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Home»Development»“इंटरनेट की अंधेरी दुनिया में फंसते बच्चे: अश्लील कंटेंट से जुड़े मामलों में बड़ा उछाल”
Development

“इंटरनेट की अंधेरी दुनिया में फंसते बच्चे: अश्लील कंटेंट से जुड़े मामलों में बड़ा उछाल”

Team Bharat SpeaksBy Team Bharat SpeaksMay 9, 2026No Comments4 Mins Read
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एनसीआरबी रिपोर्ट में बड़ा खुलासा—बच्चों से जुड़े 90% साइबर अपराध अश्लील सामग्री से संबंधित; गेमिंग ऐप, सोशल मीडिया और एन्क्रिप्टेड चैट प्लेटफॉर्म बन रहे अपराधियों के नए हथियार
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नई दिल्ली। डिजिटल दुनिया बच्चों के लिए जहां सीखने, मनोरंजन और संवाद का बड़ा माध्यम बन चुकी है, वहीं इंटरनेट का यही विस्तार अब उनके लिए गंभीर खतरे का कारण भी बनता जा रहा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2024 की रिपोर्ट ने बच्चों के खिलाफ बढ़ते साइबर अपराधों की बेहद चिंताजनक तस्वीर सामने रखी है। रिपोर्ट के अनुसार, बच्चों से जुड़े साइबर अपराधों में 90 प्रतिशत से अधिक मामले अश्लील सामग्री के प्रसारण, ऑनलाइन शोषण और आपत्तिजनक डिजिटल कंटेंट से संबंधित पाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि सोशल मीडिया, गेमिंग प्लेटफॉर्म और निजी चैट ऐप अब अपराधियों के लिए बच्चों तक पहुंचने का सबसे आसान जरिया बनते जा रहे हैं।

एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ साइबर अपराधों के कुल 1,238 मामले दर्ज किए गए। इनमें से 1,099 मामले बच्चों से जुड़ी अश्लील सामग्री के प्रकाशन या प्रसारण से संबंधित थे। यह आंकड़ा न केवल डिजिटल सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि इंटरनेट की दुनिया में बच्चों की निजता और सुरक्षा कितनी तेजी से खतरे में पड़ रही है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि अपराधी अब बच्चों को निशाना बनाने के लिए पारंपरिक तरीकों के बजाय आधुनिक तकनीक और सोशल इंजीनियरिंग का इस्तेमाल कर रहे हैं। कई मामलों में पहले सोशल मीडिया या गेमिंग ऐप के जरिए दोस्ती की जाती है, फिर निजी तस्वीरें और वीडियो हासिल कर बच्चों को ब्लैकमेल किया जाता है। कुछ मामलों में अपराधियों ने फर्जी प्रोफाइल और एआई आधारित नकली पहचान का इस्तेमाल कर बच्चों और किशोरों को अपने जाल में फंसाया।

राज्यवार आंकड़ों में छत्तीसगढ़ सबसे ऊपर रहा, जहां ऐसे 268 मामले दर्ज किए गए। इसके बाद राजस्थान में 174, दिल्ली में 151, उत्तर प्रदेश में 137 और केरल में 92 मामले सामने आए। जांच एजेंसियों के अनुसार कई मामलों में अपराधियों ने एन्क्रिप्टेड चैट प्लेटफॉर्म और निजी ऑनलाइन समूहों के जरिए आपत्तिजनक सामग्री साझा की। कई घटनाओं में वीडियो कॉल और लाइव स्ट्रीमिंग का भी दुरुपयोग किया गया।

FutureCrime Summit 2026: Registrations to Open Soon for India’s Biggest Cybercrime Conference

रिपोर्ट के मुताबिक, बच्चों के खिलाफ कुल अपराधों में भी लगातार वृद्धि दर्ज की जा रही है। वर्ष 2024 में बच्चों के खिलाफ कुल 1,87,702 मामले दर्ज हुए, जो 2023 की तुलना में 5.8 प्रतिशत अधिक हैं। हालांकि देश में कुल अपराधों की संख्या पिछले चार वर्षों में लगभग 10.8 प्रतिशत घटी है, लेकिन बच्चों के खिलाफ अपराधों में तेजी से बढ़ोतरी ने चिंता बढ़ा दी है। वर्ष 2020 में बच्चों के खिलाफ अपराधों के 1,28,531 मामले दर्ज हुए थे, जो 2024 में बढ़कर 1,87,702 तक पहुंच गए। यानी चार वर्षों में लगभग 46 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई।

पॉक्सो अधिनियम के तहत दर्ज मामलों ने भी स्थिति की गंभीरता को उजागर किया है। एनसीआरबी के अनुसार वर्ष 2024 में पॉक्सो कानून के तहत 69,191 मामले दर्ज किए गए। धारा 4 और 6 के तहत दर्ज 44,567 पीड़ितों में 43,675 लड़कियां थीं। यानी कुल पीड़ितों में लगभग 98 प्रतिशत लड़कियां रहीं। लड़कों की संख्या 892 दर्ज की गई। सबसे अधिक मामले 16 से 18 वर्ष आयु वर्ग में सामने आए, जहां 23,497 मामलों में 99.5 प्रतिशत पीड़ित लड़कियां थीं।

Future Crime Research Foundation के एक साइबर विशेषज्ञ के अनुसार, “अपराधी अब बच्चों तक पहुंचने के लिए केवल सोशल मीडिया ही नहीं, बल्कि ऑनलाइन गेमिंग, वीडियो चैट और एआई आधारित फर्जी प्रोफाइल का भी इस्तेमाल कर रहे हैं। कई बच्चे अनजाने में निजी जानकारी साझा कर देते हैं, जिसका बाद में ब्लैकमेलिंग और ऑनलाइन शोषण में इस्तेमाल किया जाता है।”

विशेषज्ञों का कहना है कि बच्चों को इंटरनेट इस्तेमाल के दौरान साइबर सुरक्षा की बुनियादी जानकारी देना अब बेहद जरूरी हो चुका है। अभिभावकों को बच्चों की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने, अनजान लिंक और संदिग्ध चैट से सावधान रहने तथा किसी भी संदिग्ध गतिविधि की तुरंत शिकायत करने की सलाह दी गई है। वहीं जांच एजेंसियां अब एआई आधारित मॉनिटरिंग, डिजिटल ट्रैकिंग और अंतरराज्यीय समन्वय के जरिए ऐसे अपराधों पर रोक लगाने की तैयारी में जुटी हैं। इंटरनेट की बढ़ती पहुंच के इस दौर में बच्चों की डिजिटल सुरक्षा अब केवल परिवारों की नहीं, बल्कि पूरे समाज और तकनीकी प्लेटफॉर्म की सामूहिक जिम्मेदारी बन चुकी है।

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