आगरा: उत्तर प्रदेश के आगरा में साइबर पुलिस ने ऐसे गिरोह का पर्दाफाश किया है, जिस पर देशभर में करीब ₹50 करोड़ की साइबर ठगी करने का आरोप है। पुलिस जांच में सामने आया है कि आरोपी जनसेवा केंद्र की आड़ में लोगों के दस्तावेज और निजी जानकारी हासिल कर फर्जी ई-वॉलेट तैयार करते थे। इसके बाद APK फाइल, फर्जी वेबसाइट और ऑनलाइन लिंक के माध्यम से लोगों को निशाना बनाकर ठगी की रकम को अलग-अलग माध्यमों से दुबई में बैठे कथित सरगना तक पहुंचाया जाता था। मामले में पुलिस ने दो आरोपियों को गिरफ्तार किया है, जबकि गिरोह के पांच अन्य सदस्यों की तलाश की जा रही है।
साइबर पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार आरोपियों की पहचान अरवशिष्ठ उर्फ आशीष वशिष्ठ निवासी गाजियाबाद और रजत आहूजा निवासी उत्तराखंड के रूप में हुई है। पुलिस ने दोनों के कब्जे से मोबाइल फोन बरामद किए हैं। जांच में सामने आया है कि आरोपियों से जुड़े जनसेवा केंद्र आईडी और अन्य डिजिटल माध्यमों के जरिए करोड़ों रुपये का लेनदेन किया गया। पुलिस के मुताबिक, एक जनसेवा केंद्र आईडी से करीब ₹1 करोड़ और अन्य ई-वॉलेट के माध्यम से लगभग ₹12 करोड़ के संदिग्ध लेनदेन की जानकारी मिली है।
जांच एजेंसियों के अनुसार, गिरोह का काम करने का तरीका बेहद संगठित था। आरोपी आम लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर जनसेवा केंद्र की फर्जी आईडी तैयार करते थे। इसके बाद आधार, पहचान पत्र और अन्य दस्तावेजों की जानकारी का दुरुपयोग कर ई-वॉलेट और डिजिटल भुगतान से जुड़े खाते बनाए जाते थे। इन माध्यमों का इस्तेमाल साइबर ठगी से प्राप्त धनराशि को आगे भेजने के लिए किया जाता था, जिससे वास्तविक आरोपियों तक पहुंचना मुश्किल हो जाए।
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पुलिस जांच में यह मामला उस समय सामने आया जब शमसाबाद क्षेत्र निवासी रघुवीर सिंह ने सितंबर 2025 में साइबर क्राइम थाने में शिकायत दर्ज कराई थी। उन्होंने बताया था कि उनके बेटे सूरज के नाम पर बने ई-वॉलेट का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम के लेनदेन में किया गया था, जिसके बाद फरीदाबाद और मुंबई पुलिस ने भी मामले की जांच के लिए संपर्क किया था। जांच के दौरान पता चला कि आरोपियों ने दूसरे लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल कर फर्जी डिजिटल पहचान तैयार की थी।
पुलिस के अनुसार, आरोपी लोगों को अलग-अलग तरीकों से APK फाइल भेजते थे। इन फाइलों के जरिए मोबाइल में संदिग्ध एप इंस्टॉल कराकर बैंकिंग जानकारी चोरी करने की कोशिश की जाती थी। इसके अलावा बैंक और बड़ी कंपनियों की तरह दिखने वाली फर्जी वेबसाइट तैयार कर लोगों से लॉगिन जानकारी, ओटीपी और अन्य संवेदनशील सूचनाएं हासिल की जाती थीं। इसके बाद खातों से निकाली गई रकम को ई-वॉलेट और अन्य डिजिटल माध्यमों से कई स्तरों पर ट्रांसफर किया जाता था।
पूछताछ में आरोपियों ने कथित तौर पर बताया कि इस नेटवर्क से जुड़े लोग दिल्ली, हरियाणा, मुंबई और अन्य राज्यों में सक्रिय थे। गिरोह के सदस्य बैंकिंग दस्तावेज, खातों और डिजिटल माध्यमों की व्यवस्था करते थे, जबकि विदेश में बैठे लोग धन के अंतिम लेनदेन को नियंत्रित करते थे। पुलिस अब इस नेटवर्क से जुड़े अन्य सदस्यों, बैंक खातों, डिजिटल वॉलेट और विदेशी संपर्कों की जांच कर रही है।
साइबर विशेषज्ञों के अनुसार, जनसेवा केंद्र, आधार अपडेट सेंटर या अन्य डिजिटल सेवा केंद्रों पर दस्तावेज देते समय नागरिकों को सतर्क रहने की जरूरत है। किसी भी केंद्र की वैधता और संचालक की पहचान की जांच करना जरूरी है। दस्तावेजों की कॉपी देते समय उस पर उपयोग का उद्देश्य और तारीख लिखना चाहिए, ताकि उसका गलत इस्तेमाल रोका जा सके।
विशेषज्ञों ने लोगों से अपील की है कि किसी भी अनजान APK फाइल को डाउनलोड न करें, फर्जी वेबसाइट लिंक पर बैंकिंग जानकारी साझा न करें और अपना ओटीपी, यूपीआई पिन या बैंक विवरण किसी के साथ साझा न करें। साइबर ठगी की स्थिति में तुरंत राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 या साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराने से नुकसान को सीमित करने में मदद मिल सकती है।
