लखनऊ। किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (केजीएमयू) में नर्सिंग भर्ती परीक्षा-2023 को लेकर उठे सवालों के बीच अब तत्कालीन कुलसचिव अर्चना गहरवार की ओर से शासन को भेजे गए पत्र चर्चा में हैं। उन्होंने अपने तबादले से पहले चिकित्सा शिक्षा विभाग की प्रमुख सचिव को तीन पत्र लिखकर विश्वविद्यालय में भर्ती प्रक्रिया से जुड़ी संभावित अनियमितताओं का सिलसिलेवार ब्योरा दिया था। इन पत्रों के माध्यम से उन्होंने शासन और राजभवन को भी विश्वविद्यालय की प्रशासनिक व्यवस्था तथा नियुक्तियों से जुड़े मुद्दों से अवगत कराया था।
अर्चना गहरवार ने मांग की थी कि विश्वविद्यालय में लंबित भर्तियां आंतरिक व्यवस्था के बजाय उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग या उत्तर प्रदेश अधीनस्थ सेवा चयन आयोग के माध्यम से कराई जाएं। उनका तर्क था कि इससे भर्ती प्रक्रिया की वैधानिकता सुनिश्चित करने के साथ पारदर्शिता बढ़ाई जा सकेगी। उनका तबादला तीन अक्तूबर 2026 को किया गया था। अब नर्सिंग भर्ती परीक्षा-2023 की जांच विशेष कार्यबल (एसटीएफ) कर रहा है। मामले की जांच महानिदेशक चिकित्सा शिक्षा (डीजीएमई) को भी सौंपी गई थी, लेकिन उन्होंने एसटीएफ की जांच का हवाला देते हुए अलग से जांच करने से इन्कार कर दिया।
भर्ती नियमों और रिक्रूटमेंट सेल की भूमिका पर सवाल
प्रमुख सचिव को भेजे गए पत्रों में तत्कालीन कुलसचिव ने कहा था कि विश्वविद्यालय में कर्मचारियों की भर्ती, नियुक्ति और प्रशासनिक कार्य निर्धारित नियमावली के अनुसार होने चाहिए। उन्होंने गैर-शैक्षणिक, नर्सिंग और अन्य संवर्गों की नियुक्तियों के लिए रिक्रूटमेंट सेल के गठन, पुनर्गठन और उसके कार्यक्षेत्र में विस्तार से संबंधित आदेशों पर सवाल उठाए थे।
उनके अनुसार, यह जांचना जरूरी था कि भर्ती प्रक्रिया में निर्धारित वैधानिक प्रावधानों का पालन किया गया या नहीं। इसके साथ ही भर्ती कराने वाले निकाय की भूमिका और नियुक्ति प्राधिकारी के अधिकार क्षेत्र का भी परीक्षण किया जाना चाहिए। उन्होंने रिक्रूटमेंट सेल के गठन से लेकर उसकी उपयोगिता और अधिकारों तक की जांच कराने की मांग की थी।
733 नर्सिंगकर्मियों की भर्ती की नए सिरे से जांच पर जोर
पत्र में वर्ष 2023 से 2025 के बीच हुई विभिन्न गैर-शैक्षणिक भर्तियों का उल्लेख करते हुए केजीएमयू परिनियम 16.05 के तहत अपेक्षित भर्ती बोर्ड के विधिवत गठन पर सवाल उठाए गए थे। तत्कालीन कुलसचिव के अनुसार, इन भर्तियों में निर्धारित वैधानिक प्राधिकारियों की भूमिका के अनुरूप चयन प्रक्रिया अपनाए जाने की जांच जरूरी थी।
