इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के कारण जमानत अर्जी के निस्तारण में हुई देरी के चलते एक आरोपी को 15 दिन से अधिक समय तक अतिरिक्त जेल में रहने के मामले में उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹1 लाख का जुर्माना लगाया है। अदालत ने निर्देश दिया कि यह राशि मुआवजे के रूप में याचिकाकर्ता को अदा की जाए। साथ ही राज्य सरकार को यह स्वतंत्रता भी दी कि विभागीय जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों से कानून के अनुसार उक्त राशि की वसूली की जा सकती है।
यह आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकल पीठ ने गोरखपुर निवासी अमित की याचिका पर सुनवाई करते हुए पारित किया। अमित 20 मार्च 2026 से अपहरण और पॉक्सो अधिनियम सहित विभिन्न धाराओं में दर्ज मामले में न्यायिक हिरासत में था। उसकी जमानत याचिका पर समय से निर्णय नहीं हो सका क्योंकि संबंधित पुलिस अधिकारियों ने अदालत को आवश्यक निर्देश और अभिलेख समय पर उपलब्ध नहीं कराए।
अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार मामले की सुनवाई 8 जुलाई 2026 को निर्धारित थी। उस दिन शासकीय अधिवक्ता ने अतिरिक्त समय का अनुरोध किया क्योंकि हाईकोर्ट के संयुक्त निदेशक अभियोजन कार्यालय की ओर से कई बार स्मरण पत्र भेजे जाने के बावजूद संबंधित पुलिस अधिकारियों ने आवश्यक निर्देश और केस रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं कराए थे। परिणामस्वरूप जमानत याचिका पर निर्धारित तिथि पर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी।
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने गोरखपुर के वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक (एसएसपी) को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होकर यह स्पष्ट करने का निर्देश दिया कि अभियोजन कार्यालय के बार-बार स्मरण कराने के बावजूद निर्देश समय पर क्यों नहीं भेजे गए और इस लापरवाही से न्यायिक प्रक्रिया क्यों प्रभावित हुई।
एसएसपी द्वारा कराई गई आंतरिक जांच में थाना बांसगांव के प्रभारी निरीक्षक, एक उपनिरीक्षक और एक कांस्टेबल को लापरवाही का दोषी पाया गया। जांच के बाद तीनों पुलिसकर्मियों को पुलिस लाइन से संबद्ध कर दिया गया। एसएसपी ने अदालत के समक्ष बिना शर्त माफी मांगते हुए बताया कि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न हो, इसके लिए आवश्यक विभागीय दिशा-निर्देश जारी कर दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पुलिस अधिकारियों की लापरवाही के कारण याचिकाकर्ता की जमानत अर्जी का समय पर निस्तारण नहीं हो सका। यदि आवश्यक निर्देश समय पर उपलब्ध करा दिए जाते, तो जमानत आवेदन पर पहले ही निर्णय लिया जा सकता था। इस प्रशासनिक चूक के कारण याचिकाकर्ता को 15 दिन से अधिक समय तक अतिरिक्त अवधि के लिए जेल में रहना पड़ा, जिससे उसके व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा।
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अदालत ने पीड़िता के बयान का भी उल्लेख किया। प्रथम सूचना रिपोर्ट में आरोप था कि शिकायतकर्ता की बेटी को बहला-फुसलाकर ले जाया गया था। हालांकि, मजिस्ट्रेट के समक्ष दर्ज बयान में पीड़िता ने कहा कि वह याचिकाकर्ता के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों के कारण स्वयं घर छोड़कर गई थी। अदालत ने जमानत याचिका पर विचार करते समय इस बयान को भी महत्वपूर्ण माना।
हाईकोर्ट ने कहा कि न्यायिक प्रक्रिया में अनावश्यक देरी किसी भी व्यक्ति के संवैधानिक और मौलिक अधिकारों को प्रभावित कर सकती है। इसलिए जांच एजेंसियों और पुलिस अधिकारियों का दायित्व है कि वे अदालत द्वारा मांगी गई सूचनाएं और निर्देश समयबद्ध तरीके से उपलब्ध कराएं, ताकि मामलों का निष्पक्ष और शीघ्र निस्तारण सुनिश्चित किया जा सके।
अदालत ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि ₹1 लाख की मुआवजा राशि याचिकाकर्ता को शीघ्र अदा की जाए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया कि यदि विभागीय जांच में संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होती है, तो सरकार कानून के अनुसार उनसे उक्त राशि की वसूली करने के लिए स्वतंत्र होगी। अदालत का यह फैसला प्रशासनिक जवाबदेही सुनिश्चित करने और न्यायिक प्रक्रिया में लापरवाही पर सख्त संदेश के रूप में देखा जा रहा है।
