नई दिल्ली। स्वास्थ्य बीमा लेने वाले लोगों के लिए क्लेम खारिज होने की सबसे बड़ी चिंता बीमारी के इलाज के दौरान सामने आती है। कई मामलों में बीमा कंपनियां पॉलिसी की शर्तों के उल्लंघन, बीमारी छिपाने या धूम्रपान की आदत का हवाला देकर भुगतान से इनकार कर देती हैं। खासकर कुछ शिकायतों में पॉलिसीधारक को लंबे समय से धूम्रपान करने वाला यानी ‘क्रॉनिक स्मोकर’ बताते हुए दावा खारिज करने की बात सामने आई है। हालांकि, ऐसे मामलों में सवाल यह उठता है कि क्या बीमा कंपनी के पास इस आरोप को साबित करने के लिए पर्याप्त दस्तावेज और मेडिकल रिकॉर्ड मौजूद हैं।
वित्त वर्ष 2024-25 में स्वास्थ्य बीमा से जुड़े 29.51 लाख दावे खारिज किए गए। इन दावों में करीब ₹11,412 करोड़ की रकम शामिल थी। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक लगभग हर 100 में आठ स्वास्थ्य बीमा दावों को खारिज किया गया। क्लेम रिजेक्शन के कारणों में पॉलिसी की शर्तों का कथित उल्लंघन, बीमारी से जुड़ी जानकारी छिपाना और धूम्रपान जैसी आदतों को लेकर विवाद शामिल रहे हैं।
बीमा नियमन के तहत किसी दावे को केवल संदेह या मौखिक जानकारी के आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता। कंपनी को पॉलिसीधारक को स्पष्ट कारण बताना होता है और यह भी बताना होता है कि पॉलिसी की किस शर्त के आधार पर दावा अस्वीकार किया गया। यदि कंपनी धूम्रपान या किसी बीमारी को छिपाने को रिजेक्शन का आधार बनाती है तो उसके समर्थन में उपलब्ध रिकॉर्ड और दस्तावेज भी महत्वपूर्ण होंगे।
ऐसा ही एक मामला कोयंबटूर के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग के सामने आया। एक पॉलिसीधारक के इलाज से जुड़े करीब ₹10.15 लाख के स्वास्थ्य बीमा दावे को कंपनी ने कथित तौर पर लंबे समय से धूम्रपान करने का आधार बताते हुए खारिज किया था। मामला एन्यूरिज्म के इलाज से जुड़ा था। पॉलिसीधारक ने आरोप लगाया कि कंपनी के पास लंबे समय से धूम्रपान करने की बात साबित करने वाला ठोस साक्ष्य नहीं था। आयोग ने कंपनी को करीब ₹10.15 लाख के दावे का भुगतान करने का आदेश दिया।
इसी तरह हैदराबाद में 67 वर्षीय पॉलिसीधारक के मामले में बीमा कंपनी ने कथित तौर पर हाई ब्लड प्रेशर की जानकारी छिपाने का आरोप लगाकर दावा खारिज किया। उपभोक्ता आयोग के समक्ष सुनवाई के दौरान कंपनी कथित तौर पर इस आरोप के समर्थन में ठोस दस्तावेज पेश नहीं कर सकी। ऐसे मामलों ने यह सवाल उठाया है कि क्या किसी बीमारी या आदत के बारे में अनुमान के आधार पर बीमा भुगतान रोका जा सकता है।
नियमों के मुताबिक, बीमा कंपनी को दावा पॉलिसी की शर्तों और लागू नियामकीय प्रावधानों के अनुसार निपटाना होता है। अगर दावा खारिज किया जाता है तो कंपनी को रिजेक्शन का स्पष्ट और विशिष्ट कारण बताना चाहिए। साथ ही संबंधित पॉलिसी शर्त का उल्लेख और शिकायत निवारण की पूरी जानकारी देनी होती है। इसमें कंपनी की आंतरिक शिकायत व्यवस्था और बीमा लोकपाल से संपर्क की जानकारी शामिल होती है।
क्लेम निपटारे में समयसीमा भी निर्धारित है। सामान्य परिस्थितियों में दावा 30 दिनों के भीतर निपटाया जाना चाहिए। यदि मामले में जांच की जरूरत हो तो बीमा कंपनी को जांच तुरंत शुरू करनी होती है और उसे अधिकतम 30 दिनों के भीतर पूरा करना होता है। सभी जरूरी दस्तावेज मिलने के बाद दावा अधिकतम 45 दिनों के भीतर निपटाया जाना चाहिए।
पॉलिसीधारकों की एक बड़ी शिकायत यह भी रही है कि कंपनियां क्लेम प्रक्रिया के अंतिम चरण में अतिरिक्त दस्तावेज मांगती हैं। इससे इलाज के बाद भुगतान मिलने में देरी हो सकती है और कई बार दावा महीनों तक लंबित रहने की स्थिति बन जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार ऐसे मामलों में पॉलिसीधारक को कंपनी से हर मांग और निर्णय लिखित रूप में लेना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति का दावा ‘क्रॉनिक स्मोकर’, बीमारी छिपाने या पॉलिसी शर्तों के उल्लंघन जैसे आधार पर खारिज किया जाता है तो उसे रिजेक्शन पत्र में लिखे कारण, संबंधित पॉलिसी क्लॉज और कंपनी के पास मौजूद supporting documents की जानकारी मांगनी चाहिए। मेडिकल रिपोर्ट, पुराने उपचार रिकॉर्ड और डॉक्टर की राय जैसे दस्तावेज भी विवाद की स्थिति में महत्वपूर्ण हो सकते हैं।
स्वास्थ्य बीमा का उद्देश्य गंभीर बीमारी और इलाज के खर्च से वित्तीय सुरक्षा देना है। ऐसे में क्लेम खारिज होने पर केवल मौखिक स्पष्टीकरण पर निर्भर रहने के बजाय पॉलिसीधारक को लिखित कारण और दस्तावेजों के आधार पर स्थिति समझनी चाहिए। खासकर धूम्रपान या पहले से मौजूद बीमारी से जुड़े विवादों में यह देखना जरूरी है कि कंपनी का आरोप किस रिकॉर्ड पर आधारित है और संबंधित पॉलिसी शर्त वास्तव में उस मामले पर लागू होती है या नहीं।
