी के बाद ही पूरा किया जा सकता था। इसके अलावा, खाते के लिए मासिक RTGS सीमा ₹50 लाख निर्धारित थी।
प्राधिकरण के समक्ष बैंक यह स्पष्ट नहीं कर सका कि निर्धारित प्रक्रिया और लेनदेन सीमा के बावजूद ₹78.9 लाख के 12 लेनदेन किस तरह पूरे हो गए। जांच में यह भी महत्वपूर्ण माना गया कि बैंक की ओर से लेनदेन की सुरक्षा जांच और निर्धारित अधिकार-स्तर के सत्यापन में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती गई। इसी आधार पर बैंक को वित्तीय नुकसान के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार माना गया।

Proposal for Conducting Cyber Crisis Drill, Tabletop Exercise (TTEx) & CCMP Readiness Exercise

दूसरी ओर, दूरसंचार कंपनी की भूमिका भी मामले में महत्वपूर्ण रही। आरोप था कि कंपनी ने फर्म के अधिकृत दस्तावेज, पहचान संबंधी विवरण, लेटरहेड और स्टाम्प का पर्याप्त सत्यापन किए बिना डुप्लीकेट सिम किसी अज्ञात व्यक्ति को जारी कर दिया। डुप्लीकेट सिम सक्रिय होने के बाद बैंक से जुड़े प्रमाणीकरण संदेश और OTP उसी नंबर पर पहुंचने लगे। इससे जालसाजों को बैंकिंग लेनदेन पूरा करने में मदद मिली।
प्राधिकरण ने माना कि मोबाइल नंबर बैंकिंग सुरक्षा और प्रमाणीकरण की महत्वपूर्ण कड़ी था। इसलिए डुप्लीकेट सिम जारी करने में हुई लापरवाही ने साइबर धोखाधड़ी को संभव बनाने में अहम भूमिका निभाई। इसी आधार पर आइडिया सेल्युलर पर ₹5 लाख का हर्जाना लगाया गया।
फैसले में बैंक ऑफ इंडिया की जिम्मेदारी को अधिक गंभीर माना गया, क्योंकि खाते की निर्धारित लेनदेन सीमा, मेकर-चेकर व्यवस्था और बहु-स्तरीय अनुमोदन प्रक्रिया के बावजूद बड़ी रकम के कई लेनदेन पूरे हो गए। प्राधिकरण ने बैंक को पीड़ित फर्म को निर्धारित राशि पर 12 प्रतिशत वार्षिक ब्याज के साथ भुगतान करने का निर्देश दिया है।
यह मामला इस बात को रेखांकित करता है कि साइबर धोखाधड़ी में केवल ग्राहक की सतर्कता ही पर्याप्त नहीं है। बैंकिंग संस्थानों को लेनदेन सीमा और बहु-स्तरीय प्रमाणीकरण का सख्ती से पालन करना होता है, जबकि दूरसंचार कंपनियों के लिए डुप्लीकेट सिम जारी करने से पहले ग्राहक की पहचान और अधिकृत अनुरोध का कठोर सत्यापन जरूरी है।
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