उन्होंने 733 नर्सिंगकर्मियों की भर्ती समेत अन्य लंबित नियुक्तियों की नए सिरे से जांच कराने की मांग की थी। इसका उद्देश्य भर्ती प्रक्रिया में सामने आ सकने वाली खामियों का परीक्षण करना और भविष्य में कानूनी विवादों की आशंका को कम करना था। उन्होंने शासन स्तर पर रिक्तियों के निर्धारण, विज्ञापन जारी करने, आरक्षण रोस्टर लागू करने, पात्रता मानदंड तय करने और चयन निकाय के गठन की समीक्षा कराने को कहा था।
इसके अलावा परीक्षा संचालन, अभिलेखों के सत्यापन, चयन संस्तुति और नियुक्ति अनुमोदन की प्रक्रिया की भी जांच कराने की मांग की गई थी। उनका प्रस्ताव था कि प्रस्तावित 733 नर्सिंगकर्मियों समेत आगामी भर्तियां आयोगों के माध्यम से कराई जाएं, जैसा कि वर्ष 2023 से पहले की भर्तियों में किया जाता रहा था।
संकाय सदस्यों को प्रशासनिक जिम्मेदारी देने पर आपत्ति
अर्चना गहरवार ने अपने पत्र में नियमावली का हवाला देते हुए संकाय सदस्यों और चिकित्सकों को प्रशासनिक एवं वित्तीय कार्यों की जिम्मेदारी सौंपने पर भी सवाल उठाए थे। उन्होंने कहा था कि संबंधित शासनादेशों की अनदेखी करते हुए संकाय सदस्यों को डिप्टी रजिस्ट्रार और रिक्रूटमेंट सेल के फैकल्टी इंचार्ज जैसे पद दिए गए। उन्होंने गैर-शैक्षणिक भर्ती प्रक्रिया के सभी चरणों की जांच कराने की मांग की थी।
पत्र में नियुक्ति प्राधिकारी की भूमिका को लेकर भी कानूनी आपत्ति उठाई गई थी। उनका कहना था कि यदि कुलसचिव नियुक्ति प्राधिकारी है, तो उसे चयन प्रक्रिया के अनिवार्य चरणों से अलग रखने की व्यवस्था की वैधानिकता की समीक्षा होनी चाहिए। भर्ती से जुड़े अधिकारों और जिम्मेदारियों का निर्धारण स्पष्ट नियमों के आधार पर किया जाना जरूरी है।
परीक्षा कराने वाली एजेंसी के अधिकार भी जांच के दायरे में
तत्कालीन कुलसचिव ने स्पष्ट किया था कि परीक्षा नियंत्रक या किसी बाहरी एजेंसी को लिखित परीक्षा अथवा कंप्यूटर आधारित परीक्षा (सीबीटी) कराने की जिम्मेदारी सौंपने का अर्थ नियुक्ति प्राधिकारी की वैधानिक शक्तियों का हस्तांतरण नहीं है। उनके अनुसार, परीक्षा संचालन, अभ्यर्थियों की स्क्रीनिंग, बायोमीट्रिक सत्यापन, दस्तावेजों की जांच, परिणाम तैयार करने और चयन संस्तुति की जिम्मेदारियां नियमों तथा सक्षम प्राधिकारी के आदेशों के अनुरूप तय होनी चाहिए।
इस पूरे मामले में अब एसटीएफ की जांच महत्वपूर्ण मानी जा रही है। हालांकि, तत्कालीन कुलसचिव की ओर से पत्रों में उठाए गए सवाल अपने आप में अनियमितताओं का अंतिम प्रमाण नहीं हैं। भर्ती प्रक्रिया में नियमों का पालन हुआ या नहीं, इसका निर्धारण जांच और संबंधित अभिलेखों के परीक्षण के बाद ही हो सकेगा।
केजीएमयू प्रशासन की ओर से तत्कालीन कुलसचिव के पत्रों के संबंध में कहा गया कि इस बारे में फिलहाल जानकारी नहीं है। प्रशासन के मुताबिक, अभी तक शासन की ओर से भी इस संबंध में कोई जवाब नहीं मांगा गया है। पत्र मिलने पर उसका जवाब दिया जाएगा।
