तेहरान/दुबई। पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के बीच ईरान ने अब समुद्र के नीचे बिछे वैश्विक इंटरनेट केबल नेटवर्क पर नियंत्रण की घोषणा कर दुनिया की डिजिटल और वित्तीय व्यवस्था को नई चिंता में डाल दिया है। ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने कहा है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ से गुजरने वाली सात महत्वपूर्ण अंडरसी फाइबर-ऑप्टिक केबलों के संचालन, रखरखाव और सुरक्षा के लिए विदेशी कंपनियों को अब ईरान से अनुमति लेनी होगी और सुरक्षा शुल्क भी देना पड़ेगा।
यह कदम ऐसे समय सामने आया है जब अमेरिका और ईरान के बीच पिछले कई सप्ताहों से नौसैनिक तनाव बना हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान इस नीति को सख्ती से लागू करता है, तो इसका असर केवल तेल व्यापार तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक इंटरनेट, बैंकिंग ट्रांजैक्शन, क्लाउड सर्विस और डिजिटल कम्युनिकेशन नेटवर्क भी प्रभावित हो सकते हैं।
स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज़ को लंबे समय से दुनिया के सबसे अहम ऊर्जा गलियारों में गिना जाता है। खाड़ी क्षेत्र से निकलने वाला बड़ा हिस्सा इसी समुद्री रास्ते से वैश्विक बाजारों तक पहुंचता है। लेकिन अब यह इलाका डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर के लिहाज से भी संवेदनशील बन गया है। समुद्र के भीतर बिछी AAE-1 और FALCON जैसी हाई-कैपेसिटी केबलें एशिया, यूरोप और मध्य-पूर्व की इंटरनेट और डेटा सेवाओं को जोड़ती हैं।
ईरानी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, IRGC ने विदेशी ऑपरेटरों के लिए तीन प्रमुख शर्तें रखी हैं। पहली, स्ट्रेट क्षेत्र में काम करने वाली सभी कंपनियों को प्रारंभिक लाइसेंस शुल्क देना होगा। दूसरी, वैश्विक टेक कंपनियों से वार्षिक “प्रोटेक्शन फीस” वसूली जाएगी। तीसरी और सबसे अहम शर्त यह है कि इस क्षेत्र में किसी भी केबल की मरम्मत या तकनीकी कार्य केवल ईरानी निगरानी और नियंत्रण में ही किया जा सकेगा।
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तकनीकी विशेषज्ञों के अनुसार, दुनिया की लगभग पूरी इंटरनेट ट्रैफिक का बड़ा हिस्सा आज भी अंडरसी केबल नेटवर्क के जरिए संचालित होता है। उपग्रह आधारित इंटरनेट सेवाओं के विस्तार के बावजूद समुद्र के नीचे बिछे फाइबर नेटवर्क की क्षमता, गति और स्थिरता कहीं अधिक है। यही कारण है कि बैंकिंग, शेयर बाजार, क्लाउड कंप्यूटिंग और अंतरराष्ट्रीय डेटा सेंटर इन केबलों पर अत्यधिक निर्भर हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि सैन्य तनाव वाले क्षेत्रों में अंडरसी केबल सबसे कमजोर कड़ी साबित हो सकते हैं। आमतौर पर समुद्री जहाजों के एंकर, मछली पकड़ने वाले ट्रॉलर या प्राकृतिक कारणों से केबल क्षतिग्रस्त होते हैं, लेकिन युद्ध या सैन्य गतिविधियों के दौरान जानबूझकर नुकसान पहुंचाने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। यदि किसी युद्धपोत या व्यापारी जहाज का नियंत्रण बिगड़ता है और उसका एंकर समुद्र तल पर घसीटता है, तो बड़े स्तर पर इंटरनेट ब्लैकआउट जैसी स्थिति बन सकती है।
अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यह केवल तकनीकी या आर्थिक मुद्दा नहीं है, बल्कि “डिजिटल भू-राजनीति” का नया अध्याय है। पहले जहां समुद्री रास्तों और तेल आपूर्ति पर नियंत्रण को रणनीतिक ताकत माना जाता था, वहीं अब डेटा ट्रैफिक और इंटरनेट इन्फ्रास्ट्रक्चर भी वैश्विक दबाव की नई रणनीति बनते जा रहे हैं।
भारत, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब और दक्षिण-पूर्व एशिया जैसे डेटा-प्रधान बाजारों पर इसका सीधा असर पड़ सकता है। भारत की कई आईटी कंपनियां, क्लाउड प्लेटफॉर्म और अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग सेवाएं इसी रूट से गुजरने वाले डेटा नेटवर्क पर निर्भर हैं। किसी भी तरह की बाधा से डिजिटल पेमेंट सिस्टम, ऑनलाइन ट्रेडिंग, वीडियो कम्युनिकेशन और अंतरराष्ट्रीय डेटा एक्सचेंज प्रभावित हो सकते हैं।
साइबर और डिजिटल सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में देशों के बीच संघर्ष केवल जमीन, समुद्र और आसमान तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि डेटा और इंटरनेट नेटवर्क भी रणनीतिक हथियार बन सकते हैं। फ्यूचर क्राइम रिसर्च फाउंडेशन के एक साइबर विशेषज्ञ के अनुसार, “अंडरसी केबल आज की डिजिटल अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। यदि इन नेटवर्क्स पर भू-राजनीतिक दबाव बढ़ता है, तो इसका असर कुछ मिनटों में वैश्विक वित्तीय प्रणाली तक महसूस किया जा सकता है।”
