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Home»Trending»अमेरिकी और इस्लामिक साम्राज्यवाद अलग दिखते हैं, पर सोच एक जैसी है
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अमेरिकी और इस्लामिक साम्राज्यवाद अलग दिखते हैं, पर सोच एक जैसी है

Sharad NataniBy Sharad NataniJanuary 6, 2026No Comments3 Mins Read
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इतिहास गवाही देता है कि साम्राज्य हमेशा एक जैसे कपड़े पहनकर नहीं आते। कुछ टैंक लेकर आते हैं, कुछ तकरीरें लेकर। कुछ झंडा गाड़ते हैं, कुछ झूठा नैतिक ध्वज उठाते हैं। पर अंततः साम्राज्य की पहचान उसके तरीक़ों से नहीं, उसके लक्ष्य से होती है।

अमेरिकी साम्राज्यवाद और इस्लामिक साम्राज्यवाद को यदि अलग-अलग देखा जाए, तो एक आधुनिक दिखता है और दूसरा मध्ययुगीन। लेकिन यदि उनके कार्य-पैटर्न, शक्ति-प्रयोग और परिणामों को देखा जाए, तो दोनों एक ही वैचारिक सिक्के के दो पहलू प्रतीत होते हैं।

अमेरिकी साम्राज्यवाद ‘लोकतंत्र’, ‘मानवाधिकार’ और ‘फ्रीडम’ की भाषा बोलता है। इस्लामिक साम्राज्यवाद ‘धर्म’, ‘ख़िलाफ़त’ और ‘ईश्वरीय आदेश’ की।

भाषा अलग है, पर रणनीति समान है। पहले नैतिक श्रेष्ठता का दावा, फिर हस्तक्षेप की अनुमति और अंततः सत्ता पर नियंत्रण।

इराक में कहा गया कि तानाशाही हटानी है। अफगानिस्तान में कहा गया कि आतंकवाद मिटाना है। सीरिया और लीबिया में कहा गया कि मानवाधिकार बचाने हैं।

उधर इस्लामिक साम्राज्यवाद ने कहा कि काफिर सत्ता हटानी है, शरीअत लागू करनी है, ईश्वर का राज स्थापित करना है। पर दोनों के बाद जो बचा, वह था खंडहर, खून और खोखली संस्थाएं।

दरअसल यहां बंदूक और बयान एक ही युद्ध के दो औज़ार हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद ड्रोन से डर पैदा करता है, इस्लामिक साम्राज्यवाद फतवों से। एक आर्थिक प्रतिबंधों से देशों को थकाता है, दूसरा धार्मिक भय से समाज को जकड़ता है।

एक मीडिया से नैरेटिव गढ़ता है, दूसरा मदरसों और मंचों से मानसिक कब्जा करता है। दोनों ही सीधे युद्ध से पहले दिमाग जीतते हैं, संस्थाओं को कमजोर करते हैं और फिर कहते हैं कि अब विकल्प नहीं बचा।

वेनेज़ुएला में सत्ता इसलिए नहीं गिरी कि सेना हार गई, बल्कि इसलिए कि सेना निष्क्रिय कर दी गई। एक गोली नहीं चली, पर एक राष्ट्र चुपचाप फिसल गया।

अफगानिस्तान में भी यही हुआ। तालिबान की जीत युद्ध से नहीं, बल्कि राज्य के भीतर टूटे विश्वास से हुई।अमेरिका ने छोड़ा, इस्लामिक साम्राज्यवाद ने भरा। दोनों ने मिलकर यह सिद्ध किया कि जब संस्थाएं गिरती हैं, तो झंडे बदल जाते हैं।

इन दोनों ने लोकतंत्र और धर्म दोनों का अपहरण किया है। अमेरिकी साम्राज्यवाद लोकतंत्र का अपहरण करता है, इस्लामिक साम्राज्यवाद धर्म का। एक चुनावों को संदिग्ध बनाता है, दूसरा उन्हें ईश्वरीय आदेश के विरुद्ध बताता है। पर दोनों का उद्देश्य एक है कि प्रश्न करने वाली आवाज को खामोश करना।

भारत के लिए ख़तरा किसी एक झंडे से नहीं, बल्कि उस साम्राज्यवादी सोच से है, जो भारतीयता और संविधान से ऊपर किसी और सत्ता को बैठाना चाहती है।

आज यदि कोई कहे कि लोकतंत्र पश्चिमी साज़िश है, या संविधान से ऊपर मज़हब है, तो समझ लेना चाहिए कि साम्राज्य ने दरवाज़ा खटखटाया नहीं, वह भीतर से रास्ता बना रहा है।

साम्राज्य अलग नहीं होते, केवल उनके बहाने बदलते हैं। अमेरिकी साम्राज्यवाद और इस्लामिक साम्राज्यवाद दो अलग रास्तों से चलते हैं, पर मंज़िल एक ही है सत्ता का केंद्रीकरण और संप्रभुता का क्षरण।

एक डॉलर से देशों को बांधता है, दूसरा डर से समाज को। एक लोकतंत्र की भाषा में नियंत्रण करता है, दूसरा धर्म की भाषा में। और इतिहास का अंतिम सत्य यही है कि जो राष्ट्र विचारधाराओं की पहचान नहीं करता, वह एक दिन बिना युद्ध हारा हुआ पाया जाता है।

इसलिए आज की सबसे बड़ी देशभक्ति सीमा की रक्षा नहीं, संविधान और सांस्कृतिक की चेतना की रक्षा है।

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